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पुलिस का रवैया स्तब्धकारी है : हरिवंश

प्रिय यशवंत, अभी-अभी जस्टिस फॉर माँ कैंपेन के बारे में जानकारी मिली. मां के साथ पुलिस ने जो सुलूक किया, वह स्तब्धकारी है. आज भी पुराने युग के बर्बर कानूनों को सत्ता इस्तेमाल करे, इससे बड़ा दुर्भाग्य क्या हो सकता है.

प्रिय यशवंत, अभी-अभी जस्टिस फॉर माँ कैंपेन के बारे में जानकारी मिली. मां के साथ पुलिस ने जो सुलूक किया, वह स्तब्धकारी है. आज भी पुराने युग के बर्बर कानूनों को सत्ता इस्तेमाल करे, इससे बड़ा दुर्भाग्य क्या हो सकता है.

यह सिर्फ किसी एक व्यक्ति के माँ या परिवार का सवाल नहीं है, सवाल यह है कि क्या हम सभ्य समाज बनाना चाहते हैं या लगातार प्रगति के नारों को लगाते हुए अंधे युग के कानूनों मैं लौटना चाहते हैं. इसका व्यापक स्तर पर विरोध होना चाहिए. सबसे जरूरी बात यह है कि दिल्ली में कैसे इन सवालों पर परिवर्तन का माहौल बनाया जाये. क्योंकि इस देश का भविष्य और भाग्य दिल्ली ही तय कर रही है. आधुनिक बनती मीडिया के लिए ऐसे सवाल अब धीरे-धीरे मात्र खबर स्वरूप ही हैं. जरूरत है कि दिल्ली में ऐसे सवालों पर कैम्पेन चले ताकि बदलाव का मानस बन सके.

हरिवंश 
प्रधान संपादक
प्रभात खबर
रांची

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0 Comments

  1. बिमल राय

    October 22, 2010 at 5:04 pm

    भाई यशवंत जी

    इस तरह के मुद्दे उठाने से आपके पोटर्ल की क्रियेटविटी और उजागर होती है. इसे जारी रखें

  2. vishvaman

    October 22, 2010 at 6:54 pm

    आत्मीय यशवंत भाई, 
    कई दिन बाद भड़ास देखा। बेहद स्तब्ध हूं। गाजीपुर पुलिस की बर्बरता, उच्चपदस्थ पुलिसियों की क्षुद्रता से इस घटना ने पर्दा उठा दिया है। यह घटना चिंता का विषय है, चर्चा का विषय है। गाजीपुर के आधुनिक गजनवियों से लेकर लखनऊ की तुगलकी नवाबन और दिल्ली की अंधी-बहरी सत्ता को जगाना होगा। इनकी आंखें खोलनी होंगी, कानों के पर्दे साफ करने होंगे। ऐसा न किया जा सके, तो फिर ये आंखें फोड़नी होंगी-इनके कानों में पिघला शीशा डालना होगा। पुलिस प्रशासन सदैव दायित्वों के प्रति नपुंसक रहा है। अपराध का जो क्लाइमैक्स आज दिख रहा है, उसकी संरक्षक यह पुलिस ही है। राजनेताओं के पीछे कुत्ते की दुम की तरह हिलने वाली यह संस्था सर्वाधिक अपकृत्यों को अंजाम देती है। दिल्ली हो या गाजीपुर-लोकहितों की रक्षा के नामपर जनाधिकारों का जितना हनन इस संस्था ने किया, वह अन्यत्र दुर्लभ है। इस देश में मां-बेटियां सदैव असुरक्षित रही हैं। फिर से शस्त्र उठाना होगा। कलम नहीं, तलवार जिएगी। ये सत्ता के रावण हैं। एक-दो नहीं, इनका समूचा शिरोच्छेद करना होगा। पुलिस हो या राजनेता, इनकी नाभि में हमेशा अमृत है-सत्ता का-पैसे का-पद का-प्रतिष्ठा का। इसे सोखना पड़ेगा। दीर्घकालिक आंदोलन चलाना पड़ेगा। शुरुआत हो चुकी है।

  3. kabir

    October 22, 2010 at 8:18 pm

    harivansh ji, aap aise bata rahe hai jaise police ne aisa pahli bar kisi ke saath kiya ho. bhadas apki chamchgiri karta rahta hai isliye apko yeh ghatna vismaykari lag rahi hai. kisi bhi mahila ke saath aisa nahi hona chahiye yah sahi hai. par is mamle ko kum se kum abhivyakti ke adhikar ke hanan ka mamla na banaye. abhi jab jagran par kanpr me danda chala to yahi police theek thi. ab UP police kharab ho gayi aisa nahi hai.

  4. Navtan Kumar

    October 22, 2010 at 10:01 pm

    This is very unfortunate. I strongly condemn it.

  5. Bhanupratapnarain Mishra

    October 23, 2010 at 9:41 pm

    Bilkul theek kaha harivansh ji aapne per delhi kiski…jo jameen ka dandha karen ya fir kamin ho…delhi ab bharat ki rajdhani hone layak nahi rahi…vasnsvaad ke aaatankvadiyao ne Gandhi family ki leadership main is muluk ki loktantrick atama ko kuchal dala hai…Anti Dynasty Front.

  6. प्रवीण चन्द्र रॉय

    October 25, 2010 at 11:56 pm

    श्रीमान,
    माँ के बारे में पढ़कर बहुत दुखी हुआ . लेकिन ये सच है की पुलिस के इस चेहरे से पूरे भारत के लोग परिचित हैं . मेरे और मेरे जैसों के लिये पुलिस बर्बरता की यह कोई नयी बात या नहीं है . हाँ नई बात ये है की पुलिसिया जुल्म के आगे यशवंत जी की माँ और अन्य को भी विवश होकर १८ घंटे लगभग पुलिस थाना में बिताना पड़ा. तो सोचिये की आम आदमी को पोलिसे कितना ज्यादा प्रताडित करती है ?
    अगर इन शीर्ष पदों पर पुरुष असीन होते तोः हम उन्हे न जाने क्या क्या कहते . लेकिन यहाँ तोः कुछ कह भी नहीं सकते ……
    नोट – उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री ?
    भारत की राष्ट्रपति ?
    लोकसभा स्पीकर ?
    upa और राष्ट्रीय सलाहकार परिषद् की प्रमुख ?

    [email protected]

  7. प्रवीण चन्द्र रॉय

    October 25, 2010 at 11:57 pm

    श्रीमान,
    माँ के बारे में पढ़कर बहुत दुखी हुआ . लेकिन ये सच है की पुलिस के इस चेहरे से पूरे भारत के लोग परिचित हैं . मेरे और मेरे जैसों के लिये पुलिस बर्बरता की यह कोई नयी बात या नहीं है . हाँ नई बात ये है की पुलिसिया जुल्म के आगे यशवंत जी की माँ और अन्य को भी विवश होकर १८ घंटे लगभग पुलिस थाना में बिताना पड़ा. तो सोचिये की आम आदमी को पोलिसे कितना ज्यादा प्रताडित करती है ?
    अगर इन शीर्ष पदों पर पुरुष असीन होते तोः हम उन्हे न जाने क्या क्या कहते . लेकिन यहाँ तोः कुछ कह भी नहीं सकते ……
    नोट – उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री ?
    भारत की राष्ट्रपति ?
    लोकसभा स्पीकर ?
    upa और राष्ट्रीय सलाहकार परिषद् की प्रमुख ?

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