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नवभारत को सेलरी जुगाड़ू संपादक चाहिए!

ग्वालियर से प्रकाशित होने वाले नवभारत को संपादक की जरूरत है। इस अखबार में बतौर संपादक कर रहे डॉक्टर सुरेश सम्राट इस अखबार से विदा हो चुके हैं। इसलिए नए संपादक की प्रबंधन को तलाश-जोरशोर से है। और हां, संपादक में संपादकीय की टीम (जो इस अखबार में अब रही नहीं) को कंट्रोल करने की कला हो या न हो, पर उसके पास यह योग्यता अवश्य होना चाहिए कि वह संपादकीय टीम के लिए सेलरी की जुगाड़ कर सके। यदि वह ऐसा करने में सक्षम है तो वह इस पद के लिए एकदम फिट है।

ग्वालियर से प्रकाशित होने वाले नवभारत को संपादक की जरूरत है। इस अखबार में बतौर संपादक कर रहे डॉक्टर सुरेश सम्राट इस अखबार से विदा हो चुके हैं। इसलिए नए संपादक की प्रबंधन को तलाश-जोरशोर से है। और हां, संपादक में संपादकीय की टीम (जो इस अखबार में अब रही नहीं) को कंट्रोल करने की कला हो या न हो, पर उसके पास यह योग्यता अवश्य होना चाहिए कि वह संपादकीय टीम के लिए सेलरी की जुगाड़ कर सके। यदि वह ऐसा करने में सक्षम है तो वह इस पद के लिए एकदम फिट है।

डॉक्टर सुरेश सम्राट इस अखबार से क्यों विदा हो गए, इसका भी किस्सा इस सेलरी प्रबंधन से जुड़ा हुआ है। डॉक्टर सुरेश सम्राट को इस अखबार की बागडोर तब सौंपी गई थी, जब इस अखबार के तत्कालीन स्थानीय संपादक राकेश पाठक का प्रबंधन ने कुछ वजहों से तबादला भोपाल कर दिया। तबादले से नाराज राकेश पाठक ने अपनी लॉबी को उकसाया और एक दिन अखबार में हड़ताल करवा दी। बस इसके बाद से भी अखबार से चलते बने और डॉक्टर सुरेश सम्राट नवभारत के संपादक बन गए। वे करीब पांच साल इस अखबार का हिस्सा रहे, लेकिन एक दिन वह दिन आ ही गया।

सेलरी न मिलने से नाराज नवभारत ग्वालियर में काम करने वालों ने हड़ताल कर दी। तीन दिन अखबार का प्रकाशन बंद रहा। इसकी गाज गिरी डॉक्टर सुरेश सम्राट पर। उनसे प्रबंधन ने कहा, ‘वे किस बात के संपादक हैं, जो भूखे पेट टीम से काम नहीं ले सकते।’ नवभारत में काम कर रहे या काम छोड़ चुके लोगों का लाखों रुपए बकाया है और कुछ लोग इसकी वसूली के लिए कोर्ट भी पहुंच चुके हैं। बहरहाल, हड़ताल होते ही प्रबंधन की डॉक्टर सम्राट पर नजरें तिरछी हुई और उनसे नमस्कार कर लिया गया। पिछले तीन माह से नवभारत में संपादक की कुर्सी खाली है और ऐसे संपादक की तलाश जारी है जो नवभारत में काम करने वाले लोगों के लिए सेलरी का बंदोबस्त कर सके।

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए मेल पर आधारित.

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0 Comments

  1. नाखूनी बाबा

    January 21, 2011 at 4:09 pm

    मैं नवभारत में सेलरी जुगाड़ने वाला संपादक बन सकता हूँ पर उसके लिए मुझे स्वर्गीय रामगोपाल माहेश्वरी की आत्मा को बुरी तरह बेचना होगा, जो अब बची नहीं है और जिसे प्रफुल्ल माहेश्वरी व उसके लड़के सुमित संदीप वगैरह पहले ही बेंच चुके हैं.

  2. ram ram

    January 22, 2011 at 12:33 pm

    kkkkk:)

  3. navbharat karmchari t. singh

    January 22, 2011 at 12:16 pm

    ग्वालियर नवभारत की तरह मुंबई नवभारत भी कंगाली की कगार पर खड़ा हो गया है. लाखों घोटाला करने वाले जो अखबार छोड़कर चले गए थे, वे सभी एक बार फिर नाक के बाल बनकर चले आएं हैं. पिछले वर्ष कर्मचारियों को दो-दो महीने बाद सैलेरी दी गई. इस वर्ष भी अब तक लोगों को सैलेरी नहीं मिली है. यहां हड़ताल नहीं आत्मदाह किया जाएगा. जिसमें कर्मचारी पूरे नवभारत सहित जलेगा.बाबू लोग लाखों रुपए महीना ले जा रहे हैं और हजार रुपए सैलेरी पाने वाला भूखों मर रहा है.

  4. कमल शर्मा

    January 21, 2011 at 6:13 am

    नवभारत वाले विज्ञापन देकर ऐसे किसी प्राणी से संपर्क क्‍यों नहीं कर लेते जिसका स्विस बैंक में खाता हो। काले का सफेद भी हो जाएगा लगे हाथ एवं अखबार भी चलता रहेगा।

  5. arun

    January 22, 2011 at 2:04 pm

    sab bekar ki bat hai navbharat, mumbai pragati ke path par hai…….

  6. GWALIOR BHADASI

    January 22, 2011 at 5:19 pm

    अरे ये तो होना ही था. पर हैरानी ये है की ये सब इतनी देर बाद हुआ. वेसे ये भी डॉक्टर राकेश पाठक जी की बनाई साख का ही नतीजा है कि पाच साल पहेले मरने के बाद भी मुर्दा(नवभारत) अब तक बोल रहा है. अहेसान मानो महेश्वरी बंधुओ. खेर पाच साल पहेले वेतन न देने पर हुई हड़ताल में भरोसा तोड़ने वाले दगाबाजो कि तो बैंड ही बज गई, न घर के रहे न घाट के. यशवंत जी सुनसान कब्रिस्तान की तरह दिखने वाले अबके ग्वालियर के नवभारत पर गोविंदा की फिल्म का गाना याद आता है.
    लो आप भी सुनो. “जो बोयेगा वही कटेगा……..”

  7. milind

    January 23, 2011 at 6:01 am

    wah dr rakesh patak apne mauh miya mitthu.

  8. usaji

    January 23, 2011 at 6:33 pm

    hi main yahan mumbai ke akhbaron ki baat karna chahta hun mahanagar jaise akhbaar aaj kal bik chuke hain jo khabar chhapne ke liye paison ki farmaish karte hain.

  9. kamal

    January 28, 2011 at 7:32 pm

    are mahanagar jaise akhbar ko kutta bhi puchta to aadmi kyon puchega,isliye log mahanagar ko take bhav nahi dete ,usme city chief to maha jholar admi hai jo pehle navbharat ko lakhon ka chuna laga chuka hai,aise aadmi ko to vahan se turant nikal dena chahiye chunki woh akhbar ki maa behan kar rahaha hai vaise uske patan ki shuruvat ho chuki aur kuch hi din me woh kahin aur najar aayega.

  10. satyaveer singh

    February 9, 2011 at 5:55 am

    yashwant ji,

    aapsey agrah hai ki aap in sabb fijul ki chacrhoa ko jor na de kyunki yeh charchayen sirf rakesh pathak dwara ydvaai ja rahi hai. rakesh pathak koi doodh ka dhula nahi hai.
    usey navbharat se kyu hataya gaya tha yeh sab ko maloom hona chahiye hadtaal tou us ke dwara blackmail karney ka hathkanda tha.
    rakesh pathak 1 kathit patrakaar hai uski neech mansikta ke kaaran he uskey virrudh shikayat aaney par navbhart gwalior se uska tabadala bhopal kiya gaya tha jab usey is baat ka aihsaas ho gaya ki bhopal mai tou vo aiyashi nahi kar payega tou usney maliko ko hadtaal ka hathkanda dikha kar daraney ka prayas kiya gaya jiskey parinaam swaroop uski gaand pe laat maar di gayi thi.

  11. gorelal verma

    February 15, 2011 at 8:55 am

    all
    boolywood flop.
    nat sexy movies.
    all hiro not sexy
    bad indian caltcher.

  12. damodarvalecha

    March 16, 2011 at 12:57 pm

    BADA DUKH HUWA YEH JANKAR KI ITNE BADE AKHBAR KA YEH HALL HAI ,TO HAMARE JAISE SHOTE AKHBAR KE SAMPADAK KA KYA HALL HOGA ?

  13. ravi pipal

    June 8, 2012 at 10:29 pm

    मुंबई संस्करण मे मेरे अनेक व्यंग्य छापने के बाद जब मैंने एक दिन पारिश्रमिक की बात चलाई तो उत्तर था ” यह हमारी पॉलिसी के ख़िलाफ़ है ”

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