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प्रजातंत्र के मंदिर से नहीं, पुजारियों से डिगी है आस्‍था

लोकपाल विधेयक या यूं कहें कि जनलोकपाल विधेयक की चर्चा के दौरान नेताओं ने संसद में बोलते हुए बार-बार याद दिलाया कि संसद प्रजातंत्र का मंदिर है। प्रकारान्तर से जो इस मंदिर में बैठे हैं यानि सांसद वह इसके पुजारी हैं। पुजारियों के लिए कुछ आचार-संहिता बनी हुयी है। अगर वह आचार-संहिता से इतर कोई काम करता है तब भक्तों का विश्वास मंदिर से नहीं बल्कि पुजारी से उठता है।

लोकपाल विधेयक या यूं कहें कि जनलोकपाल विधेयक की चर्चा के दौरान नेताओं ने संसद में बोलते हुए बार-बार याद दिलाया कि संसद प्रजातंत्र का मंदिर है। प्रकारान्तर से जो इस मंदिर में बैठे हैं यानि सांसद वह इसके पुजारी हैं। पुजारियों के लिए कुछ आचार-संहिता बनी हुयी है। अगर वह आचार-संहिता से इतर कोई काम करता है तब भक्तों का विश्वास मंदिर से नहीं बल्कि पुजारी से उठता है।

यह अलग बात है कि संसद में हुई इस बहस में अधिकांश पुजारियों ने कुतर्क करते हुए जनता के उनके प्रति संशय को मंदिर के प्रति संशय बताने की कोशिश की। भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम के अध्याय तीन में “ग्रेटीफिकेशन” (संतुष्टि) की परिभाषा में कहा गया है- ग्रेटिफिकेशन शब्द केवल आर्थिक संतुष्टि या ऐसी संतुष्टि जिसका आकलन धन से हो सके, तक ही सीमित नहीं है। अब एक उदाहरण लें। विश्वास मत के दौरान एक सरकार किसी ऐसी पार्टी से समर्थन लेती है जो पिछले तमाम समय से उसके ख़िलाफ बोलती आयी है। विश्वास मत जीतने के बाद उस पार्टी के कुछ सांसदों को मंत्री बना दिया जाता है। क्या यह भ्रष्टाचार की परिधि में नहीं आता? संतुष्टि की परिभाषा के अनुसार अदृश्य लाभ भी इस श्रेणी में आने चाहिए लेकिन अभी तक हमारी न्याय प्रणाली केवल स्थूल संतुष्टि को ही संज्ञान में ले पाती है। जबकि हक़ीक़त यह है कि समर्थन करने वाली पार्टी ने अपनी सरकार विरोधी नीतियों के आधार पर चुनाव जीतती है और अचानक सी.बी.आई के किसी कदम के बाद अचानक सरकार को समर्थन देने लगती है। प्रजातंत्र की डिक्शनरी के हिसाब से इसे “क्वैलिशन” मानते हुए वैधानिक करार दिया जाता है।

एक उदाहरण लें। सी.बी.आई एक राजनीतिक दल के नेता के ख़िलाफ आय से अधिक संपत्ति के मामले में प्रारम्भिक जांच करती है और इसके आधार पर एक इंटरलोक्यूटरी एप्लिकेशन(आई.ए) के ज़रिए सर्वोच्च न्यायालय से अनुमति चाहती है कि वह केंद्र सरकार या राज्य सरकार के हस्तक्षेप के बगैर जांच को आगे बढ़ाए। इसी बीच सरकार के ख़िलाफ अविश्वास प्रस्ताव आता है और उस नेता की नज़दीकी रिश्तेदार का आवेदन प्रधानमंत्री कार्यालय को मिलता है कि उसकी संपत्ति को नेता की संपत्ति से जोड़ कर ना देखा जाए। अगले एक हफ्ते में वह पार्टी सरकार के पक्ष में मतदान करती है। मतदान के दो महीने बाद वही सी.बी.आई फिर सुप्रीम कोर्ट में एक आवेदन करते हुए अदालत से दरख्वास्त करती है कि वह अपना पूर्व का आई.ए वापस लेना चाहती है। ऐसा करने के पीछे सी.बी.आई का आधार था सॉलिसिटर जनरल की क़ानूनी सलाह और केंद्र सरकार का दिशा निर्देश।

सरकार विश्वास मत हासिल कर लेती है; सब कुछ ठीक चलता रहता है; चार महीने बाद चुनाव की तैयारी होती है; सत्ता में काबिज पार्टी इस समर्थन देने वाली पार्टी से सीटों के बारे में समझौता करना चाहती है लेकिन समझौता नही हो पाता और तब अचानक सी.बी.आई एक बार फिर से सर्वोच्च न्यायालय पहुंचती है और अपने आई.ए की याद दिलाते हुए अदालत से उस दल के नेता के ख़िलाफ जांच की अनुमति मांगती है। यानि सी.बी.आई के तीन रंग देखने को मिले। एक विश्वास मत हासिल करने के पहले प्रारंभिक जांच के आधार पर जांच आगे बढ़ाना चाहती है; जब दल समर्थन देता है तब वह जांच वापस लेना चाहती है और जब सीटों का बटवारा नहीं होता तब उस जांच को फिर से शुरू करना चाहती है। भारत का भ्रष्टाचार निरोधक क़ानून राजनीतिक पैतरेबाज़ियों और लाभ-हानि का बैलेंसशीट नहीं समझ पाता या जांच एजेंसियां वही करती हैं जो लाभ-हानि का बैलेंसशीट रखने वाली सरकार या राजनीतिक दल चाहते हैं।

एक तीसरा उदाहरण लें। सी.बी.आई निदेशक अचानक एक प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाकर ऐलान करता है कि एक मुख्यमंत्री के ख़िलाफ आय से अधिक संपत्ति के मामले में उसे ठोस सबूत मिले हैं। यह वह वक्त है जबकि एक अन्य दल सरकार से नाराज़ होकर अपना समर्थन वापस लेने की धमकी देता है क्योंकि उसके मंत्रियों पर भ्रष्टाचार के आरोप और सुप्रीम कोर्ट के आदेश से कार्रवाई शुरू हो गयी। अचानक दो हफ्ते के भीतर ही पता नहीं क्या हुआ कि केंद्र सरकार की तरफ से कहा गया कि उस मुख्यमंत्री के ख़िलाफ अभी ठोस सबूत नहीं मिले हैं। अगले कई महीनों तक इस मामले में सी.बी.आई चुप्पी जारी रखती है और सी.बी.आई व मुख्यमंत्री दोनों की तरफ से डेट पर डेट ली जा रही है। सरकार चलती रहती है, संसद रूपी मंदिर में पुजारी नियमित रूप से पूजा करते रहते हैं।

ऐसे में कैश फॉर वोट में सरकार अपने दो साल की चुप्पी के बाद सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर एक बार फिर से जांच शुरू करती है और गिरफ्तार करती है उन लोगों को जो या तो इस केस को उजागर करने में आगे आए या जिन्होंने मध्यस्थ (दलाल) की भूमिका निभाई। ग्रेटीफिकेशन की परिभाषा उनको छू भी नहीं पायी जो उस सारी तिकड़म के बाद सत्ता में बने रहे। अपराध न्याय शास्त्र व नागरिक न्याय शास्त्र के बीच मूल अंतर है। पहले में मेंस्रिया (आपराधिक मष्तिष्क) के मानदण्ड पर अपराध को देखा जाता है जबकि दूसरे में क्षति की गणना के आधार पर। इस पूरे मसले में शायद ही कोई नतीज़ा निकल पाए क्योंकि प्रॉसिक्यूशन थ्योरी (अभियोजन सिद्धान्त) से मेंस्रिया ही ग़ायब कर दिया गया है यानि अभियोजन यह नहीं बता पाएगा कि आखिर अमर सिंह ने यह सब क्यों किया, किसके कहने पर किया या अंतिम उद्देश्य किसे लाभ पहुंचाता था।

ज़रा याद करें साझा सरकार युग के शुरुआत से आज तक सरकारें कभी भी किसी नीतिगत फैसले को लेकर नहीं गिरायी गयी हैं। चंद्रशेखर की सरकार दो सिपाहियों के कारण गिरी। जब देवगौड़ा की सरकार गिरी तब सदन में गौड़ा ने कहा “मैं सिर्फ यह पूछता हूं कि किस गलती की वजह से मेरी सरकार गिरायी गयी है?” वामपंथी पूरे चार साल यूपीए-1 की सरकार को जनविरोधी बताते रहे पर उन्हें समर्थन भी देते रहे। लालू यादव बिहार में कांग्रेस के खिलाफ लड़ने के बावजूद आज लालायित हैं कि केन्द्र में उन्हे फिर से मंत्री पद मिल जाए। प्रजातंत्र का मंदिर इसी तरह चलता रहेगा, पुजारी उसे अपवित्र करते रहेंगे और हमें बताया जाएगा कि पुजारी के ख़िलाफ बोलने का मतलब मंदिर पर अविश्वास है।

बने हैं अहले हवस मुद्दई भी मुंसिफ भी,
किसे वकील करें किससे मुंसिफी चाहें।

लेखक एनके सिंह वरिष्‍ठ पत्रकार, ब्रॉडकास्ट एडिटर्स एसोसिएशन के महासचिव और साधना न्यूज चैनल के एडिटर इन चीफ हैं. उनका यह लेख उनके ब्‍लॉग पोस्‍टकार्ड से साभार लेकर प्रकाशित किया जा रहा है. इस लेख का कुछ अंश दैनिक भास्‍कर में भी प्रकाशित हो चुका है.

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0 Comments

  1. vineet kumar

    September 17, 2011 at 5:04 am

    u r right sir….. neta apnea swarthka liya kisi had tak gir sakta hain.
    hamesha janta ko dhokha data hain.

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