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पूनम पांडे जैसों का नंगापन ज्‍यादा दिनों तक नहीं टिकता : नलिन रंजन

नलिन रंजन सिंह। यही है उनका पूरा नाम। आम्रपाली ग्रुप के बैनर तले बनी फिल्म गांधी टू हिटलर के हीरो और पटकथा लेखक। नई दिल्ली स्थित एनआरएआई इंस्टीट्यूट आफ मास कम्युनिकेशन के डायरेक्टर। रंगमंच से किशोरावस्था में ही जुड़े रहने वाले नलिन ने गांधी टू हिटलर यह सोच कर बनायी कि परदेस में भारत की जिस गरीबी को चित्रित कर लोग माल बटोरते रहे हैं, वह मिथ्या है। भारत, परदेश में भी गरीब नहीं है।

नलिन रंजन सिंह। यही है उनका पूरा नाम। आम्रपाली ग्रुप के बैनर तले बनी फिल्म गांधी टू हिटलर के हीरो और पटकथा लेखक। नई दिल्ली स्थित एनआरएआई इंस्टीट्यूट आफ मास कम्युनिकेशन के डायरेक्टर। रंगमंच से किशोरावस्था में ही जुड़े रहने वाले नलिन ने गांधी टू हिटलर यह सोच कर बनायी कि परदेस में भारत की जिस गरीबी को चित्रित कर लोग माल बटोरते रहे हैं, वह मिथ्या है। भारत, परदेश में भी गरीब नहीं है।

हां, यह भारतीयों की सदाशयता और सदृदय होने का प्रमाण है कि वे अरबपति होकर भी धोती-कुर्ता से ही अपना काम चला लेते हैं। पर, अगर कोई इसे गरीबी मानता है तो उसकी सोच गरीब है। गांधी टू हिटलर में इसे ही फ्लैश किया गया है और यह बताने का प्रयास किया गया है कि हिटलर और गांधी के रूट मैप्स क्या रहे और इस देश की जनता को कैसा नेतृत्व चाहिए।

नलिन खबरों में इसलिए हैं क्योंकि 8 करोड़ के बजट में वह अकेले ही अभिनेता भी हैं और पटकथा लेखक भी। फिल्म कान्स फिल्म समारोह में दिखायी जा चुकी है और इस फिल्म को बेहतरीन कवरेज भी मिला है। अब अगली तैयारी है इसे बर्लिन फिल्म समारोह में दिखाये जाने की। जून के आखिरी में इस फिल्म को 400 प्रिंट के साथ पूरे विश्व में दिखाया जाएगा। पत्रकार आनंद सिंह ने उनसे लंबी बातचीत की। पेश है खास अंश–

– आपने पटकथा लेखन कब शुरू किया?

मैं अंग्रेजी का छात्र रहा। कालेज के दिनों में मैंने अनेक नाटक लिखे और उनका मंचन भी किया। उन नाटकों ने अनेक पुरस्कार भी जीते। गांधी टू हिटलर मेरी पहली फिल्म है। इस फिल्म के लिए पटकथा लेखन के लिए मैंने 2 साल रिसर्च किया। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि इतिहासकारों ने भी उस विषय पर कुछ खास तवज्जो नहीं दिया जिसे लेकर मैंने इस फिल्म की पटकथा लिखी।

– पटकथा लेखन में आपको सबसे ज्यादा किसने प्रभावित किया?

देखिए, यह पहली बार हो रहा है जब बालीवुड ने किसी विदेशी के चरित्र को हिंदी फिल्मों के लायक समझा। हां, कालांतर में हालीवुड में भारतीय चरित्रों को लेकर फिल्मों का निर्माण लगातार होता रहा पर हमारे यहां यह कमी महसूस की जा रही थी। स्लमडाग मिलेनियर, गांधी, रामायण,  महाभारत जैसे भारतीय परिवेश की परिघटनाओं को अंग्रेजी में प्रस्तुत किया गया। मेरे पास बालीवुड की कोई फिल्म या पटकथा नहीं थी जिससे मैं प्रेरणा ले सकता और गांधी टू हिटलर के लिए पटकथा लिख सकता।

— दम मारो दम में दीपिका पादुकोण कहती है, …कल मेरी जींस खींचेगा….इस तरह के डायलाग को आप किस नजरिये से देखते हैं?

यह भद्दा है। मेरा मानना है कि गाने के साथ-साथ इसका फिल्मांकन भी गड़बड़ है। मूलतः इस फिल्म के इस गीत को आप सपरिवार नहीं देख सकते। आपको अचरज होगा। मैंने अपने परिवार के साथ जो आखिरी फिल्म देखी थी, वह शोले और गांधी थी। दरअसल, यह इसलिए हो रहा है क्योंकि हमें शानदार फिल्में देखने को नहीं मिल रही हैं। आप देखें, टीवी पर सास-बहू टाइप के सीरियल कापी लोकप्रिय हो रहे हैं। मेरे समझ से अब जरूरत इस बात की है कि हम फिल्म इस किस्म की बनाएं जो परिवार आधारित हो। कहना न होगा, यशराज बैनर ने इस दिशा में लगातार उम्दा काम किया है और आगे भी वे लोग अच्छी चीजें करने जा रहे हैं।

– क्या कारण है कि शोले का गब्बर अब किसी भी फिल्म में नहीं दिखता। क्या आपको नहीं लगता कि पटकथा लेखन में अब वह गंभीरता नहीं रह गयी जो 70 और 80 के दशक में थी?

(थोड़ा चिंतित होकर) अब वह मुमकिन नहीं हो सका। अब तो पूनम पांडे कहती है कि अगर टीम इंडिया वर्ल्ड कप जीत जाएगी तो वह नंगे होकर सेलिब्रेट करेगी। वह इस डायलाग को बोल कर मीडिया से कुछ ही समय के लिए सही, पर सुर्खियां बटोर ले जाती है। पर, यह नंगापन ज्यादा दिनों तक नहीं टिकता। वैसे ही, सस्ता पटकथा लेखन भी ज्यादा दिनों तक नहीं टिकता। हां, पटकथा के लिहाज से जब वी मेट एक अच्छी फिल्म आयी थी। मैं इस किस्म की फिल्मों की प्रतीक्षा कर रहा हूं।

– आप पत्रकारिता संस्थान भी चलाते हैं, फिल्म के लिए पटकथा लेखन भी कर रहे हैं। आप कैसे मैनेज करते हैं इन चीजों को। दिल्ली से मुंबई के बीच कैसे सामंजस्य बैठाते हैं आप?

देखिए, दोनों अलग-अलग सेगमेंट हैं। मेरे संस्थान, एनआरएआई के जितने भी विद्यार्थी हैं वे सब मेरे मित्र हैं। मैं उनके साथ रहने को प्राथमिकता देता हूं। मैं उनका मार्गदर्शक हूं। मैं उनकी तरह कपड़े पहनता हूं, उनसे बात करता हूं, उनके साथ घूमता हूं। वे मुझसे अपनी सारे बातें बताते हैं। अब दौर बदल रहा है। मीडिया, जिसमें फिल्म भी शामिल है, अब वह डामिनेटिंग कैपेसिटी में है। खास कर बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश के लोग इस क्षेत्र में काफी तेजी से डामिनेट कर रहे हैं। तो, मुझे एडजस्ट करने में बहुत कठिनाई नहीं होती। गोल सामने दिखता है। बस एक किक की जरूरत होती है।

गांधी टू हिटलर

फिल्‍म गांधी टू हिटलर के एक दृश्‍य में रघुवीर यादव के साथ नलिन रंजन

– हिटलर टू गांधी का कांसेप्ट दिमाग में कैसे आया। जरा विस्तार से बतायें?

मैं अपने मुल्क की विदेश नीति और लगातार बढ़ रहे भ्रष्टाचार से खासा व्यथित था। खबरों को लगातार देखता था और एक आम हिंदुस्तानी की तरह मैं भी उन खबरों को देख-देख कर पीड़ित होता था। कुछ लोगों की मान्यता थी कि करप्शन दूर करने के लिए और सुदृढ़ विदेश नीति के लिए हमें बेहद कड़े नियम बनाने चाहिए ताकि हम अपनी बात दूसरों को ज्यादा मजबूती से समझा सकें। दूसरी मान्यता यह थी कि भारत अपनी उदारवादी नीतियों के कारण एक शानदार राष्ट्र के रूप में जाना जाता है। ज्यादा कठोर नियम नहीं बनाये जाने चाहिए। इन्हीं दो विचारधाराओं के सम्मिश्रण ने मेरे भीतर पटकथा लेखन का टानिक दिया। हिटलर को आप लाख गाली दें पर यह निर्विवादित तथ्य है कि वह दुनिया का सबसे बड़ा तानाशाह था। मेरी फिल्म में न तो हिटलर को महान बताया गया है न ही गांधी को कमजोर। पूरी फिल्म देखने के बाद जनता खुद ही तय करेगी कि उसे कैसा नेतृत्व चाहिए। मैंने यह जवाब जनता के लिए छोड़ रखा है।

– बिहार के एक मध्यवर्गीय परिवार से आप ताल्लुक रखते हैं। शुरुआती दिनों में किन परेशानियों से आपको दो-चार होना पड़ा?

हमारा परिवार वैशाली का जमींदार परिवार था। हमारी पृष्ठभूमि बेहद शानदार है। मैं अपनी पीढ़ी का पहला शख्स हूं जो नौकरी के लिए बाहर आया। मैं दिल्ली आया। संघर्ष के दिनों को याद करता हूं, किसी को बताता नहीं। कुछ अरसा बाद मैंने घर से पैसा लेना बंद कर दिया। स्नातक किया। मेरे लिए बेहद मुश्किल था किसी के अंडर में काम करना। मैंने दिल्ली में अपना संस्थान खोला, मास कम्युनिकेशन का। एनआरएआई इंस्टीट्यूट आफ मास कम्युनिकेशन। आपको पता होगा ही जीवन में आप एक पत्रकार और पटकथा लेखक के तौर पर कभी भी सुकून से नहीं रह सकते। जो स्थापित हो चुके हैं, वो भी अगले 24 घंटे को आराम से नहीं जी सकते। इंडस्ट्री का ट्रेंड बदल चुका है। मक्खनबाजी यहां सबसे पहले है। आपका जूनियर मक्खनबाजी करके आपका पत्ता साफ कर देगा। आप देखते रह जाएंगे। मैंने कभी मक्खनबाजी नहीं की और शायद करूं भी न क्योंकि मैंने कहीं पढ़ा था कि रास्ता कठिन है मगर अगर हौसला बुलंद है तो अंत में जीत कठिन परिश्रम और सच्चाई की ही होती है।

– कुछ गांधी टू हिटलर के बारे में बताएं?

मैं आम्रपाली ग्रुप के सीएमडी डा. अनिल शर्मा को अपना गाडफादर मानता हूं। उन्होंने ही मुझे एक फिल्म जगत में काम करने के लिए प्लेटफार्म दिया। गांधी टू हिटलर के गीत बेहद सुंदर हैं। इन गीतों को लिखा है डा. पल्लवी मिश्रा ने। इन्हें स्वर दिया है शान, भूपेन हजारिका, दलेर मेहंदी और पिनाज मसानी ने। संगीत से मोहब्बत करने वालों को इस फिल्म के गीत जरूर सुनने चाहिए। वे निराश नहीं होंगे।

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0 Comments

  1. keshav mehta

    June 6, 2011 at 9:12 pm

    nalin ji aapko or puri team ko advance mai congrets…………aapki mehnat jarur raang layaigi yai meri subhkamna hai……..jai mata di

  2. amit baijnath garg.

    July 7, 2011 at 4:46 pm

    nalin ji badhai.

  3. Royal Rakesh

    July 8, 2011 at 2:13 pm

    best wishes for nalin sir…we wish him all the best for his project GANDHI TO HITLER..blockbuster.
    finally
    GO GOBBLES..

    regards
    ROYAL RAKESH

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