चौथे सूचना आयुक्त के चयन के लिए गुरुवार को मुख्यमंत्री डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक की अध्यक्षता में बीजापुर गेस्ट हाउस में चयन समिति की बैठक हुई. जिसमें यह फैसला लिया गया. तीन सदस्यीय इस समिति के दूसरे सदस्य कैबिनेट मंत्री बंशीधर भगत बैठक में मौजूद थे, जबकि तीसरे सदस्य नेता प्रतिपक्ष डॉ. हरक सिंह रावत बैठक में शामिल नहीं हुए.
सूत्रों ने बताया कि बैठक में श्री सेतिया के अलावा एक अन्य नाम पर भी चर्चा हुई, लेकिन चयन समति के मौजूद दो सदस्यों ने अजय सेतिया की नियुक्ति के पक्ष में अपना फैसला सुनाया. अब सरकार के इस फैसले पर राज्यपाल की मुहर लगनी बाकी है. राज्यपाल की अनुमति मिलने के बाद बतौर चौथे सूचना आयुक्त श्री सेतिया की नियुक्ति हो जाएगी. इसके साथ ही राज्य सूचना आयोग पांच सदस्यीय हो जाएगा. वर्तमान में मुख्य सूचना आयुक्त के रूप में एनएस नपलच्याल कार्यरत हैं, जबकि विनोद नौटियाल, प्रभात डबराल और अनिल शर्मा सूचना आयुक्त हैं.












sanjay kumar (swadesh)
July 16, 2011 at 8:20 am
[b][/b] bahut bahut badhayee setiya sir…….
arvind
July 16, 2011 at 10:08 am
setia ji badhai,aap ko yaad hai maine aap se us samay training lee thee jab aap Jansatta me hua karte the. shayd aap ko 20 saal purani baat yaad na ho, sir mai aaj kal Kolkatta me hoon. bahoot bahoot badhai.
ramji
July 16, 2011 at 1:01 pm
setia ji ko badhai……….aap ka INDIAGATE coloum aur ETV par interviews hamesha yaad rahenge…..likhna mat chhodna bhai.
anuj kumar singh
July 16, 2011 at 1:04 pm
vaah……ham soch rahe the etv ke baad kaya kar rahe honge aap.Bhadas ne yah jordaar khabar di…….badhai ho setia ji….aap journalism ki tarah vanha bhi jor shor se active rahna.
एक उत्तराखंडी
July 17, 2011 at 4:35 am
पत्रकार अजय सेतिया से हमें कोई गिला शिकवा नहीं है… जब सियासी रेबडियां बंटती हैं तो तमाम ऐरे गैरे भी अपनी कई निष्ठाएं और आदर्श छोड़कर खाने के लिए आ जाते हैं… सेतिया जी ऐसे नहीं हैं… लेकिन निशंक जी को क्या सूझी पांच सदस्यों का सूचना आयोग बनाने की…
जिस राज्य के कस्बों के अस्पतालों में डॉक्टर नहीं हैं .. दूर दराज के स्कूलों में मास्टर नहीं हैं… वहां की भोली भाली जनता का मेहनत का लाखों रूपया लोगों को उपकृत करने के लिए भला क्यों लुटाया जा रहा है? सूचना आयोग का काम ठीक चल रहा है और मुख्य सूचना आयुक्त किसी और आयुक्त की जरूरत से इंकार कर चुके हैं… तब किसी नाथ नाम के नेता को खुश करने भर के लिए ऐसा करना बहुत चिंता का विषय है।
एक आयुक्त पर महीने में कितना खर्च होता है, उतना पैसा किसी नेता को अपनी जेब से देना पड़े तो देखें कि कौन ऐसे वाहियात खर्चे करेगा…. शर्म … शर्म…शर्म
Govind Badone Navabharat Biaora M.P.
July 17, 2011 at 9:58 am
Aadarniya ajay setiya sir
Sadar Pranam
Aapko Bahut -Bahut Badhai
Aapka
Govind Badone
Navabharat Bhopal
Biaora M.P.
09425037599
[email protected]
virender soni punjab kesari
July 17, 2011 at 9:59 am
setia ji Print media se elctronic media main bulandiyon ko chuaa aur ab nai pari ke liye agrim badhai. Virinder Soni From Punjab Kesari, Delhi Mob. 9871144242.
Govind Badone Navabharat Biaora M.P.
July 17, 2011 at 10:11 am
Adarniya setia ji ko Bahut _bahut badhai
aap ko yaad hai maine aap se Biaora Dist.Rajgarh M.P. Me Navabharat Ke Pitra Purush shri Ramgopal G. Maheshvari Ki punya Tithi Par Ayojit Vichar Manthan Me Aamantrit Karne ke Liye Bat ki Thi …
bahoot bahoot badhai.
Aapka
Govind Badone Navabharat Biaora M.P.
09425037599
[email protected]
Rajendra Gunjal
July 17, 2011 at 5:13 pm
Uttarakhand ke C.M. dwara ek buddhimatapurn faisla liya hai. ve sadhuvad ke patra hain. Rajya Sarkaron ko aisi niyuktiyon me I.A.S. ka moh tyagna chahiye.Asha hai desh ki anya Rajya Sarkaren is se prerna lengi.Shri Ajay Setiya ki niyukti patrakar jagat ke liye gaurav ki baat hai.
shiv prakash singh chandel
July 17, 2011 at 5:41 pm
setiya sir aapko bahut bahut badhayee …………….
Jay Singh Rawat
July 18, 2011 at 4:44 am
प्रेस रिलीज
जर्नलस्टि यूनियन आफ उत्तराखण्ड ने प्रदेष से बाहर के पत्रकारों को चाटुकारिता के बदले राज्य सूचना आयोग में आयुक्तों के पद तोहफे के तौर पर नियुक्त करने का कड़ा विरोध करते हुये राज्य सरकार के इस निर्णय के खिलाफ आन्दोलन की चेतावनी दी है।
यूनियन के प्रदेष अध्यक्ष जयसिंह रावत और महासचिव गिरीष पन्त ने आज यहां जारी एक बयान में कहा है कि राज्य के मुख्य सूचना आयुक्त द्वारा अब और अधिक आयुक्तों की नियुक्ति न करने की सलाह तथा चयन समिति के सदस्य प्रतिपक्ष के नेता के विरोध के बावजूद राज्य सरकार दिल्ली के एक ऐसे पत्रकार को आयुक्त के रूप में नियुक्त करने जा रही है जिसका उत्तराखण्ड से कोई सरोकार नहीं रहा है। उक्त पत्रकार किसी बाहरी प्रदेष का है और उसकी योग्यता मात्र उत्तराखण्ड की वर्तमान सरकार की चापलूसी करना है।
यूनियन के इन पदाधिकारियों ने राज्य सरकार पर प्रदेष की पत्रकारिता में भाण्ड संस्कृति को प्रोत्साहित करने, पत्रकारों की आत्मा की हत्या करने और उनके ईमान खरीदन का प्रयास करने का आरोप लगाया है। उन्होंने चेतावनी दी है कि अगर सचमुच बाहरी पत्रकार को आयुक्त के रूप में षपथ दिलाई गयी तो यूनियन अन्य संगठनों और वरिष्ठ पत्रकारों को साथ लेकर आन्दोलन करेगी।
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जर्नलिस्ट यूनियन आफ उत्तराखण्ड की यह विज्ञप्ति निषंक सरकार ने रातोंरात छपने से रुकवा दी
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उत्तराखण्ड का सूचना आयोग: अन्धा बांटे रेवड़ी
-जयसिंह रावत-
मीडिया मैनेजमेण्ट का रोग तो सारे ही देष में फैल गया है मगर उत्तराखण्ड में हालत बहुत ही चिन्ताजनक स्थिति तक पहुंच गयी है। इस नये राज्य में पत्रकारिता नयी भाण्ड संस्कृति का षिकार हो गयी है। आप सरकार की भाण्डगिरी करके तो देखिये! उसके बदले में आपको सूचना आयुक्त तक बनाया जा सकता है। इसके अलावा प्रत्यक्ष और परोक्ष आर्थिक लाभ और सत्ता की दलाली के दरवाजे भी खुल जायेंगें। राज्य गठन के 10 सालों में ही सरकार की चाटुकारिता और दलाली करते-‘करते कई लोग मालोमाल हो गये है। उनकी देखादेखी कर चाटुकारिता की होड़ लग गयी है।संसद ने षासन प्रषासन तंत्र में पारदर्षिता लाने और पदों पर बैठे लोगों की जनता के प्रति सीधी जबाबदेही तय करने के लिये जो सूचना का अधिकार अधिनियम बनाया वह भी उत्तराखण्ड में पत्रकारों की आत्मा को मारने और उनका जमीर खरीदने के लिये सत्ताधारियों के लिये एक हथियार बन गया। अगर आप की कलम से निकले षब्द सरकार को अप्रिय लगें तो आपकी नौकरी भी जा सकती है। दुर्भाग्य से स्वयं को देष की सबसे बड़ी और ऐतिहासिक संवाद समिति होने का दावा करने वाली एक न्यूज ऐजेसी की साख भी देहरादून के घण्टाघर पर नीलाम कर दी गयी है। उस ऐजेसी की अंषकालिक संवाददाता की नौकरी इसलिये गयी क्योकि ऐजेसी का नया ब्यूरो चीफ सरकार के हाथों बिका हुआ था और संवाददाता के अप्रिय समाचार उसकी दलाली के धन्धे में आड़े आ रहे थे।
एक चैनल के पत्रकार अजय सेतिया दिल्ली में काम करते हैं और निषंक सरकार उन्हें उत्तराखण्ड में सूचना आयुक्त बनाती है। सेतिया का कभी भी उत्तराखण्ड से कोई लेना देना नहीं रहा।मीडिया मैनेजमेण्ट का ऐसा नंगा नाच षायद ही किसी अन्य प्रदेष में हो रहा हो। जिस प्रदेष ने देष को जाने माने सम्पादक दिये हों। जिस प्रदेष के पत्रकारों ने देष में अपना सिक्का जमाया हो उस प्रदेष में निषंक सरकार को सूचना आयुक्त बनने लायक कोई पत्रकार नहीं मिला। बाहर से ही पत्रकार लाना था तो क्या भारत में एक सेतिया ही रह गये थे? षायद हां! क्योंकिपत्रकारिता की मर्यादाओं को ताक पर रख कर सरकार की जिस तरह सेतिया का चैनल सेवा कर रहा है वैसा षायद ही कोई और करे।
मात्र 10 साल पहले जन्में उत्तराखण्ड पर 21 हजार करोड़ का कर्ज चढ़ चुका है। अगर केन्द्र सरकार मदद न दे तो यह राज्य अपने कर्मचारियों को वेतन देने की स्थिति में भी नही है। इस साल का सालाना बजट 19 हजार करोड़ का है जिसमें प्लान का बजट मात्र 6 हजार करोड़ के करीब है।उसमें से भी 4 हजार करोड़ से अधिक विकास कार्यो पर खर्च नहीं होने हैं। षेष 13 हजार करोड़ से अधिक नान प्लान पर ही खर्च होना है और राज्य के पास अपने संसाधन इसके आधे के बराबर भी नहीं हैं। ऐसी स्थिति में रेवड़ियां बांटने वालों को अन्धा मानकर उन्हें इगनोर नहीं किया जा सकता है। एक सूचना आयुक्त पर लगभग 3 से लेकर 4 लाख रुपये प्रतिमाह तक का खर्च आता है और अगर राज्यपाल ने मंजूरी दे दी तो यहां सूचना आयुक्तों की संख्या बढ़ कर 6 हो जायेगी और प्रदेष की जनता को सूचना का अधिकार लगभग 25 लाख रुपये महीने का पड़ेगा। उत्तराखण्ड ने जिस तरह लालबत्तियों की रेवड़ियां बांटने में रिकार्ड बनाया है उसी तरह अब सूचना आयुक्तों की नियुक्ति में भी रिकार्ड बनने जा रहा है। कम से कम जनसंख्या के हिसाब से तो रिकार्ड बन ही रहा है। इसका आंकलन कुछ अन्य राज्यों के साथ किया जा सकता है।उत्तराखण्ड के पड़ोसी या जुड़ुवा हिमाचल प्रदेष में मुख्य आयुक्त समेत मात्र 2 सदस्यीय सूचना आयोग है। जबकि हरियाणा में मुख्य आयुक्त समेत 4, सिक्किम में 1, पंजाब में 7 और उत्तराखण्ड के पैत्रिक राज्य उत्तर प्रदेष में कुल 11 सदस्य हैं। जबकि उत्तराखण्ड अपने पैतृक राज्य के सोलहवें हिस्से के बराबर है।
उत्तराखण्ड के मुख्य सूचना आयुक्त नपलच्याल भी राज्य सरकार को अपनी राय दे चुके थे कि अब और आयुक्तों की जरूरत नही है। जाहिर है कि नये आयुक्तों की नियुक्ति महज रेवडियां बांटने की नीयत से हो रही हैं। प्रतिपक्ष के नेता हरकसिंह रावत भी नयी नियुक्तियों का विरोध कर चुके थे। अब तो उन्होंने बाकायदा राज्यपाल को पत्र लिख कर अपनी असहमति प्रकट करने के साथ ही नयी नियुक्ति की वैधानिकता पर सवाल उठा दिया है। क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय ने भी मुख्य सतर्कता आयुक्त की नियुक्ति के मामले में केन्द्र सरकार से साफ कहा है कि चयन समिति में षामिल प्रतिपक्ष के नेता की असहमति का निदान किये बिना नियुक्ति नहीं होनी चाहिये।यही नहीं उत्तराखण्ड क्रांतिदल के अध्यक्ष त्रिवेन्द्र सिंह पंवार भी सेतिया की नियुक्ति के खिलाफ खड़े हो गये हैं। जर्नलिस्ट यूनियन आफ उत्तराखण्ड ने तो बाकायदा विज्ञप्ति जारी कर सरकार की मंषा का विरोध किया है, मगर मुख्यमंत्री के मीडिया मैनेजरों ने विज्ञापनों और अन्य प्रलेाभनों का हवाला देकर तथा कुछ जगह धमकियां देकर वह विज्ञप्ति छपने नहीं दी। कई वरिष्ठ पत्रकारों ने अजय सेतिया की नियुक्ति को आपत्तिजनक बता कर पत्रकारिता का माहौल बिगाड़ने पर गहरी चिन्ता प्रकट की है।
वैसे भी राज्य सरकार विभन्न निगमों, सरकारी समितियां, परिषदों और अन्य सरकारी संस्थाओं में में 100 से अधिक लालबत्तीधारियों को नियुक्त कर चुकी है जिन पर हर साल कई करोड़ खर्च हो रहे हैं। इतनी लूट तो उपर से दिखाई दे रही है और अन्दर खाने क्या-क्या चल रहा होगा इसकी कल्पना की जा सकती है। इसीलिये अब कई उत्तराखण्ड आन्दोलनकारी भी कहने लगे हैं कि उत्तराखण्ड तो लुटने के लिये बना है। उसे चारों तरफ से नोचा जा रहा है और उस नोच खसोट में उत्तराखण्ड की कुछ हड्डियां पत्रकारों के आगे भी डाली जा रही है।इन हड्डियों में हर कोई अपना हिस्सा मांगने लगा है। उत्तराखण्ड आन्दोलन में किसी ने कभी एक नारा भी लगाया होगा तो वह भी हिस्सा मांग रहा है।
Rakesh chandra
July 18, 2011 at 8:51 am
Setiyaji ko suchana ayukt banane ke faisle se Nishankji ne yah to sidh kar diya hai ki ki o uttarakhand ke paterkarown ke kitne hitaisi hain . kiyonki paterkar hone vavjood kya unko utterakhan mein ek bhi paterkar aisa nahin mila jo suchana ayukt ban sakta ho?……. yah unke un chatukar paterkar sathiyo ke liye bhi ayina hai jo chatukarita to Nishank ji ki karte hain lekin jab inaam ki baari aati hai Nishankji apne un dosto ka naam bhul jate hain………………! aisa kab tak chalega …….chatukaro ab to samjhho?
Love Thakur
July 18, 2011 at 11:53 am
Jay Singh Rawat aur Girish Pant Sahib buhut mahan patarkar honge,par netagiri karne se pahle jaach bhi kar lete ki Ajay Setia desh ke parmukh hindi patarkaron me se ek rahe hain, Editor star ke patrkar ko kashetravad me baandhna sarasar nainsaafi hoga……Jay Singh Rawat aur Girish Pant mahodya ko to bahar ka Governer banane par bhi aitraaj hoga.Ajay Setia aise patarkar hain jinhonme kabhi keshtravad ko mana hi nahi, phir janab Jay Singh Rawat aur Girish ji jara janch bhi kar lete ki Ajay Setia ka sathai ghar to Uttrakhand me hi hai. awal RTI ko majboot karna hai……Ajai Setia jaise anubhavi se RTI ko phayda hi hoga.
Jay Singh Rawat
July 19, 2011 at 7:25 am
मित्रो ! मुझे मालूम था कि भडास पर प्रतिकृ्रया देकर कैसी प्रतिक्रियाऐं आयेंगी। षायद बहुत कम लोगों को पता होगा कि सरकार के पक्ष में प्रतिक्रियाऐं देने के लिये भी बाकायदा कुछ फर्जीनामधारी कई लोग तैनात हैं। ऐसे लोग उत्तराखण्ड को तो डुबो ही रहे हें मगर अब उनका इरादा हमारे मित्र निषंक जी को डुबोने का भी है। हो भी क्यों नहीं ! उनकी बला से ! उन्हें तो केवल अपना स्वार्थ साधना है। उत्तराखण्ड का खून चूसना है। हमने तो डंके की चोट पर अपनी बात कह दी। लेकिन छ्द्म प्रतिक्रियावादी अपना नाम जाहिर करने की तक हिम्मत नहीं जुटा पाते हैं। जो अपना नाम छिपाकर भाड़े की प्रतिक्रियाऐं दे रहें हो उनकी असलियत समझी जा सकती है। मैं इस तरह हर प्रतिक्रिया का जबाब देकर अपना समय बरबाद करना नहीं चाहता हूं, फिर भी इस मामले में कुछ बिन्दुओं पर स्पष्टीकरण जरूरी हो गया है। पहला बिन्दु तो यह है कि हमें अपनी विज्ञप्ति में बाहरी ब्यक्ति षब्द का इस्तेमाल नहीं करना चाहिये था। फिर भी अगर हो ही गया तो हमारा अभिप्राय कतई क्षेत्रवादी नहीं था। हमारा आषय यह था कि जो पत्रकार एक दिन भी उत्तराखण्ड में तैनात नहीं रहा उसे यह तोहफा क्यों। अगर तमिलनाडू में जन्मा एक पत्रकार उत्तराखण्ड में काम कर रहा है या कर चुका है तो उसे नियुक्त करने में क्या बुराई है। हमारा आषय ऐसे पत्रकार से था जो कि उत्तराखण्ड के सरोकारों से वाकिफ हो। लकिन केवल चरने के लिये लोगों को उत्तराखण्ड लाना भी तो जस्टिफाइड नहीं हो सकता है।इससे पहले प्रभात डबराल जी को नियुक्त किया गया तो उनका स्वागत ही हुआ, क्योंकि डबराल के दिलोदिमाग में उत्तराखण्ड बसा हुआ है। कुछ लोग यह कुतर्क दे रहे हैं कि राज्यपाल भी बाहर से आता है। राज्यपाल बाहर से नहीं दिल्ली से राष्ट्रपति के प्रतिनिधि के रूप में आता है। कभी किसी राज्यपाल को होम स्टेट नहीं दिया जाता। यहां सवाल तैनाती का ही नही है। सवाल लड्डू देने का है। सूचना आयुक्त पहले ही यहां काफी हो गये हैं। अब केवल तोहफा देने का मामला है। क्या केन्द्र सरकार की आर्थिक कृपा पर निर्भर यह राज्य इतना मंहगा तोहफा दे सकता है? हमने राज्य सरकार के संवैधानिक अधिकार पर सवाल नहीं उठाया है। निषंक जी किसी को भी उस कुर्सी पर बैठा सकते हैं। हमने केवल नीयत पर उंगली उठाई थी। हमारी चिन्ता का असली विषय भाण्ड संस्कृति को बढ़ावा देने से है। चाटुकारों ने पहले खण्डूड़ी जी को डुबोया और अब निषंक जी को डुबो रहे हैं। ये नता डूबें तो डूबते रहे,ं मगर उत्तराखण्ड को क्यों डूबना चाहिये? सरकार समर्थक प्रतिक्रियाओं से आप अन्दाज लगा सकते हैं कि बीमारी कितनी गहराई तक जा चुकी है। चापलूस पत्रकारों ने इस प्रदेष को लूट लिया है। वे लुटवाने में भी मदद कर रहे हैं। मैंने स्वयं निषंक जी से कई बार कहा कि वह चापलूसों से दूर रहें। चापलूस किसी को दोस्त नहीं हो सकता है।आज हालत यह है कि सरकार की कमियों की ओर उंगली उठाने से हमारे मित्र डर रहे हैं। उनसे षिकायत करो तो कहते हैं कि माफ करना बड़े भाई सब कुछ उपर के इषारे पर होता है। यह सही है कि एक पक्षीय या नेगेटिव ही नहीं लिखा जाना चाहिये। लेकिन सवाल यह भी उठता है कि सत्ताधारियों के सिक्के का दूसरा पक्ष कौन दिखायेगा? हम मानते हैं कि निषंक जी में कई गुण भी हैं। सबसे बड़ा गुण उनका यह है कि वह आम आदमी को सुलभ हैं और आम आदमी के दुख दर्द से वाकिफ रहते हैं। जहां कभी जिला स्तर का अधिकारी नहीं जाता था वहां मुख्यमंत्री खुद जा कर उनके दुख दर्द बांट रहा है। हम उनकी ऐसी ही कई अच्छाइयों को गिना सकते हैं मगर सिक्के का दूसरा पहलू कौन उजागर करेगा? अगर सरकार की कमियां नहीं बतायी जायेंगी तो वह सुधार कैसे करेगी। निषंक जी की सबसे बड़ी कमी यह है कि उनमें अपनी आलोचना सहने का माद्दा नहीं है। आलोचना सुनते ही भड़क जाते हैं। इसीलिये उन्होेने प्रदेष के गाड़े पसीने के संसाधनों के बल पर चाटुकार पाले हुये हैं।यूं समझिये कि नवजात प्रदेष को खोखला ही कर डाला। हमारी चिन्ता का एक कारण यह भी है कि निषंक जी स्वयं पत्रकार रहे हैं। हमे आषा थी कि उनके राज में स्वस्थ पत्रकारिता फलेगी फूलेगी। लेकिन जिस तरह चापलूसों की फौज खड़ी हो रही है उससे हमें निराषा हुयी है। माहौल इतना विकृत हो गया कि यहां स्वयं को पत्रकार कहलाने में भी संकोच होता है। जहां तक सवाल अजय सेतिया का है तो हमें उनसे कोई बैर नहीं है। हमने तो पहली बार उनका नाम सुना है। अगर वह कभी उत्तराखण्ड में रहे होते तो हम उनका स्वागत अवष्य करते। हमारा पत्रकार साथी जब मुख्यमंत्री बना तो हमें बहुत खुषी हुयी थी। हमारा एक अन्य साथी जब सूचना आयुक्त बना तो हमारी खुषियां दुगुनी हो गयींे अगर भाई अजय सेतिया ने भी प्रभात डबराल की तरह उत्तराखण्ड के लिये सोचा होता तो हमारी खुषियां तिगुनी हो जाती।