: याद किए गए केदारनाथ अग्रवाल : कवि केदार की जनवादी लेखनी पूर्णरूपेण भारत की सोंधी मिट्टी की देन है। इसीलिए इनकी कविताओं में भारत की धरती की सुगंध और आस्था का स्वर मिलता है। यही कारण है कि उनकी कविताओं का अनुवाद रूसी, जर्मन, चेक और अंग्रेजी में हुआ है। जब चार बड़े कवियों की जन्मशती का वर्ष हो और हिंदी भाषा की सम्वृद्धि के उद्देश्य से स्थापित महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा द्वारा ‘बीसवीं सदी का अर्थ : जन्मशती का सन्दर्भ’ श्रृंखला का आयोजन किया गया।
इसके तहत इन महान विभूतियों की रचनाओं को वर्तमान संदर्भ में टटोलने के प्रयास से उनके कर्मभूमि में विमर्श करने का निर्णय कोई आम नहीं है, अपितु वर्तमान में साहित्य, संस्कृति पर मंडरा रहे खतरों से कैसे मुकाबला किया जा सकता है, इसकी ओर भी सोचने के लिए नया वातावरण निर्मित करना है।
इसी सोच का नतीजा है कि ‘युग की गंगा’, ‘फूल नहीं, रंग बोलते हैं’, ‘गुलमेंहदी’, ‘ हे मेरी तुम’, ‘बोलेबोल अबोल’, ‘जमुन जल तुम’, ‘कहें केदार खरी खरी’, ‘ मार प्यार की थापें’ जैसी अमूल्य कृति रचने वाले प्रगतिशील काव्य-धारा के एक प्रमुख कवि केदारनाथ अग्रवाल पर उनके गृह जनपद बांदा में वैचारिक विमर्श के लिए दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी में पहुंचे साहित्यिक चिंतकों के विमर्श का लब्बोलुआब यही था कि वर्तमान संदर्भ में बाजारपरस्त शक्ति के आगे हम मानवीय मूल्यों से कैसे कटते जा रहे हैं। छिपी ताकतें नियोजनबद्ध तरीके से हमें असंवेदनशील बनाते जा रहे हैं। वर्तमान संदर्भों में केदारनाथ के साहित्य पर पुनर्विश्लेषण किए जाने की जरूरत है।
उदघाटन सत्र की अध्यक्षता करते हुए विश्वविद्यालय के कुलपति विभूति नारायण राय ने कहा कि बांदा में आकर केदारजी जैसे जनकवि को याद करना एक तरह से अलग व अनूठा प्रयास है। इलाहाबाद व गाजियाबाद में जब भी उनसे मुलाकातें होती थीं, उनसे वार्तालाप करना ही एक रोमांचकारी अनुभव था मेरे लिए। उनकी बातचीत में आमजनों की पीड़ा स्पष्ट रूप से परिलक्षित होती थी। विश्वविद्यालय व केदार शोध पीठ, बांदा के संयुक्त तत्वावधान में ‘केदारनाथ अग्रवाल एकाग्र’ पर आयोजित समारोह के दौरान देशभर के साहित्यिक चिंतक विमर्श के लिए एकत्रित हुए। साहित्यकार से.रा.यात्री, प्रह्लाद अग्रवाल, दिनेश कुमार शुक्ल, सुनीता अग्रवाल, महेश कटारे, भारत भारद्वाज जैसे कई चिंतक पहुंचे थे बांदा में।
समारोह में युवा कवि पंकज राग को उनके कविता संग्रह ‘यह भूमंडल की रात है’, के लिए केदार सम्मान 2010 से पुरस्कृत किया गया। समारोह यादगार और भी बन गया जब विश्वविद्यालय द्वारा केदार जी पर प्रकाशित संचयिता : केदारनाथ अग्रवाल तथा अप्रकाशित रचनाएं- केदार : शेष अशेष एवं प्रिये प्रिय मन (पत्नी को लिखे पत्र), कविता की बात (कविता पर आलेख), उन्मादिनी (कहानी संग्रह), ‘वचन’ पत्रिका के केदार नाथ अग्रवाल विशेषांक का विमोचन किया गया। शुरुआत में कवि केदार की नातिन सुनीता अग्रवाल व केदार शोध पीठ के सचिव नरेन्द्र पुण्डरीक ने कुलपति विभूति नारायण राय को केदार जी की हस्तलिखित पांडुलिपियां सौपीं।
विमर्श करते हुए पंकज राग ने कहा कि मैंने कविता की चली आ रही धारा को मोड़ने की कोशिश की है। ठहरे हुए समसामयिक समय को गति देने के साथ-साथ जो लिखा जा रहा है उसमें वैचारिकता है या नहीं, इसको भी टटोलने का प्रयास किया है। उन्होंने कहा कि इतिहास के अंत के दौर में विचार का बचा रहना बहुत जरूरी है। केदार की तुलना यदि किसी से की जा सकती है तो वह नजीर अकबरावादी हैं, का जिक्र करते हुए साहित्यकार प्रह्लाद अग्रवाल ने कहा कि दोनों ने समाज के उस वर्ग पर कलम चलायी जो अपनी पहचान के लिए सदैव संघर्ष करता है और वह जन मारे नहीं मरता है। साहित्य आलोचक और पुस्तकवार्ता के संपादक भारत भारद्वाज ने केदार जी के साथ बिताए पलों को याद करते हुए कई अनछुए पहलुओं को उजागर किया तथा भावुक स्वरों में कहा कि केदारजी अन्तिम समय में कहते थे कि – अब तो बूढ़ा हो गया हूं, अब जाना-आना नहीं होता है, नई पीढ़ी के रचनाकारों को जमीन से जुड़कर समाज सापेक्ष कार्य करने की जरूरत है। केदार शोध पीठ के सचिव नरेन्द्र पुण्डरीक ने केदारजी को याद करते हुए बाबूजी की सरलता और सहजता और स्नेह को हिंदी कविता की थाती बताया।
‘केदार की कविता: लोक काव्य का प्रवाह’ विषय पर आयोजित अकादमिक सत्र की अध्यक्षता करते हुए केदार सम्मान से सम्मानित कवि दिनेश कुमार शुक्ल ने कहा कि जब हम कविता की लोकधर्मिता की बात करते हैं तो हमारे सामने लोक की हर वस्तु सामने होती है यह केदारजी की रचनाओं में परिलक्षित होता है। कानपुर की ज्योति किरण ने उल्लेखित किया कि केदार बाबू प्रेम को जीवन मूल्य मानते हैं। उनकी प्रेम कविताएं अनूठी है, पूरा लोक जीवन है। प्रेम इंसान को हजारों सालों तक जिंदा रखता है, काल से लड़ने की शक्ति देता है पर आज मनुष्य भौतिकवाद में अपने से ही लड़ता है व अपने को बचाए रखने का प्रयास करता है। वक्ता के रूप में ग्वालियर के पवन करण ने कहा कि केदार बाबू को पढ़ना जितना आसान है उनको आत्मसात करना कठिन है, क्योंकि उनकी कविताएं सत्य का बोध कराती हैं तथा सत्य को जीना कठिन है। उनकी कविताओं में आमजन का संघर्ष दृष्टिगोचर होता है। साहित्यकार नरेन्द्र पुण्डरीक ने ओजपूर्ण व्याख्यान देते हुए कहा कि शमशेर एवं नागार्जुन के संपर्क से केदार छायावादी मोह से मार्क्सवादी विचारधारा की ओर उन्मुख हुए।
प्रह्लाद अग्रवाल ने कहा कि केदार जी जनकवि होने के कारण आमजन के हित के बारे में सोचते थे। केरल की शांति नायर ने कहा कि भूमंडलीकरण कुछ लोगों को पूंजीवादी ताकत दे रहा है। इस मर्ज को केदार जी भांप गए थे इसलिए वे अपनी कविताओं में पूंजीपति एवं श्रमजीवी संस्कृति को बखूबी ढंग से उकेरा है। तुलसी की रचनाओं में जो लोकमंगल है वहीं केदार की कविताओं में भी है, का जिक्र करते हुए मुंबई के संजीव दुबे ने कहा कि जबतक कोई कवि जन की कविताएं नहीं रचता है उसकी रचनाधर्मिता व्यर्थ है, केदार जी ने जन की पीड़ाओं को अपनी लेखिनी का विषय बनाया। तुलसी व केदार की रचनाओं में लोकचेतना है, बताते हुए आनंद शुक्ल ने कहा कि तुलसी तत्सम के कवि हैं तो केदार तदभव के। शोधार्थी कालूलाल कुलमी ने विमर्श करते हुए कहा कि केदार किसान चेतना के हितैषी रहे हैं।
‘केदार का गद्य: अनुपस्थित का आख्यान’ विषय पर आयोजित अकादमिक सत्र की अध्यक्षता करते हुए साहित्यकार महेश कटारे ने रामविलास शर्मा के वक्तव्यों को उद्द्यृत करते हुए कहा कि केदार जी में एक कथाकार के मूल गुण थे। उनकी रचनाओं में लोक जीवन परिलक्षित होता है। लोक के स्तर पर पात्र संघर्ष कर रहे हैं। आज हमारे साहित्य से जातीय मनुष्य तत्व अनुपस्थित है। उन्होंने कहा कि केदार जी के गद्य में वाक्य-परिहास भी दिखता है। यद्यपि उनकी प्रकृति एक कवि की थी लेकिन उनकी कुछ कहानियों एवं मित्र संवादों के पत्रों से उनके गद्य की अनुपस्थिति नहीं है। अजित पुष्कल ने कहा कि भाषा के स्तर पर बात न की जाय और कथ्य पर ध्यान दिया जाय तो केदार बाबू का गद्य बहुआयामी है। साहित्य आलोचक भारत भारद्वाज ने कहा कि केदार अपनी धरती को, अपने आसपास की वस्तुओं को बड़ी सूक्ष्मता के साथ देखते थे और कविता रचते थे।
दिल्ली के अशोक त्रिपाठी ने कहा कि केदारजी के गद्य का महत्वपूर्ण अंश उनके मित्रसंवाद के पत्रों में है। उनकी जिंदगी की पूरी तस्वीर उनके पत्रों में है। उन्होंने कहा कि वकालत के समय में जजों के निर्णयों का गद्य उनके पत्र-गद्य, उपन्यास-गद्य को ज्यादा सौष्ठव प्रदान करता है। विश्वविद्यालय के असिस्टेंट प्रोफेसर अमरेन्द्र शर्मा ने मार्क्स एंजिल्स की दोस्ती की तरह ही केदार-रामविलास की मित्रता बताते हुए कहा कि केदार की कविताओं में एक निष्कर्ष की छटपटाहट है। केदार की कविताओं के अर्थ को एक बेहतर रूप रामविलास शर्मा द्वारा लिखे गए पत्रों में मिलता है। मित्र संवाद का ही गद्य है जो कुछ कविताओं को नया रूप देता है। उन्होंने बताया कि 17 जनवरी 1955 में रामविलास शर्मा ने लिखा है कि केदार जी में प्रकृति का अदभूत सौन्दर्य झलकता है। रामविलास जी ने केदार बाबू को लिखा- आदमी तो जीवट के हो लेकिन कवि थर्ड क्लास के हो रहे हों। क्या तुमने सरसों के पेड़ नहीं देखे हैं। केदार ने सरसों को अदभुत रूप में देखा है।
उ.प्र. प्रगतिशील लेखक संघ के अध्यक्ष जयप्रकाश धूमकेतु ने कहा कि गद्य में केदार जी अनुपस्थित रहे हैं। उनके गांव कमासिन ने उनको दो-तीन कहानियां दी हैं। गौरतलब है कि जन्म शतवार्षिकी पर यह तीसरा कार्यक्रम केदारनाथ अग्रवाल पर उनकी कर्मभूमि बांदा में किया गया। इसके पूर्व बाबा नागार्जुन की रचनाओं पर विमर्श के लिए पटना में तथा उपेन्द्रनाथ अश्क के साहित्य पर विमर्श के लिए इलाहाबाद में कार्यक्रम आयोजित किया गया था। कार्यक्रम का संयोजन एवं संचालन जन्मशती कार्यक्रम के संयोजक प्रो. संतोष भदौरिया ने किया। सार रूप में केदार बाबू की कविता ढोलक मढ़ती है अमीर की, चमड़ी बजती है गरीब की आज भी चरितार्थ होती है। काव्य-पाठ से यादगार बनी संध्या- वैचारिक कार्यक्रम के उपरांत काव्य-पाठ का आयोजन किया गया, कवि अपनी कविताओं के माध्यम से शोषण व अन्याय के प्रति आवाजें बुलंद करने की संदेश प्रवाहित कर रहे थे। कविता पाठ करने वाले कवियों में पंकज राग, पवन करण, ज्योति किरण, मुन्नी गंधर्व, अजित पुष्कल, श्रीप्रकाश मिश्र, नरेन्द्र पुण्डरीक, अमरेन्द्र शर्मा, नन्दल हितैशी शामिल थे।











