माननीय प्रधानमंत्री जी, सादर प्रणाम! उम्मीद है कि आप सकुशल होगें। रही बात मेरी, तो मैं कैसा हूं, किस हालात में हूं? इससे आपको न कोई मतलब है और न जानने की फुरसत। मैं ठहरा भारत का एक आम नौजवान, वो भी देशभक्त। मैं यह भी जानता हूं कि मेरा यह पत्र भी पहले भेजे गये अन्य सभी पत्रों की तरह संभव है कूड़ेदान में फेक दिया जायेगा, फिर भी यह पत्र आपको लिख रहा हूं। फर्क सिर्फ इतना है कि अब तक मैं आपको गोपनीय पत्र लिखता था, लेकिन इस बार आपके नाम खुला पत्र लिख रहा हूं।
सन् 2010 का पूरा साल बीत गया, मैंने आप तक अपनी एक भी चिठ्ठी नहीं पहुंचाई, शायद आप सोच रहे होंगे कि मैं आपको भूल गया, नहीं, ऐसी बात नहीं है। मैं आपको कैसे भूल सकता हूं? मैं अच्छी तरह जानता हूं कि आप इंडिया के प्राइममिनिस्टर हैं। दरअसल मुझे कुछ गलतफहमी हो गयी थी कि आपने हमारे मांगपत्र को पढ़ लिया है और उसमें लिखित देश की आजादी की लड़ाई में कुर्बानी देने वाले लाखों शहीदों के सम्मान में इंडिया गेट पर एकता, त्याग व कुर्बानी का प्रतीक राष्ट्रीय स्मारक बनाने की मांग को पूरा करने वाले हैं, क्योंकि आप एक ईमानदार प्राइममिनिस्टर माने जाते है, आप गद्दार तो हैं नहीं, देशभक्तों का तहेदिल से सम्मान करते हैं और आजादी की लड़ाई में कुर्बानी देने वालों को देशभक्त ही मानते हैं। मेरे दिमाग में यह गलतफहमी उस समय घुस गयी जब दिल्ली में जंतर-मंतर पर 9 अगस्त 2009 से 21 दिन तक चले मेरे अनशन व मौन आंदोलन के बाद आपके कार्यालय से मुझे एक पत्र मिला जिसमें हमारे मांगपत्र के आधार पर शहरी विकास मंत्रालय को शहीद स्मारक बनाने के लिए कहा गया था।
मैं मन ही मन खुशी से नाच उठा, हमने सोचा, चलो 62 साल बाद ही सही, अब हमारी सरकार अपने देशभक्त शहीदों को सम्मान देगी जिससे आज की युवा पीढ़ी में फिर से देशभक्त बनने का आदर्श पैदा होगा जिसकी प्रेरणा से ये देशभक्त नौजवान देशद्रोही लुटेरों व नफरत के सौदागरों के मंसूबों को मटियामेट कर देंगे। लेकिन जब आप 26 जनवरी 2010 को पुनः इंडिया गेट पर ही सलामी देने आप पहुंच गये तो मन निराशा से भर उठा, फिर भी हमने अपने दिल को तसल्ली दी कि जो काम 62 सालों में नहीं हुआ उसे पूरा होने में थोड़ा वक्त तो लगेगा ही। इसी इंतजार में कि देशभक्त शहीदों के स्मारक बनाने की घोषणा आज होगी कल होगी, 2010 का पूरा साल बीत गया और मैं आपको पत्र नहीं लिख सका।
जब 26 जनवरी 2011 के दस्तक देने के बावजूद भी देशभक्त शहीदों के सम्मान के लिए आपकी तरफ से कोई पहल नहीं हुई तब मजबूर होकर मुझे यह खुला पत्र लिखना पड़ रहा है। इस पत्र के माध्यम से हम जानना चाहते हैं कि आज अंग्रेजों के जाने के 63 वर्ष बाद भी दिल्ली में भारत सरकार 1757 से लेकर 1947 तक के स्वाधीनता आंदोलन में जीवन लगाने व न्यौछावर करने वाले लाखों ज्ञात-अज्ञात देशभक्त शहीदों को भुला कर ही नहीं बल्कि उनकी अवहेलना कर, इंडिया गेट को शहीदों की याद बताकर आजादी के प्रतीक दिन, हर 26 जनवरी और 15 अगस्त को इंडिया गेट पर सिर झुकाती है, आखिर क्यों? जबकि आप अच्छी तरह जानते हैं कि इंडिया गेट पर खुदे नामों में एक भी नाम हमारे स्वाधीनता आंदोलन के शहीदों का नही है।
जब हम किसी से प्रश्न करते हैं कि क्या आपको पता है कि इंडिया गेट किसकी याद में बना है? तो सब कहते हैं शहीदों की याद में। पर आम आदमी को जब पता चलता है कि यह अफगान व प्रथम विश्वयुद्ध में अंग्रेज साम्राज्य की रक्षा के लिए मरने वाले सिपाहियों की याद में बना है, हमारे आजादी के शहीदों की याद में नहीं, तो उसे यह बात झूठ लगती है। परंतु आप तो इसकी सच्चाई जानते हैं कि इंडिया गेट की नींव 10 फरवरी 1921 में एक अंग्रेज अधिकारी लुटियन ने डाली थी और 1931 में जब शहीद भगत सिंह, राजगुरू और सुखदेव को फांसी दी जा रही थी तो इन शहीदों का हत्यारा लार्ड इरविन ने इसे राष्ट्रीय स्मारक घोषित करके इसे भी हमारे मत्थे पर जड़ दिया था। यह कह कर कि ‘‘यह है इंडिया की राष्ट्रीय निशानी, अंग्रेज साम्राज्य की वफादारी का प्रतीक, जो अंग्रेजों के लिए लड़ेगा, उसे सम्मान दिया जाएगा, जो आजादी के लिए लड़ेगा- उसे फांसी।’’
इतना ही नहीं, दिल्ली पर राज करने वाली सरकारों ने 1947 के बाद भारतीय सिपाहियों की कुर्बानी का भी मजाक उड़ाया. जब 1971 में भारतीय सिपाहियों की याद में अमर जवान ज्योति को इसी इंडिया गेट की छत्र-छाया में बनाया गया। क्या आज भारत के पास उनकी कोई राष्ट्रीय यादगार बनाने के लिए भी जगह नहीं थी या फंड नहीं था? हमारा सिपाही भारत के गणतंत्र के लिए जीवन न्योछावर करता है, साम्राज्य के लिए नहीं। फिर अंग्रेजी सेना से आज की सेना का रिश्ता क्यों जोड़ा गया है? क्या आप इससे यह बताना चाहते हैं कि अंग्रेजी सेना व वर्तमान सेना में कोई फर्क नहीं हैं, दोनो एक ही हैं। नहीं! अंग्रेजी सेना की परंपरा से वर्तमान सेना को जोड़ना वर्तमान देशभक्त सैनिकों का अपमान है। हमारे वर्तमान सेना का आदर्श 1857 व आजाद हिंद फौज के देशभक्त सैनिक होने चाहिए, न कि अंग्रेजों के वफादार साम्राज्य रक्षक सेना के सैनिक। आज देश के लोगों को यह पूरी सच्चाई जब पता चलती है तो उन्हें एक बार में विश्वास ही नहीं होता कि हमारे नेता शहीदों के साथ इस तरह की गद्दारी कर सकते हैं।
सच कहूं तो पहली बार जब 2007 में 1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम की 150 वीं वर्षगांठ तथा शहीद भगत सिंह व उनके साथियों की जन्मसदी मनाने की पूरे देश में तैयारियां चल रही थी, अखबारों पत्रिकाओं में लेख छप रहे थे, मैंने भी अपने आजादी की लड़ाई के इतिहास को गहराई से खंगालना शुरू किया तो अपने पूर्वजों की आपसी एकता, त्याग और बलिदान की चारो तरफ बिखरी दास्तानों को पढ़कर हमारी आंखें चौंधिया गई, आज के हालात को देखते हुए हमें एकबारगी विश्वास ही नहीं हुआ कि हम लोग उन्ही बलिदानियों की औलाद हैं।
आप जानते हैं कि राजनीति में नैतिक गिरावट चरम सीमा पर पहुंच चुकी है। राजनीति की यह नैतिक गिरावट देश को गुलामी और बर्बादी में धकेलती है। आज की नैतिक गिरावट का मूल कारण क्या है? आखिर कौन-सी वजह है जिसके कारण त्याग, एकता, बलिदान की बदौलत चले लम्बे स्वाधीनता आंदोलन की बुनियाद पर खड़ी भारतीय राजनीति में 1947 के बाद इतना नैतिक पतन हो गया। कभी-कभी तो मन में यह शंका पैदा होती है कि 1757 से 1947 तक के करोड़ो जीवन न्यौछावर करने वाले शहीदों और देशभक्तों को भारत सरकार का सलाम न करने के पीछे कोई गुप्त साजिश तो नहीं है। कहीं ऐसा तो नहीं कि यह सरकार स्वाधीनता आंदोलन के उसूलों को अपना प्रेरणा स्रोत नहीं मानती बल्कि फूट व लूट के साम्राज्यवादी मूल्यों को ही दिल में छुपाये हुए है। यदि हम स्वाधीनता आंदोलन के उसूलों को अपना आदर्श बनाकर चलते तो आज जो हालात हैं, न पैदा होते।
आप अच्छी तरह जानते हैं जिस व्यक्ति, समाज व राष्ट्र का जैसा आदर्श होता है, वह व्यक्ति, समाज व राष्ट्र एक न एक दिन वैसा बन जाता है। क्या आपने कभी सोचा कि आखिर अंग्रेजों ने भारतीय जनता की फूट व भारतीय प्राकृतिक संसाधनों की लूट तथा भारतीय भाषा व सांस्कृतिक मूल्यों के पतन की जो नींव डाली, वे खत्म होने की बजाय दिन दूना रात चौगुना की गति से बढ़ रही है, क्यों? क्योंकि स्वाधीनता आंदोलन के उसूलों की जगह अंग्रजों के साम्राज्यवादी मूल्यों को ही हमने अपना राष्ट्रीय आदर्श बना रखा है, जिसकी निशानी है इंडिया गेट। इसीलिए आप भी देशभक्त शहीदों का अपमान करते हैं और इंडिया गेट को सलाम करते हैं।
लोग कहते हैं कि आप एक ईमानदार प्रधानमंत्री है। आपसे एक बात पूछता हूं, ईमानदारी से सच-सच बताईयेगा। यदि आप देश की आजादी के लिए सब कुछ न्यौछावर करने वाले शहीदों, जिनकी बदौलत आपको भी प्रधानमंत्री बनने का मौका मिला है, अगर उन शहीदों का ही आप सम्मान नहीं कर सकते तो क्या आपको लगता है कि आप कभी भी आजकल के उन करोड़ों भारतीयों का सम्मान व उनके लिए रोटी, कपड़ा, मकान का इंतेजाम कर पायेंगे, जो दिन-रात अपने ही सुख-दुख में उलझे रह जाते हैं।
हमारा भी ध्यान जब इस तरफ गया तो इंडिया गेट की हकीकत को स्वीकार्य करने में कई दिन लग गये। कई किताबों को उलटा-पलटा कई-कई घंटे इंटरनेट खंगाला। जब पूरी सच्चाई सामने आ गई तब इरादा बना इंडिया गेट की जगह स्वाधीनता आंदोलन के शहीदों के मूल्यों को राष्ट्रीय आदर्श बनाने तथा देशभक्त शहीदों का स्मारक बनाकर उसे सलामी देने के लिए अभियान चलाने का। इसकी जिम्मेदरी ‘‘तीसरा स्वधीनता आंदोलन’’ के साथियों ने ली।
31 मई 2007 को दिल्ली लाल किले के दीवान-ए-आम में देश भर से करीब 500 किसान, मजदूर, छात्र, नौजवान व बुद्धिजीवी, शहीदों के परिजन व विभिन्न देशभक्त परिवर्तनकारी संगठनों के प्रतिनिधियों के द्वारा साझी रोटी-साझा संकल्प के कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इसमें भारत व भारतीयों की पूर्ण आजादी के लिए पहले व दूसरे स्वाधीनता आंदोलन के सकरात्मक व नकरात्मक पहलुओं से सीखते हुए देश में तीसरे स्वाधीनता आंदोलन को चलाने का संकल्प लिया गया।
31 मई 2007 को ही लाल किले में तीसरा स्वाधीनता आंदोलन की स्थापना के पश्चात महर्षि दयानन्द भवन, दिल्ली में राष्ट्रीय संवाद का आयोजन किया गया। 21-29 जुलाई 2007 को नैनीताल, उत्तराखण्ड में राष्ट्रीय चिंतन शिविर आयोजित हुआ। 21 सितम्बर 2007 को हुमायूं के मकबरे पर दिल्ली में राष्ट्रीय देशभक्त पंचायत का आयोजन कर आशादीप प्रज्जवलित किया गया। 23 से 25 दिसम्बर 2007 को शहीद भगत सिंह के गांव खटकड़ कला, पंजाब में राष्ट्रीय चिंतन शिविर का आयोजन हुआ। 13 अप्रैल 2008 को जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय दिल्ली में राष्ट्रीय संवाद द्वारा स्मारक के लिए आंदोलन तेज करने का फैसला लिया गया। 31 मई 2008 को जंतर-मंतर दिल्ली में राष्ट्रीय संसद द्वारा माननीय राष्ट्रपति को ज्ञापन दिया गया। 1 अक्टूबर 2008 को जंतर-मंतर पर धरना द्वारा आपको ज्ञापन सौंपा गया। 31 दिसंबर 2008 मुरादाबाद, उत्तर प्रदेश में राष्ट्रीय चिंतन शिविर का आयोजन किया गया। इस बीच राष्ट्रपति कार्यालय से स्मारक बनाने के लिए सांस्कृतिक मंत्रालय को पत्र लिखा गया, फिर भी कोई कार्यवाही नहीं की गयी। फिर 21 से 23 जनवरी 2009 को जंतर-मंतर पर दिल्ली में तीन दिवसीय सत्याग्रह द्वारा पुनः माननीय राष्ट्रपति को ज्ञापन सौपा गया।
31 मई 2009 को राजेन्द्र भवन, दिल्ली में आन्दोलन की राष्ट्रीय कार्यसमिति की बैठक हुई, जिसमें 9 अगस्त 2009 से अनशन करने का निर्णय हुआ। इसकी सूचना पत्र द्वारा मा. राष्ट्रपति व आपको भेजा गया। 9 अगस्त 2009 को जंतर-मंतर पर संसद भवन के पास दिल्ली में मैने अनशन शुरू किया जो 23 अगस्त तक जारी रहा। इस बीच सरकार द्वारा मेरी गिरफ्तारी के विरोध में 23 अगस्त से 30 अगस्त तक मौन व्रत रखा गया तथा 30 अगस्त को अनशन स्थल पर आयोजित जनसंसद द्वारा पुनः मा. राष्ट्रपति व आपको चेतावनी पत्र भेजा गया व इसके लिए राष्ट्रव्यापी अभियान चलाने का निर्णय हुआ। आंदोलन के दबाव में राष्ट्रपति भवन व आपके कार्यालय तथा संस्कृतिक मंत्रालय से शहरी विकास मंत्रालय को स्मारक बनाने के लिए पत्र लिखा गया लेकिन अभी तक स्मारक नहीं बनाया गया बल्कि शहीदों के सम्मान को फुटबॉल की गेंद की तरह इस मंत्रालय से उस मंत्रालय तक लात मारकर पहुंचाने का खेल खेला जा रहा है।
फिर भी हम इस लड़ाई को तब तक जारी रखेगें जब तक शहीदों का सम्मान व उनके अरमान पूरा नहीं हो जाते।
लेकिन आप क्या करेंगे माननीय प्रधानमंत्री जी?
आपके जवाब की प्रतीक्षा में…
गोपाल राय
राष्ट्रीय संगठक
तीसरा स्वाधीनता आंदोलन
पता- 377 गली नं.-2ए, माता मंदिर मार्ग, मैन रोड
मौजपुर, दिल्ली-53
मोबाइल – 09871215875












pardeep mahajan
January 21, 2011 at 5:36 am
gopal bhai apne sahi likha,bola or kiya bhi hai parantu rajniti me randuo, bhaduo,or ganduo ki bharti hai agar unme nahi hai to deshbhkti hi nahi hai me aapse sahmat hu ki desh ke shahido ko sammaan milna chahie lekin us desh ke netao ka kya kare jisme dogla khoon chal raha hai
.aapka sathi (commando ) yashwant jesa ho to aap teesara sawadhinta aandolan bhi jeet jayenge bas himmat banaye rakhna
-pardeep mahajan ( president- all india journalist front ) [email protected] ph. 9810310927
Indian Citizen
January 20, 2011 at 4:09 pm
देश का दुर्भाग्य है…