सरकार पत्रकारों और गैर पत्रकारों से संबंधित वेतन बोर्ड की सिफारिशों पर विचार कर रही है और मंत्रिमंडल की मंजूरी मिलने के बाद इन सिफारिशों को कार्यान्वयन के लिए अधिसूचित किया जाएगा। श्रम और रोजगार मंत्री मल्लिकार्जुन खरगे ने बुधवार को राज्यसभा में बताया कि वेतन बोर्ड ने 31 दिसंबर 2010 को अपनी रिपोर्ट सौंप दी थी।
उन्होंने बताया कि केंद्र सरकार द्वारा वेतन की अंतरिम दरें अधिसूचित किए जाने के बाद राज्य सरकारों से कहा गया था कि वे अपने अधिकार क्षेत्र के समाचार पत्र प्रतिष्ठानों में मजदूरी की अंतरिम दरों का कार्यान्व्यन कराएं। सभी राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों से ब्यौरे एकत्र किए जा रहे हैं।
उन्होंने कुसुम राय, प्रभात झा, डी राजा और एमपी अच्युतन के प्रश्न के लिखित उत्तर में बताया कि मंत्रिमंडल की मंजूरी मिलने के बाद इन सिफारिशों को कार्यान्वयन के लिए अधिसूचित किया जाएगा और अधिसूचना के अनुसार, बकाए का भुगतान किया जाएगा। साभार : भाषा












vishal dhar dubey
March 10, 2011 at 5:13 am
यशंत जी,
एक पत्रकार का पत्र–
पत्रकारों के हित में सरकार का ये बहुत ही अहम कदम है। देश में बहुत संस्थान हैं जहां पर पत्रकारों का शोषण हो रहा है, यही वजह है कि पत्रकार टूट जता है और उसकी कलम की धार के साथ उसका परिवारबिखर जा रहा है। पत्रकार समाज का आइना जरुर होता है लेकिन जब उस आईने के सामने अपने आपको खड़ा पाता है तो उसके सामने टूटा हुए मंजर ही दिखाई पड़ता है। सामज में व्याप्त भ्रष्टाचार और बुराई को अपनी लेखनी के माध्यम से लोगों के सामने रखता है, लेकिन वो अपना दर्द लोगों के सामने रख पाता है, उसका परिवार कैसै चल रहा है न तो उसका संस्थान उसके बारे में सोचता है न ही श्रम मंत्रालय…..। बहुत पत्रका ऐसे जिनका परिवार उनकी पत्नी के सहारे चल रहा है और यही हकीकत है..उनकी पत्नी जाब छोड़ दे तो वो दूसरे दिन ही सड़क पर आ जायेंगे । मैं भी एक पत्रकार हूं जो सात साल से समाचार पत्र और इलेक्ट्रानिक मीडिया की के आफिसों का चक्कर काट रहा हूं और कई संस्थानों में काम भी कर चुका हूं, लेकिन उन संस्थानों में मालिकान एक पत्रकार का वजूद एक मजदूर से भी कम आंकते हैं….उन्हें न तो समय पर वेतन मिलता है न ही उनका इनक्रीमेंट हो पाता है। यशवंत जी मैं किसी संस्थान का नाम नहीं लेना चाहता लेकिन कुछ संस्थान ऐसे हैं जहां पर युवा पत्रकारों की स्थिति बहुत ही सोचनीय है, उनका भरपूर शोषण हो रहा है, कई चैनल तो ऐसे हैं जो इंटर्न के सहारे चल रहे हैं। सरकार ने पत्रकारों के हित में जो भी कदम उठाने की सोच रही है उनके लिए डूबते को तिनके का सहारा ही शाबित होगा। मैं सात साल की पत्रकारिता जीवन में मैने बहुत कुछ देखा है एक पत्रकार का दर्द क्या होता है, पत्रकार के घर में खाने के लिए भले ही कुछ ने हो लेकिन लोकतंत्र का चौथा स्तंभ, अपने स्तंभ को लेकर खड़ा रहता है लेकिन दूसरी तरफ उसका परिवार टूटता और बिखर रहा है फिर भी संस्थान के मालिक उसके बारे में नहीं सोचते, अगर एक पत्रकार अपनी आवाज और अपना मेहनताना मांगने की कोशिश करता है या तो उसे निकाल दिया जाता है या दुसरे जगह भेज दिया जाता है। अगर सरकार पत्रकारों के वेतन के बारे को लेकर ठोस कदम उठाती है तो समाज में पत्रकारिता और पत्रकार का वजूद कायम रह सकता है। सरकार यदि पत्रकारों के बारे में कोई ठोस कदम नहीं उठायेगी तो आने वाले समय में न तो स्वच्छ पत्रकार मिलेगें और न ही उनकी पत्रकारिता स्वच्छ होगी, क्योंकि की भी एक जिन्दगी है और उन्हें भी अपने परिवार का भऱण पोषण करना है।
विशाल धर दुबे
पत्रकार
amit singh
March 10, 2011 at 7:49 am
ये समिति बनती है …पर पत्रकारो को कितना फायदा होता है ..यह सब जानते है…प्रबंधन आज कल छोटे पत्रकारो को मनरेगा के मजदूर से भी कम पैसे देती है….इस पर राज्य सरकार,केन्द्रसरकार और श्रम विभाग को ध्यान देना होगा।
anil
March 10, 2011 at 8:12 am
jaldi kro.
vishal dhar dubey
March 10, 2011 at 4:26 pm
पत्रकारों के हित में सरकार का ये बहुत ही अहम कदम है। देश में बहुत संस्थान हैं जहां पर पत्रकारों का शोषण हो रहा है, यही वजह है कि पत्रकार टूट जता है और उसकी कलम की धार के साथ उसका परिवारबिखर जा रहा है। पत्रकार समाज का आइना जरुर होता है लेकिन जब उस आईने के सामने अपने आपको खड़ा पाता है तो उसके सामने टूटा हुए मंजर ही दिखाई पड़ता है। सामज में व्याप्त भ्रष्टाचार और बुराई को अपनी लेखनी के माध्यम से लोगों के सामने रखता है, लेकिन वो अपना दर्द लोगों के सामने रख पाता है, उसका परिवार कैसै चल रहा है न तो उसका संस्थान उसके बारे में सोचता है न ही श्रम मंत्रालय…..। बहुत पत्रका ऐसे जिनका परिवार उनकी पत्नी के सहारे चल रहा है और यही हकीकत है..उनकी पत्नी जाब छोड़ दे तो वो दूसरे दिन ही सड़क पर आ जायेंगे । मैं भी एक पत्रकार हूं जो सात साल से समाचार पत्र और इलेक्ट्रानिक मीडिया की के आफिसों का चक्कर काट रहा हूं और कई संस्थानों में काम भी कर चुका हूं, लेकिन उन संस्थानों में मालिकान एक पत्रकार का वजूद एक मजदूर से भी कम आंकते हैं….उन्हें न तो समय पर वेतन मिलता है न ही उनका इनक्रीमेंट हो पाता है। यशवंत जी मैं किसी संस्थान का नाम नहीं लेना चाहता लेकिन कुछ संस्थान ऐसे हैं जहां पर युवा पत्रकारों की स्थिति बहुत ही सोचनीय है, उनका भरपूर शोषण हो रहा है, कई चैनल तो ऐसे हैं जो इंटर्न के सहारे चल रहे हैं। सरकार ने पत्रकारों के हित में जो भी कदम उठाने की सोच रही है उनके लिए डूबते को तिनके का सहारा ही शाबित होगा। मैं सात साल की पत्रकारिता जीवन में मैने बहुत कुछ देखा है एक पत्रकार का दर्द क्या होता है, पत्रकार के घर में खाने के लिए भले ही कुछ ने हो लेकिन लोकतंत्र का चौथा स्तंभ, अपने स्तंभ को लेकर खड़ा रहता है लेकिन दूसरी तरफ उसका परिवार टूटता और बिखर रहा है फिर भी संस्थान के मालिक उसके बारे में नहीं सोचते, अगर एक पत्रकार अपनी आवाज और अपना मेहनताना मांगने की कोशिश करता है या तो उसे निकाल दिया जाता है या दुसरे जगह भेज दिया जाता है। अगर सरकार पत्रकारों के वेतन के बारे को लेकर ठोस कदम उठाती है तो समाज में पत्रकारिता और पत्रकार का वजूद कायम रह सकता है। सरकार यदि पत्रकारों के बारे में कोई ठोस कदम नहीं उठायेगी तो आने वाले समय में न तो स्वच्छ पत्रकार मिलेगें और न ही उनकी पत्रकारिता स्वच्छ होगी, क्योंकि की भी एक जिन्दगी है और उन्हें भी अपने परिवार का भऱण पोषण करना है।
ईश्वर सिंह . gorakhpur
March 12, 2011 at 11:12 am
ऐसा हो जाय तब तो सचमुच पत्रकारों के दिन भी बहुर जायेंगे, लेकिन सवाल यह है कि क्या मीडिया घराने ऐसा चाहेंगे, कि उनके यहां मजदूरों से भी बद्तर जिंदगी जीने वाले पत्रकारों (खासकर नए पत्रकारों)का हित हो। सच तो यह है कि चौथे स्तंभ का दंभ भरने वाले पत्रकारों का हौसला टूट रहा है। नतीजा भी सामने है, जिस व्यवसायी, नेता, अधिकारी वगैरह से अखबार वालों का किसी भी तरह का स्वार्थ होता है वो लाख बेइमान या भ्रष्ट हो, उनके सिर्फ कसीदे पढ़े जाते हैं। उनके खिलाफ लिखना तो दूर की बात सुनना भी गंवारा नहीं होता। पत्रकार दिन भर भागता तो है लेकिन खबरों के लिए कम, मैनेजमेंट के काम से ज्यादा। 12 से 14 घण्टे ड्यूटी बजाने वाले पत्रकारों को कितना मिलता है यह किसी से छुपा नहीं हैं। अखबार व चैनलों की बदौलत मीडिया घराने जहां लगातार आगे बढ़ रहे हैं, वहीं पत्रकारों का आर्थिक स्तर तो गिर ही रहा है, समाज में वह सम्मान भी नहीं मिल रहा है। जाहिर सी बात है कि पेट भरने के लिए कुछ पत्रकारों ने निम्न स्तर अपना लिया है। इन कुछ के कारण बदनामी पूरे कौम की हो रही है। यदि पत्रकारों को अच्छी सेलरी मिले तो पत्रकार और पत्रकारिता दोनों का भला होगा। पत्रकारों की आवाज को मैनेजमेंट द्वारा यह कहकर दबा दिया जाता है कि पत्रकारिता प्रोफेशन नहीं मिशन है। अरे भाई! यदि ऐसा है तो आप क्यों पैसा पीट रहे हैं। यह पत्रकारों का दुर्भाग्य है कि दुनिया भर के लोगों के लिए आवाज उठाने वाले पत्रकार अपनी बात कहीं रख नहीं पाते। अन्य संगठनों की तरह पत्रकारों के भी अनेक संगठन हैं लेकिन सच यह है कि पदाधिकारी सिर्फ अपना उल्लू सीधा करने की फिराक में ज्यादा रहते हैं। मैंने अपने 6 साल के करियर में कभी भी पत्रकारों के हित में किसी संगठन को खड़ा होते नहीं देखा। ये संगठन मीडिया की सत्ता के ईर्द-गिर्द ही ज्यादा नजर आते हैं
bhanwar
May 9, 2011 at 3:44 pm
ye kaisa loktantra hai jismai kalam ke sipahi majduro sai bhi gya gujra satar lekar ji rahe hai..mujhe to nahi lagata ki kendra sarakar patrakaro ko unka hak dila payegi..enki managero aur media setho sai dealing hai..patrakaro sai enka kya wasta..phir bhi vetan board lagu ho jaye to ye dharana badlenge jiski ummid kum hai?