प्रदीप सौरभ सदाबहार पत्रकार हैं. यायावर पत्रकार हैं. खुले दिल-दिमाग उर्फ बिंदास पत्रकार हैं. बहुमुखी प्रतिभा के धनी पत्रकार हैं. और, अब तो अच्छे-खासे साहित्यकार भी हैं. उनका लिखा उपन्यास ‘मुन्नी मोबाइल’ जबरदस्त चर्चा में रहा. चर्चा ऐसी हुई कि मुन्नी मोबाइल होने के बाद बदनाम भी हो गई, बालीवुड वालों की कृपा से. प्रदीप सौरभ का लिखा एक और उपन्यास कुछ ही घंटों में हम सबके सामने आने वाला है. नया उपन्यास आज लोकार्पित होने वाला है. शाम साढ़े पांच बजे. दिल्ली के साहित्य अकादमी सभागार, मंडी हाउस में. इस नए उपन्यास का नाम है तीसरी ताली. यह हिजड़ों पर केंद्रित है. हिंजड़ों पर हिंदी में लिखा गया संभवतः यह पहला उपन्यास है. इसे कोई अगर पढ़ना शुरू करे तो एक सांस में पढ़ जाएगा. हिजड़ों के दुख-सुख को पूरी ईमानदारी से बयान किया गया है. उन दुर्भाग्यशाली क्षणों को भी लाइव किया है प्रदीप सौरभ ने जिसमें एक अच्छे-खासे पुरुष के लिंग को काटकर उसे हिजड़ा बना दिया जाता है. लोकार्पण के कुछ घंटे पहले इस उपन्यास के एक छोटे हिस्से को भड़ास4मीडिया के पाठकों के सम्मुख रखा जा रहा है. -एडिटर, भड़ास4मीडिया
प्रदीप सौरभ के नए उपन्यास ‘तीसरी ताली’ का एक अंश
हिजड़े ऐसे फाकाकसी करनेवाले लोगों को आसानी से ताड़ लेते हैं। इसीलिये डिंपल ने राजा को ताड़ लिया था। वह डिंपल को जवाब देता कि उससे पहले उसके दिमाग में बुरे-बुरे सवाल कौंधने लगे–‘अरे, यह तो औरत नहीं, हिजड़ा है। हिजड़े तो अच्छे-भले लोगों को पकड़कर हिजड़ा बना देते हैं।’ राजा ने हिजड़ों के बारे में ऐसी कहानियां पहले से सुन रखीं थीं। उसे कुछ सूझ नहीं रहा था। वह डिंपल के सवाल पर चुप्पी साध गया।
डिंपल ने फिर अपना सवाल दोहराया, ‘‘काम की तलाश है? दुखी बैठे रहोगे तो भूख से मर जाओगे!’’
भूख का नाम सुनते ही राजा का पेट तालियां बजाने लगा। वह सोचने लगा कि इतने बड़े शहर में यह अकेला है, जिसने उसकी सुध ली है। हिजड़ा है तो क्या, खाना तो खिलाएगा ही! कुछ काम-धंधे में भी लगा सकता है। उसके मन में यह विचार भी आया कि असली हिजड़े तो वे हैं, जिन्होंने मेरी कला की इज्जत नहीं की और मुझे भूख से मरने के लिए छोड़ दिया। हिजड़े भी तो भगवान ने बनाए हैं। यह सब सोचते हुए उसने मन-ही-मन डिंपल के साथ जाने का फैसला कर लिया। वह बोला, ‘‘कुछ काम-वाम दिला सकती हैं? मैं बहुत परेशान हूं!’’
‘‘मेरे पास दो गाय हैं और एक भैंस है। तुम उनको संभाल लेना। रहने के लिए कमरा भी दे दूंगी।’’ डिंपल विनम्रता से बोली।
‘‘मुझे गाय-भैंस का काम नहीं आता।’’ फिर कुछ सोचकर बोला, ‘‘खैर, पेट की आग यह भी सिखा देगी।’’ और यह कहते हुए राजा उठ खड़ा हुआ।
डिंपल और राजा टैक्सीस्टैंड पहुंचे। टैक्सी से डिम्पल के डेरे तकं पहुंचने में एक घंटा लगा। डेरे में डिंपल की मंडली के सदस्य नित्यकर्म में व्यस्त थे। डिंपल के साथ नया मेहमान को देखकर सबको कौतूहल हुआ, पर डिंपल ने उनकी जिज्ञासा बहुत जल्द खत्म कर दी। उसने सबसे राजा का परिचय कराया और मुलाकात की पूरी कहानी सुनाई। राजा को उसका कमरा बता दिया गया। परिचय के दौरान राजा की नजर किसी पर नहीं थी, पर दो आंखें उसे बराबर निहार रही थीं। उन आंखों ने राजा को अपने भीतर ठहरा लिया था और वे आंखें थीं मंजू की, जिस पर जवानी का सोलहवां साल अपना रंग दिखा रहा था।
अब मंजू की नजरें हमेशा राजा के इर्द-गिर्द रहने लगीं। राजा इन सबसे बेखबर अपने काम में व्यस्त रहता। यों भी इन लोगों में उसकी दिलचस्पी न होना स्वाभाविक था। वह सिर्फ अपने पेट की आग बुझाने के लिए वहां रह रहा था। लेकिन मंजू के भीतर कामुकता की आग इस पेट की आग से ज्यादा दहक रही थी।
राजा ने धीरे-धीरे गाय-भैंस की दुलत्ती खाते हुए दूध दुहना और उन्हें संभालना सीख लिया। रोज भर-पेट खाना खाता। ढोलकिये और हरमोनिये के साथ कभी-कभी नाचता भी। डिम्पल उसके नाच से खासी प्रभावित थी। एक दिन डिंपल और मंडली के सदस्य जब काम-धंधे के लिए निकले तो मंजू बीमारी का बहाना बना कर डेरे पर ही रह गई। अब डेरे पर मंजू और राजा अकेले थे।
खाना-पीना करने के बाद मंजू ने राजा को अपने कमरे में बुलाया, और जैसे ही वह मंजू के कमरे में दाखिल हुआ, मंजू ने उसे अपनी बांहों की गिरफ्त में लेकर बेताहाशा चूमना शुरू कर दिया। इतना ही नहीं, राजा का पुरुषांग अपने हाथों में भरकर वह उससे खेलने लगी। राजा को कुछ समझ नहीं आ रहा था। सखी-भाव से ग्रस्त होकर वह अपने इस अंग की ताकत भूल चुका था। उसे समझ नहीं आ रहा था कि मंजू का वह कैसे प्रतिवाद करे या फिर न करे।
मंजू ने देखते-ही-देखते राजा के पुरुषांग को अपने मुंह में डाल लिया और उसे लालीपॉप की तरह चूसने लगी। अब राजा का सखी-भाव खत्म होने लगा। उसके अंदर एक तरह की उत्तेजना जागने लगी। मर्दानगी की उत्तेजना। उसका पुरुषांग लकड़ी की तरह सख्त होने लगा। इस अनुभव से वह अनभिज्ञ था। मंजू की आग ज्वालामुखी में तब्दील होती जा रही थी। पहली बार उसे किसी मर्द का स्पर्श मिला था। राजा ने अंतत: मंजू के आगे आत्मसमर्पण कर दिया। अब राजा के हाथ और होंठ भी इस अहसास में डूबने लगे। राजा ने ऐसा आनंद पहले कभी महसूस नहीं किया था। दोनों एक दूसरे के उत्तेजक अंगों के साथ खेलने लगे। दोनों के लिए खेल नया था और नए खिलाड़ियों की तरह दोनों में अनुभव के बजाय जोश ज्यादा था। एक-दूसरे को मात देने की कोशिश में दोनों के भीतर अलग-अलग तरह का जुनून भर उठा था। काफी देर इस खेल की उठा-पटक में जब दोनों का शरीर शिथिल पड़ गया और पसीने से तरबतर एक-दूसरे से अलग हुए, तो काफी देर तक यों ही पड़े रहे– एक-दूसरे की जिस्मानी खुशबू को महसूस करते हुए।
पुरुष-भोग के बाद मंजू में पूरी तरह स्त्रीत्व जाग गया था। उसकी आंखों में एक खास तरह की चमक पैदा हो गई थी। ऐसा सुख उसे कभी किसी चीज से नहीं मिला था। वह उठी और मुंह-हाथ धोकर राजा के लिए एक गिलास दूध ले आई। राजा कमरे में बेसुध लेटा हुआ था। उसे समझ ही नहीं आ रहा था कि उसके साथ क्या हुआ। लेकिन मंजू को भोगने के बाद उसने यह जरूर महसूस किया था कि यह कोई अलौकिक आनंद की चीज है। मंजू ने उसे उठाया और दूध पिलाया। प्यार से माथे पर चुंबन लिया। दूध पीने के बाद राजा की चेतना लौटी। यह सुख उसे भी स्वर्गिक लगा।
इस मिलन के बाद मंजू और राजा की दुनिया ही बदल गई थी। मंजू की नजरों में हर समय खुमार-सा रहने लगा और सीने के उभारों में एक कसमसाहट रहने लगी। उसकी चाल में मोरनी के नृत्य जैसी झंकार रहती जवानी का नया जोश उसे मदमस्त बनाए रखता। दूसरी तरफ राजा भी अपनी दिनचर्या में रस लेने लगा था। गाय-भैंसों को चारा खिलाते और उन्हे दुहते हुए वह अजीब-से आनंद से भर उठता। उनके स्पर्श में वह मंजू को महसूस करता और दोनों एक-दूसरे से मिलने का कोई मौका छोड़ते या यों कहें कि मौका तलाशते।
उम्र का अल्हड़पन उन्हें जब भी मिलाता, दोनों एक नई ताज़गी से भर उठते। मंजू की सुंदरता और भी नशीली और तीखी हो गई थी। नाचती तो वह बढ़िया थी ही, राजा के साथ उसने सुर में गाना भी सीख लिया था। दोेनों की जिंदगी सुरमय हो रही थी। समय पंख लगाकर उड़ने लगा था।
डिंपल मंजू में आ रहे इस बदलाव से कुछ हैरान होते हुए भी ज्यादा परेशान नहीं थी, पर मंडली के साथ धंधे पर जाने में जब वह अक्सर ही आनाकानी करने लगी, तो डिंपल का चिंतित होना स्वाभाविक था। हालांकि डिंपल के मन में हमेशा यह चोर रहता था कि मंजू उसकी बिरादरी की नहीं है, पर उसने मंजू को बड़े नाजों से पाला था और उसे हर बुरी नजर से दूर रखने में उसने कोई कसर नहीं छोड़ी थी। हर शनिवार को वह शनि मंदिर में जाकर उसकी नजर उतरवाती थी। उसके खाने-पीने का भी वह खास ध्यान रखती। सोते वक्त अपने हाथ से दूध पिलाती । मंजू भी डिम्पल को अपनी मां की ही तरह मानती थी।
रविवार का दिन था। दोपहर का वक्त। मौसम में हलकी-हलकी ठंड थी। गुनगुनी धूप अच्छी लग रही थी। सिद्धार्थ एनक्लेव के लोग कॉलोनी के अंदर बने पार्क में धूप का आनंद ले रहे थे। बच्चे धमा-चौकड़ी मचा रहे थे। कुछ औरतें स्वेटर बुन रही थीं तो कुछ के हाथ में क्रोशिया थी। कुछेक औरतें चुगली-चर्चा का आनंद ले रहीं थीं। डिंपल एंड पार्टी फ्लैट नम्बर 565 की तलाश में जुटी थीं और उसकी भी गाइड थी आनंदी आंटी। वह आगे-आगे चल रही थीं और डिंपल पीछे-पीछे। दूर से फ्लैट की ओर इशारा करके आंटी अपने घर की तरफ चल दी थी।
डिंपल ने फ्लैट की घंटी बजाई। सामने एक भरी-पूरी औरत प्रकट हुई। पोपले मुंह वाली। मांग में गाढ़ा सिंदूर चमक रहा था। तभी इस बीच ढोलकिये और हरमोनिये ने ठेका लगा दिया। हिजड़ों को देखकर वह औरत अंदर मुड़ी और जोर-जोर से कहने लगी, ‘‘हिजड़े आ गए, हिजड़े आ गए।’’
घर में हलचल मच गई। फ्लैट बसंत पुरोहित का था। वे लोहे के व्यवसायी थे। घर की औरतें इकट्ठा हो गईं। पुरोहित को एक सप्ताह पहले बेटी हुई थी। उनकी बीवी सोहर में थी। सिंदूरवाली औरत उनकी सास थी। बेटी के घर लड़की की खबर सुनकर मेरठ से आई थी। हिजड़ों का मोर्चा पुरोहित की सास ने ही संभाला। वैसे पुरोहित परिवार में हिजड़ों को देखकर मॉडर्न लोगों की तरह कोई मुंह नहीं बनाता था। नाच-गाना शुरू हुआ। मंजू नए से नए फिल्मी गाने पर थिरकती रही। लेकिन अचानक नाचते हुए उसकी आंखों के सामने अंधेरा छा गया। वह नाच रोककर एक कोने में जा बैठी। ढोलक और हारमोनियम की आवाज थम गई। उसे उलटी का अहसास हुआ। उसने बगल की नाली में जाकर उलटी कर दी। उसकी उल्टी से डिंपल के कान खड़े हो गए। उसने मंजू से पूछा, ‘‘बेटी क्या हो गया?’’
‘‘लगता है कुछ उलटा-पुलटा खा लिया होगा। हजम नहीं हुआ। इसीलिए उलटी हो गई।’’-मंजू आनेवाले खतरे से बेखबर होती हुई बोली।
थोड़ी देर नाच-गाना चला। शगुन लेकर मंडली डेरे पर लौट आई। वहां पहुंचकर डिंपल ने मंजू से पूछा- ‘‘बेटी, ज्यादा तकलीफ हो तो डाक्टर को बुला लेते हैं।’’
‘‘नहीं-नहीं। कोई खास बात नहीं है। ठीक हो जाएगा।’’, मंजू ने बेपरवाही से जवाब दिया।
बात आई-गई हो गई, लेकिन डिंपल के मन का चोर कुलांचे भरने लगा, ‘‘कहीं मंजू गर्भवती तो नहीं हो गई है?’’
डिंपल ऐसी ही ऊट-पटांग बातें सोचती रही। फिर अपने मन को समझाने के लिए उसने सोचा,‘‘हिजड़ा भी कहीं गर्भ धारण कर सकता है! हिजड़े के बच्चे की बात जो भी सुनेगा, उसके पैरो तले की जमीन वैसे ही खिसक जाएगी। पूरी बिरादरी में थू-थू हो जायेगी।’’
कुछ हफ्ते गुजरे। मंजू का पेट दिखने लगा। उसे वह लाख अपनी साड़ी से छिपाने की कोशिश करती, लेकिन चार महीने के बच्चे का पेट यूं तो नहीं छिपता। डिम्पल ने उसे बाहर ले जाना बंद कर दिया। उसके ऊपर सख्त पहरा बैठा दिया गया। वह रात-रात भर सोचती, ‘आखिर उसने ऐसा क्यों किया? एक मुक्कमल लडकी को उसने हिजड़ा क्यों बना दिया? सिर्फ अपने थोड़े से लाभ के लिए?’’ यह सब सोचते हुए वह रोने लगती, ‘‘मैं मंजू को मां बनाने वाले को नहीं छोड़ूंगीं… मंजू ने बिरादरी में हमारी इज्जत मिट्टी में मिला दी… उसको बच्चा गिरवाना ही पड़ेगा।’
हिजड़ों की बिरादरी में लड़कियों को हिजड़ा बनाने की मनाही है। हिजड़ों की गुरू संत आशामाई बराबर कहती हैं–‘कुदरत से खिलवाड़ करने का किसी को हक नहीं है। अपने फायदे के लिए किसी को हिजड़ा बनाना पाप है। ऐसा करने पर हिजड़े को सौ बार हिजड़े का ही जनम लेना पड़ता है और फिर भी उसका पाप कम नहीं होता है।’’
संत आशामाई स्वयं हिजड़ा हैं– हरिद्वार के संत शिरोमणि सिद्धेश्वर स्वामी की शिष्या। उन्होंने बाकायदा उनसे सन्यास की दीक्षा ली है। बचपन से ही उनका रुझान भगवान के प्रति था। जब छोटी थीं तो घर छोड़कर हरिद्वार पहुंच गई थीं। वहीं उन्होंने पहली बार भगवा धारण किया और तब से अब तक वे भगवा में ही रहती हैं। लंबा समय हरिद्वार में गुजारने के बाद उन्होंने कुतुबमीनार के पास महरौली की पहाड़ियों में अपना ठिकाना बना लिया था। अब वहीं ईश्वर–भक्ति में लीन रहती हैं। हिजड़ों की मानी हुई पीठ है उनकी। उनके हर छोटे-बड़े झगड़ों में उनका फैसला अंतिम होेता है। कहते हैं कि वे जिसको श्राप देती हैं, वह पनप नहीं पाता। उनके दर्शन के लिए दूर-दूर से आम आदमी भी आते हैं अपनी सुख-समृद्धि की कामना के लिए। आम धारणा हैं कि जिसको उन्होंने दिल से आशीर्वाद दे दिया, उसकी बात बन जाती है।
डिंपल के जेहन में बार-बार संत आशामाई के विचार गूंजते। बावजूद इसके उसने मंजू को गर्भवती बनानेवाले को सजा देने का फैसला कर लिया था। दरअसलं मंजू बचपन सें हिजड़ों के साथ रहते-रहते अपने को हिजड़ा समझने लगी थी। उसके हाव-भाव भी वैसे हो गए थे। कभी मंडली के किसी सदस्य को इस बात का एहसास ही नहीं हुआ था कि वह स्त्री है। असल में मंजू जब पैदा हुई,तो उसके गरीब माता-पिता ने दान-दहेज के डर से उसे थोड़े से पैसों के लिए डिंपल को बेच दिया था। डिम्पल का उस वक्त मातृत्व जागृत हो गया था। उसे बच्चे की आस थी। बच्चा वह जन नहीं सकती थी। वह कभी-कभी सोचती कि जो जन नहीं सकते, वे बच्चों के ऊपर पड़नेवाले काले साए को दूर रखने का आशीर्वाद देते हैं। बच्ची को लेते वक्त उसका मातृत्व हिलोरे मार रहा था। उसने सोचा था कि वह मंजू को लाड़-प्यार से पालेगी। पढ़ाए-लिखाएगी। बड़ी करके उसकी शादी करेगी। शुरूआत में तो उसकी सोच ऐसी ही थी। लेकिन धीरे-धीरे उसे लगने लगा कि हिजड़े के बच्चे को कौन दाखिला देगा स्कूल में? वह क्या जवाब देगी कि उसे यह लड़की कहांं से मिली? उसका बाप कौन है? और सबसे बड़ा सवाल यह कि कौन शरीफजादा हिजड़े की लड़की से शादी करेगा? इन सवालों के आगे जब डिम्पल हार गई, तो उसने मंजू को हिजड़ा बनाने का फैसला कर लिया। उसे नाच-गाना सिखाया और मंडली के साथ ले जाने लगी। इस बीच उसे यह पता ही नहीं लगा कि वह कब जवान हो गई। वह इस बात से बेपरवाह रहती कि मंजू के भीतर कभी जवानी भी जोर मारेगी। वह जिस राजा को उसके पेट की भूख मिटाने के लिए अपने डेरे पर ले आई थी, उसने कल उसकी मंजू को पूर्ण स्त्री बना दिया, वह जान नहीं सकी थी। वह ऐसा सोच भी नहीं सकती थी। उम्र के इस उफान पर तमाम पहरे काम न आए। मंजू ने बिना ब्याहे राजा की पत्नी हो गई। वह अपनी मांग में राजा के नाम का सिंदूर भी धारण करने लगी। यह सब होता रहा और डिंपल को कानोकान खबर तक न हुई।
सर्दी की रात थी। गली में कुत्तों के भौंकने की आवाज बीच-बीच में सन्नाटे की एकाग्रता को तोड़ देती थी। कभी-कभी किसी शराबी की लड़खड़ाती पदचाप सो रहे अंधेरे को झकझोर देती थी। जंगल होता तो सियारों की आवाजें डरा सकती थीं। मगर ये दिल्ली का गांव था। जंगल से भी बर्बर। जंगल के पशु-पक्षियों में एक तालमेल होता है, लेकिन दिल्ली में तो हर बड़ा छोटे को लीलने के लिए तैयार रहता है। तालमेल यहां सपना है। जिसकी लाठी उसकी भैंस। कहने को यहां आदमी रहते हैं, मगर उनके भेड़ियों जैसे नुकीले दांत दिखते नहीं हैं। लोमड़ियों की चालाकी उनके रक्त में प्रवाहित रहती है। शेर की तरह आदमखोर होने में भी उन्हें देर नहीं लगती। जिसका दांव लगा, उसने ही कमजोर को दबोच लिया। अजीबोगरीब है दिल्ली का जंगल।
डिंपल के डेरे में भी अंधेरा पसरा था, मगर उसके अपने कमरे में छोटी बत्ती जल रही थी और वहां मौजूद पांच लोग शाम से ही दारूबाजी कर रहे थे। डिंपल कभी-कभी मुसीबत में इनको याद कर लेती थी और काम हो जाने के बाद अच्छे पैसे देकर विदा कर देती थी। लेकिन आज वे लोग दारू पीकर मस्त हो गए थे, निर्वाण की स्थिति में पहुंच गए थे। अब उनके लिए न कुछ अच्छा था न कुछ बुरा। डिंपल ने सोचा, यही सही वक्त है। वह उठी और सबको अपने पीछे चलने का इशारा किया। सभी उसके पीछे-पीछे आंगन की ओर चल दिए।
राजा के कमरे का दरवाजा उड़का हुआ था। दरअसल डेरे में कोई भी अंदर से सिटकनी बंद नहीं करता था। डिंपल के हाथ का हलका सा दबाव पड़ते ही दरवाजा पूरा खुल गया और चांदनी रात होने के कारण अंदर का कुछ-कुछ धुंधला-सा दिखाई पड़ने लगा। डिंपल के साथ वे पांचों भी अंदर हो लिए। राजा आराम से सो रहा था। उसके होंठों परं हलकी-सी मुस्कान तैर रही थी। शायद वह कोई हसीन सपना देख रहा था। डिम्पल ने दरवाजा अंदर से बंद कर दिया। दो मुसटंडों ने राजा के हाथ और दो ने उसके पैर अपने हाथों में जकड़ लिए। राजा हकबका गया। हिल न पाया। उसने चिल्लाने की कोशिश की, पर उसके मुंह से आवाज न निकली। तभी डिम्पल ने राजा से कहा, ‘‘चुपचाप लेटे रहो। चीखने-चिल्लाने की जरूरत नहीं है।’’
राजा कुछ समझ नहीं पा रहा था कि उसके साथ क्या होनेवाला है। उसके दिमाग में यह बात बिजली की तरह कौंध गई कि कहीं डिम्पल भी मंजू की तरह उसके साथ जोर-जबरदस्ती करके संबंध तो नहीं बनाना चाहती है! पर उसे इस बात में दम नहीं लगा उसने सोचा-‘अगर ऐसा होता तो मुसटंडों की उसे क्या जरूरत थी। वह मालकिन थी डेरे की। अन्नदाता। वह उससे कुछ भी करा सकती थी।’
राजा अभी यह सब सोच रहा था कि मुसटंडों ने अपनी पकड़ और मजबूत कर दी। राजा बेचैन हो उठा। इसी बीच डिम्पल ने उसके पैंट की चेन खोल दी और उसके पुरुषांग को बाहर निकाल लिया। उसे पकड़ते हुए वह सोचने लगी, ‘इसी से उसने उसकी बेटी को गर्भवती बनाया है। अब न बांस रहेगा और न ही बजेगी बांसुरी।’
अचानक एक आदमी ने राजा के पुरुषांग पर वार किया। कमरे में एक चीख उभरी। राज के हाथ पकड़े एक मुसटंडे ने उसके मुंह पर हाथ रख दिया। राजा तड़प रहा था, लेकिन कुछ करने में असहाय था। कमरे में खून की गंगा-जमुना बह उठी। मुसटंडों से अपने को छुड़ाने की राजा की हर कोशिश नाकाम हो गई। अंतत: पीड़ा से कराहते हुए बेहोश हो गया।
अब सजा की बारी मंजू की थी। मगर उसके साथ डिंपल ऐसा कुछ नहीं करना चाहती थी, जिससे उसे तकलीफ हो। उसने नर्सिंग होम में बच्चा गिराने का फैसला किया। मुनीरका में कई नर्सिग होम थे, जो अवैध गर्भपात कराने के लिए जाने जाते थे। अगली सुबह डिम्पल एक नर्सिंग होम में जाकर मामला तय कर आई। गर्भपात के साथ उसके पैकेज में बच्चेदानी भी बाहर निकालने का अनुबंध था। बच्चेदानी ही नहीं होगी तो बच्चा कैसे ठहरेगा।
राजा के कमरे के बाहर पहरा लगा हुआ था। मंजू नहा-धोकर निकली, तो उसे राजा जानवरों सानी-पानी करता नहीं दिखा। उसे बेचैनी होने लगी। सुबह एक बार जब तक वह राजा को जी भरकर नहीं देख लेती थी, उसे चैन नहीं आता था। उसे देखने के बाद वह अपने सिंदूर पर हाथ फेरती हुई उसकी सलामती की दुआ करती थी। आज राजा दिखाई नहीं दिया, तो मंजू ने सोचा कहीं वह बीमार तो नहीं हो गया। यह ख्याल मन में आते ही वह राजा के कमरे की ओर बढ़ी, लेकिन कमरे के बाहर खाट पर लेटे मुसटंडे ने उसे रोक दिया। मंजू का माथा ठनका।
डिंपल आज धंधे में नहीं गई थी। मंजू को राजा के कमरे के बाहर देख उसने कहा-‘‘राजा तीन-चार दिन के लिए बाहर गया है। मैंने उसे अंबाला भेजा है।’’
डिंपल की यह बात सुनकर मंजू को इत्मीनान हो गया। उसे क्या पता था कि उसकी दुनिया में क्या होने वाला है… कि उसका मातृत्व का नशा काफूर होनेवाला है। मंजू बच्चा जनने के लिए इतनी उत्साहित थी कि उसके पोर-पोर से खुशी की तरंगें उठती थीं। फुरसत के क्षणों में अपना पेट सोहराते हुए वह अपने बच्चे से बतियाती। पूछती, ‘लड़का हो कि लड़की? बोलते नहीं हो… बस, हिलते-डुलते हो! कुछ तो बोलो अपनी मां से। कम-से-कम भूख लगने पर तो रोकर बताओ।’
मंजू ऐसी न जाने कितनी बातें अपने गर्भस्थ शिशु से किया करती। अगर उसके गर्भवती होने की बात किसी को न पता हो तो वह आसानी से उसे पगलिया कह सकता था। वह और भी सपने बुनती, ‘बच्चा पैदा करने के बाद में नाच-गाना छोड़ दूंगी, वरना हिजड़़ों के बीच रहकर मेरा बच्चा भी मेरी तरह हिजड़ा बन जाएगा। राजा के साथ कहीं अलग घर बसाऊंगी। बच्चे को पढ़ा-लिखाकर बड़ा आदमी बनाऊंगी…’ मंजू इस बात से अनजान थी कि डिंपल उसके सपनों को बदरंग करनेवाली है।
डिंपल के सामने अब यक्ष-प्रश्न यह था कि मंजू को नर्सिंग होम कैसे ले जाए? उससे क्या बहाना बनाए। अंतत: उसे एक तरकीब सूझी। मंजू को बुलाकर ममतामयी आवाज में उसने कहा, ‘‘बेटी, बच्चा चार माह का हो गया है। डाक्टरनी से चेकअप करा लेते हैं। इस समय डाक्टरनी को दिखाना जरूरी होता है।’’
मंजू पर डिंपल का तीर चल गया था। वह तैयार हो गई चैकअप कराने के लिए। डिंपल ने झटपट कपड़े बदले और मंजू को साथ लेकर तय नर्सिंग होम के लिए रवाना हो गई। मंजू को इस समय डिंपल ममतामयी मां का प्रतिरूप लग रही थी।
दो दिन बीत चुके थे। राजा को होश आ गया था। वह रोए जा रहा था। उसकी मर्दानगी लुट गई थी। वह अब एक पल भी डिंपल के डेरे में नहीं रहना चाहता था। मौका देखकर डेरे से रफूचक्कर हो गया। उसके कपड़े खून से लथपथ हो रहे थे। ढेर सारा खून निकलने के कारण उससे चला नहीं जा रहा था। कमजोरी ने उसे बुरी तरह घेर लिया था। किसी तरह लड़खड़़ाते हुये वह चाणक्यपुरी पुलिस स्टेशन पहुंचा और अपनी आप बीती इंस्पेक्टर को सुनाई। पुलिस पार्टी तैयार होकर डिंपल के डेरे की ओर रवाना हो गई।
उधर चेकअप के नाम पर मंजू नर्सिंग होम के आपरेशन थिएटर में थी। उसको एनेस्थीसिया लगाकर बेहोश कर दिया गया। आपरेशन शुरू हुआ और बच्चे को जन्म लेने से पहले ही मार दिया गया। आपरेशन कर रही लेडी डाक्टरों ने देखा कि अजन्मी बच्ची लड़की है। लगे हाथ मंजू की बच्चेदानी भी निकाल दी गई।
डाक्टरनी ने आपरेशन थिएटर से निकल कर बताया कि सब ठीकठाक हो गया है, पर मंजू को कुछ दिन अस्पताल में रखना होगा। बच्चेदानी निकालने के बाद की देखभाल जरूरी है। पर डिंपल के चेहरे पर अब संतोष था। वह खुद को विजयी मान रही थी। उसने दोनों को अपनी-अपनी तरह की सजा दे दी थी।
सारा दिन नर्सिंग होम में गुजारने के बाद डिंपल जब देर शाम को डेरे पर आई, तो उसने देखा कि वहां पुलिस मौजूद है। उसे कुछ समझ नहीं आया। डेरे के अंदर घुसते ही बाहर खड़े पुलिसवाले ने उससे पूछा, ‘‘तू ही डिंपल है। ’’
‘‘हां, मैं ही डिंपल हूं।’’
‘‘चल इंस्पेक्टर साहब ने बुलाया है।’’-पुलिसिये ने कड़कदार आवाज में कहा।
‘‘मैंने कौन सा जुलुम कर दिया जो थाने में बुलाया है?’’ डिंपल हवलदार से उलझते हुए बोली, ‘‘हम तो लोगों की खुशियों में गाते-बजाते और नाचते हैं। हम कोई चोर–उचक्के नहीं हैं, जो हमें थाने में बुलाया जाए।’’
‘सीधे-सीधे चलती है कि जोर-जबरदस्ती से चलेगी!’’ हवलदार धमकाने के अंदाज मे बोला।
डिंपल समझ गई कि थाने जाए बिना काम नहीं चलेगा। मंजू की जिम्मेदारी अपने दूसरे साथियों को सौंपकर वह पुलिस की जीप में बैठ गई। थाने पहुंच कर उसने राजा को बेंच पर बेसुध बैठे देखा तो उसके होश उड़ गए। उसे माजरा समझने में देर नहीं लगी।
नए उपन्यास ‘तीसरी ताली’ में लेखक प्रदीप सौरभ का परिचय और उपन्यास की सुधीश पचौरी द्वारा की गई समीक्षा इस प्रकार है….














uday
December 8, 2010 at 9:52 am
… pradeep saurabh ji ko badhaai va shubhakaamanaayen !!!
Neeraj Narwar
December 8, 2010 at 11:35 am
pradeep surabh ji ko apne is upnyaas ke liye badhaai. aapne upanyaas me jo kahani lihi hai kaabiletaarif hai. aapko baar baar pranaam
Neeraj Narwar
Dholpur Rajasthan
9314370552
somveer sharma bhiwani
December 8, 2010 at 12:37 pm
bhai shab parnam please pardeep ji ka mobile number mil sakta hai
kumar harsh
December 8, 2010 at 3:37 pm
bahut-bahut badhai,pradeep ji.
dhiraj dhillon
December 9, 2010 at 8:38 am
bahut sunder, ek dam jeevant hai teesri taali.
Puneet Kumar Malaviya
December 9, 2010 at 8:59 am
Pradeep Bhaiya Bahut si badhai ho ..
Yahan Allahabad mein kahan se milga ye Upannyas….
Padhne ki ichcha hai….
Shubhakaamanaayen…
sdesd
December 10, 2010 at 10:27 am
sdsdsdsdsds
praveen khariwal
December 12, 2010 at 12:17 pm
badhai… jinka koi nahi unka koi to nikla…