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पांच संपादक भी बदल नहीं पाए जोधपुर में भास्‍कर की तकदीर!

राजस्थान के दूसरे बड़े और सांस्कृतिक राजधानी कहे जाने वाली शहर जोधपुर में दैनिक भास्कर कई उतार-चढ़ावों से गुजरने के बाद अभी तक अपनी मजबूत पहचान नहीं बना पाया है। इसे अभी तक पाठकों का वो भरोसा हासिल नहीं हो पाया है जो पत्रिका को मिलता रहा है। आज भी कोई समझदार पत्रकार भास्कर में जाने से पहले दो बार जरूर सोचता है।

राजस्थान के दूसरे बड़े और सांस्कृतिक राजधानी कहे जाने वाली शहर जोधपुर में दैनिक भास्कर कई उतार-चढ़ावों से गुजरने के बाद अभी तक अपनी मजबूत पहचान नहीं बना पाया है। इसे अभी तक पाठकों का वो भरोसा हासिल नहीं हो पाया है जो पत्रिका को मिलता रहा है। आज भी कोई समझदार पत्रकार भास्कर में जाने से पहले दो बार जरूर सोचता है।

इसका कारण भास्कर की वेतन प्रणाली, गुटबाजी एवं रोज बना रहने वाला कलह का वातावरण है। और भी अनेक कारण हैं जिनके कारण पत्रकारिता के लिए साफसुथरा महौल नहीं बना है। अब तक पांच सम्पादक भी इसे सुधार नहीं पाए हैं। भास्कर की इस हालत के लिए जिम्मेदार भी यही सम्पादक ही रहे हैं। दैनिक भास्कर के जोधपुर संस्करण की शुरुआत सन 1997 में हुई थी। उस समय राजस्थान पत्रिका के वरिष्ठ पत्रकार कमल श्रीमाली को स्थानीय सम्पादक बनाया गया। उस समय कमलजी पत्रिका छोड़ कर घर बैठे थे और राजस्थान केसरी जैसे छोटे अखबारों में काम कर चुके थे। भास्कर में उस समय दैनिक जलतेदीप और राजस्थान केसरी के स्टाफ की भर्ती की गई। मांगीलाल पारीक, गुरुदत्त अवस्थी, सुरेश व्यास और मोइन उल हक थे जलतेदीप से तथा ओम गौड़ राजस्थान केसरी से लिए गए। इनमें से पहले दो लोग ही अनुभवी थे, बाकी सब काम चलाऊ थे।

कमल श्रीमाली ने अपने खास सुरेश व्यास को चीफ रिपोर्टर बनाया। ओम गौड़ को उप सम्पादक बनाया गया। अब तक चालू किस्म के पत्रकार की छवि रखने वाले ओम गौड़ ने कई गौड़ बंधुओं को भर लिया जैसे नवीन गौड़, रामचन्द्र गौड़, भूपेन्द्र शर्मा आदि। ओम गौड़ की नजरें काफी दिन से सम्पादक की कुर्सी पर थीं और वे इसके लिए सही वक्त के इंतजार में थे। सात महीने बाद ही वो दिन आ गया। कमल श्रीमाली यानि खुद सम्पादक ने ही भास्कर में हड़ताल करा दी। हुआ यूं था कि मैनेजर जगदीश शर्मा ने अर्जुन पंवार नाम के एक रिपोर्टर को बिना अनुमति के गैर हाजिर रहने पर नौकरी से निकाल दिया। चतुर ओम गौड़ पहले से ही जगदीश शर्मा से साठगांठ किए हुए थे। उन्होंने पहले दिन तो हड़ताल में साथ देने का नाटक किया और अगले दिन खुद सम्पादक बन बैठे।

ओम गौड़ ने मालिकों से कहा कि वे इन हड़तालियों के बिना भी अखबार चला लेंगे। लिहाजा हड़तालियों की छुट्टी कर दी गई। ओम गौड़ तो इसी ताक में थे। कुछ लोगों का कहना है कि ओम गौड़ और जगदीश शर्मा ने ही मिल कर हड़ताल के हालात बनाए थे। खैर प्रबंधन ने हड़तालियों की छुट्टी कर दी और ओम गौड़ ने राजस्थान केसरी से अपने चेले-चेली नरेन्द्र चूरा, भंवर जागिड़ और एक महिला पत्रकार को बुला कर भास्कर में लगा दिया। मोइन उल हक और अयोध्याप्रसाद गौड़ भी लौट आए। अब ओम गौड का राज चला तो रिपोर्टरों को वसूली और दुश्मनी निकालने की छूट मिल गई। सबसे ज्यादा फायदा हुआ महिला पत्रकार को।

मैं गवाह हूं कि ओम गौड़ इस महिला पत्रकार की खबरों को खुद रीराइट करते और बाइलाइन देते थे। क्यों, यह आज तक कोई समझ नहीं पाया। महिला पत्रकार की ऑफिस में किसी से नहीं बनी। वह तब से अब तक लगातार दूसरे रिपोर्टरों के काम में खबरों में दखल देती आ रही हैं। वह चाहे जिसकी खबर छीन लेती है और कहती है कि मैं तो चार दिन से इस पर काम कर रही हूं। या मुझे सम्पादकजी ने कहा है यह खबर करने को। महिला पत्रकारपर अंकुश लगा ओम गौड़ की गैरहाजरी में। अंकुश लगाया था तत्कालीन सम्पादक मुकेश भूषण ने। उन्होंने महिला पत्रकार का ट्रांसफऱ जयपुर कर दिया। मगर वह प्रबन्धन के सामने रोना रोकर वापस आ गई। फिर ओम गौड़ पुनः सम्पादक बन कर जोधपुर लौट आए तो महिला पत्रकार के पौ बारह हो गए। ओम गौड़ ने उसे विशेष संवाददाता बना दिया।

जोधपुर से अपने ट्रांसफर के पहले ओम गौड ने महिला पत्रकार को नजदीकी जिले में जहां से पुलआऊट छपता है,  का सम्पादक बना दिया। उनकी प्लानिंग बाद में उसे जोधपुरका सम्पादक बनाने की थी। मगर यह प्लानिंग 15 दिन में ही फेल हो गई। नए व वर्तमान सम्पादक कुलदीप व्यास ने 15 दिन में ही महिला पत्रकार को वहां से हटा कर जोधपुर बुला लिया। कुलदीप व्यास ने ओम गौड़ के कई चेलों का सफाया किया, लेकिन आखिर खुद ही उनके चक्कर में आ गए।  हां यह बात सही है कि कुलदीप व्यास ने प्रसार संख्या के मामले में भास्कर को पत्रिका के बराबर लाकर ख़ड़ा कर दिया, लेकिन डीबी स्टार नाम के भंडाफोड़ सप्लीमेन्ट की बदौलत हुआ यह फायदा साथ में बदनामी भी लेकर आया है। सप्लीमेन्ट में लगे रिपोर्टर व फोटोग्राफर भंडाफोड़ के नाम पर शहर में जमकर वसूली कर रहे हैं। इसके अलावा भी भास्कर की इमारत कमजोर है। क्योकि वहां ज्यादातर छोटे अखबारों से आए ऐसे पत्रकार भरे पड़े हैं जो ग्रेजुएट भी नहीं हैं। खराब सैलेरी सिस्टम के कारण अच्छे पत्रकार वहां जाना नहीं चाहते। इसलिए छोटे अखबारों से आए कम जानकार लोगों से काम चलाना प्रबन्धन की मजबूरी है।

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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0 Comments

  1. raj

    August 18, 2011 at 5:47 pm

    [b]यशवंतजी, आपको यह सच्चाई छापने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद और आभार। जिन पत्रकार महोदय ने आपको पत्र भेजा है वो भास्कर की पूरी हकीकत तो नहीं बता पाए परन्तु उनके 80 प्रतिशत फेक्टस सही है। इस आर्टीकल में लिखा है कि वेतन प्रणाली के कारण अच्छे पत्रकार भास्कर में नहीं जाते। यह बात सही है किन्तु यह प्रणाली कम्पनी ने ही तो लागू कर रखी है जिसका नाम है सीटीसी। मैं आपको एक बात और बता दूं कि दैनिक भास्कर के ज्यादातर पत्रकार भास्कर अखबार के नहीं बल्कि एक फैक्ट्री के एम्पलोई हैं। भास्कर प्रबन्धन ने ऊपर की श्रेणी के कुछ पत्रकारों को ही कागजात में अपना कर्मचारी दिखाया हुआ है। किन्तु यह कहना पड़ेगा कि भास्कर पूरी तरह व्यावसायिक होते हुए भी इस दौड़ में राजस्थान पत्रिका से पीछे ही है। भास्कर वाले भी सब सरकारी फायदे लेते हैं, लेकिन पत्रिका जैसे पूरे नतमस्तक नहीं होते। यह बात सही है कि पहले भास्कर का कबाड़ा ओम गौड़ ने किया और अब डीबी स्टार कर रहा है। डीबी स्टार के रिपोर्टर और फोटोग्राफर खुली लूट कर रहे हैं। रिपोर्टर तो रिपोर्टर अब तो फोटोग्राफर ने भी कार खरीद ली है। फिर उसे डीबी स्टार से हटाया गया। सम्पादकजी सब जानते हुए अनजान बने रहते हैं। कही उनका कमीशन तो शामिल नहीं है। लाल बत्ती की गाड़ी वाला एक संदिग्ध शख्स आजकल सम्पादकजी का खास दोस्त बना हुआ है। उनको यही सलाह है कि अपने साथ रहने वाले के बारे थोड़ा पता तो कर लिया करें। [/b]

  2. Dharmendra Vyas

    August 18, 2011 at 6:20 pm

    जोधपुर के पत्रकारों की सबसे बड़ी मुसीबत यह है कि वे काम कम करते हैं और दूसरों के पीछे ज्यादा पड़े रहते हैं। पश्चिमी राजस्थान की पत्रकारिता में गुलाब बत्रा, नारायण बारेठ, निरंजन परिहार संजय सिंढ़ायच और ओम गौड काफी चमकते सिकारे के रूप में देखे जाते रहे हैं। बत्राजी तो जयपुर चले गए, नारायण बारेठ भी बीबीसी में जयपुर में काम करके जोधपुर का नाम रोशन कर रहे हैं। निरंजन परिहार और संजय सिंढ़ायच मुंबई में जाकर जनसत्ता में काफी लंबे समय तक रहे। फिर संजय सिंढायच जापान जाकर बस गए तथा निरंजन परिहार देश के कई राजनेताओं के सलाहकार होने के साथ डॉक्यूमेंट्री फिल्मों के काम में लग गए। ओम गौड जोधपुर में रहकर पत्रकारिता करते रहे। वे काफी मेहनती हैं और भास्कर समूह के प्रतिभाशाली संपादकों में उनका नाम आता है। ये सारे लोग वास्तव में पने काम के बूते पर जाने जाते रहे हैं। बत्रा, बारेठ, परिहार, सिंढायच और ओम गौड का न केवल राजस्थान बल्कि समूचे राजस्थान और देश भर में इतना सम्मान है कि वे कहीं भी चले जाएं, लोग उनको गुलाबजी, नारायणजी, निरंजन परिहारजी, संजयजी और ओमजी जैसे सम्मान सूचक नाम से उनका नाम लेते हैं। भास्कर के बहाने इस रिपोर्ट में ओमजी जैसे काफी वरिष्ठ और बेहद शालीन व सम्मानित पत्रकार को खलनायक बनाने की बचकानी कोशिश से साफ लगता है कि लेखक महाशय की मंशा सिर्फ कीचड़ उछालने की है। सम्मानित पत्रकारों और देश में राज,्थान का नाम रोशन करनेवाले इन साथियों का राजस्थान की ही नहीं देश की पत्रकारिता में काफी योगदान है। एक पूरी पीढ़ी इन्होंने तैयार की है। ओमजी का नाम और काम दोनों काफी चमकदार है। कुछ लोग उस रोशनी को पचा नहीं पा रहे हैं, तो छाती पीटते रहें। सूरज तोे यूं ही चमकता रहेगा और रोशनी फैलाता रहेगा।

  3. ritesh verma

    August 19, 2011 at 7:04 am

    bhaskar ka editorial lagbhag har jagah kamjor raha hai. Ranchi aur Jamshedpur main yehi haal hai. Kewal kharab sadak aur bina helmet bike chalane wale photo ke alawa kuch bhi to nahin hai. Annual scheme ke dum per kab tak tik payega bhaskar keh nahin sakte. yehi karan hai ki bhaskar ke aane ke baad bhi Prabhat Khabar aur Hindustan ki pakad aur majbut hui hai. Jagran aur Sanmarg bhi apni pehchan bana chuke hain. Bhaskar ko samajhna hoga ki wo akhbar chapte hain shampoo ya saabun nahin bechte.

  4. anu

    August 21, 2011 at 6:09 pm

    [i][b]यशवंतजी आपको और भड़ास4मीडिया को बहुत-बहुत शुक्रिया।। आपको पूरा भास्कर स्टाफ तहे दिल से शुक्रिया अदा कर रहा है। आपने भास्कर के स्टाफ खास तौर पर एडिटोरियल के लोगों की वर्षों की पीड़़ा को छापा है। यशवंतजी क्या बताएं आपको कि इस महिला पत्रकार का व्यवहार पचास साल से ज्यादा की उम्र हो जाने के बावजूद भी बच्चों से बदतर है। शायद ही स्टाफ में कोई बचा होगा जिससे यह लड़ी नहीं होगी। अब महिला होने के कारण कोई इनसे हाथापाई भी तो नहीं कर सकता। रोज सुबह होने वाली रिपोर्टिंग की मिटिंग में हर कोई डरते हुए आता है कि आप पता नहीं किसके कपड़े फाड़े जायेंगे। परेशान चार-पांच रिपोर्टरों ने तो इनके झगड़ने की वीडियो क्लिप भी बना रखी है जिनको हम जल्दी ही भेजते हैं जिससे आपको भी पक्का यकीन हो जायेगा। [/b][/i]

  5. B.M.VERMA

    August 22, 2011 at 2:45 pm

    यशवंतजी, आपको यह सच्चाई छापने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद और आभार।
    इस आर्टीकल में लिखा है कि वेतन प्रणाली के कारण अच्छे पत्रकार भास्कर में नहीं जाते। भास्कर ने ऊपर की श्रेणी के कुछ पत्रकारों को ही कागजात में अपना कर्मचारी दिखाया हुआ है। किन्तु यह कहना पड़ेगा कि भास्कर पूरी तरह व्यावसायिक होते हुए भी इस दौड़ में राजस्थान पत्रिका से पीछे ही है। भास्कर वाले भी सब सरकारी फायदे लेते हैं, लेकिन पत्रिका जैसे पूरे नतमस्तक नहीं होते। यह बात सही है कि पहले भास्कर का कबाड़ा ओम गौड़ ने किया और अब डीबी स्टार कर रहा है। डीबी स्टार के रिपोर्टर और फोटोग्राफर खुली लूट कर रहे हैं। रिपोर्टर तो रिपोर्टर अब तो फोटोग्राफर ने भी कार खरीद ली है। फिर उसे डीबी स्टार से हटाया गया। सम्पादकजी सब जानते हुए अनजान बने रहते हैं

  6. Ayodhya Prasad Gaur

    August 24, 2011 at 10:57 am

    Dear Friends,

    It would be a better idea to stop non-sense talks about those who can’t comment directly or participate in such dirty debate.

    All editors in Jodhpur have contributed well and all newspapers are doing great in this region. Let’s get united for betterment of all friends at media.

    A friendly suggestion to the writer of this STORY: Let’s check your facts before you talk. And…one should not hide his/her name if he or she is brave enough to bring facts to public.

    Be Bold my Friend…

    Warm regards

    Ayodhya Prasad Gaur

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