
शेषजी
पाकिस्तानियों के लिए 1971 की लड़ाई को भूल पाना मुश्किल था लेकिन मोरारजी देसाई के आने के बाद भारत की विदेशनीति का मुख्य नारा था कि पड़ोसियों से अच्छे सम्बन्ध बनाने की ज़रूरत है. वही कवायद चल रही थी. डॉ. इंदु प्रकाश सिंह विदेश मंत्रालय में पाकिस्तान डेस्क के इंचार्ज थे. विदेश मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी थे. अटल जी का शुमार उर्दू के बहुत बड़े शायर फैज़ अहमद फैज़ के समर्थकों में किया जाता था. अटल बिहारी वाजपेयी इमरजेंसी में जेल में बंद रह चुके थे. जेल से आने के बाद उन्होंने दिल्ली की एक सभा में बा-आवाज़े बुलंद घोषित किया था कि उन्होंने जेल में फैज़ की शायरी को पढ़ा था और उनको फैज़ का वह शेर बहुत पसंद आया था, जहां फैज़ फरमाते हैं कि “कू-ए-यार से निकले तो सू-ए-दार चले”.
जब अटल जी का यह भाषण मावलंकर आडिटोरियम में चल रहा था, उस वक़्त दर्शकों में कनाडा के नागरिक अशोक सिंह भी बैठे थे. अशोक सिंह किसी भारतीय राजनयिक के बेटे थे और पूरी दुनिया में संगीत और संगीतकारों के प्रमोशन का काम करते थे. मुझे लगता है कि वहीं उन्होंने तय कर लिया था कि फैज़ को इस देश में सम्मानपूर्वक लाना है. अशोक सिंह ही फैज़ को

जगजीत सिंह
इसी बीच अशोक सिंह ने कहा कि माहौल बन चुका है. उसको जारी रखना ज़रूरी है. मुन्नी बेगम थोड़ी देर आराम करेंगीं लेकिन इस बीच उन्होंने अपने बम्बई के एक साथी को फैज़ के गाने के लिए प्रस्तुत कर दिया. वहां मौजूद लोगों में किसी ने जगजीत सिंह नाम के इस नौजवान को कभी गाते नहीं सुना था. लेकिन टाइम पास करने के लिए लोगों ने इस नौजवान को भी सुनने के मन बना लिया. पहली ग़ज़ल के बाद ही सब कुछ बदल चुका था. इस खूबसूरत नौजवान की पहली ग़ज़ल सुन कर ही लोग फरमाइश करने लगे. दूसरी, तीसरी और चौथी ग़ज़ल के बाद मुन्नी बेगम ने मोर्चा संभाला लेकिन उन्होंने साफ़ कहा कि जगजीत सिंह की आवाज़ में फैज़ सुनना बहुत अच्छा लगा. प्रोग्राम के आखिर में फैज़ साहब ने खुद कहा कि यह नौजवान ग़ज़ल गायकी की बुलंदियों तक जाएगा. फैज़ की बात में दम था. जगजीत सिंह ने उस दिन बहुत सारे लोगों के अलावा फैज़ और मुन्नी बेगम का नाम भी अपने शुरुआती प्रशंसकों की लिस्ट में लिख लिया था.
उसके बाद बहुत दिन तक जगजीत सिंह को करीब से देखने का मौक़ा नहीं मिला. उनकी फिल्म प्रेमगीत ने यह सुनिश्चित कर दिया कि जगजीत सिंह एक गायक के रूप में अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज करा चुके हैं. फ़िल्मी दुनिया में वे चलता सिक्का बन चुके थे. उसके बाद अर्थ आई, फिर फिल्म साथ साथ. उसके बाद तो फिल्मों का सिलसिला ही शुरू हो गया. जगजीत सिंह ने ग़ज़ल गायकी को एक मेयार दिया. जब टीवी में हमने नसीरुद्दीन शाह को गालिब के रूप में देखा तो समझ में आ गया कि करीब डेढ़ सौ साल पहले गालिब उसी हुलिया में दिल्ली में घूमते रहे होंगे, लेकिन जगजीत सिंह ने गालिब की गजलों को जिस मुहब्बत के साथ गाया वह आने वाली नस्लों के लिए फख्र की बात है. जगजीत सिंह ने ग़ज़ल गायकी की मूल परम्परा को भी निभाया लेकिन बहुत सारे प्रयोग भी किये. उनके जाने के बाद ग़ज़ल के जानकारों का एक करीबी दोस्त गुज़र गया है. और ग़ज़ल को सुनने वालों का एक बहुत बड़ा हीरो चला गया है. अलविदा जगजीत. अलविदा ग़ज़ल के बादशाह और ग़ज़ल के राजकुमार.
लेखक शेष नारायण सिंह वरिष्ठ पत्रकार तथा कॉलमिस्ट हैं. वे इन दिनों दैनिक अखबार जनसंदेश टाइम्स के नेशनल ब्यूरोचीफ हैं.












sachchida nand
June 26, 2014 at 3:39 am
dhanywaad jagjeet singh ke baare me ye rochak lekh likhane ke liye…