उमेश चतुर्वेदी
सुप्रीम कोर्ट से कहा जा रहा है कि भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण की खुदाई में मिली कुछ मूर्तियों से यह साबित नहीं हो जाता कि जहां रामलला आज हैं, वहां मस्जिद नहीं थी। अठारह साल पहले तक वहां मस्जिद या बाबरी ढांचा होने को कोई नकार भी नहीं सकता। लेकिन इन सवालों को मीडिया में आक्रामक तरजीह नहीं मिल रही है। तो क्या यह मान लिया जाय कि भारतीय मीडिया परिपक्वता की ओर बढ़ता जा रहा है। क्योंकि सांप्रदायिकता विरोध और कथित हिंदुत्ववादी मानसिकता के नाम पर मीडिया ऐसी खबरों को अपने-अपने नजरिए से पेश करता रहा है और जनता की अच्छी और बुरी दोनों तरह की प्रतिक्रियाओं का आनंद उठाता रहा है।
जाहिर है कि एक धारा का मीडिया, दूसरी धारा की सोच रखने वाली जनता की आक्रामक प्रतिक्रिया के बीच अपनी पाठकीयता बढ़ाने की कवायद में जुटा रहा है। दोनों तरफ से कई बार यह खेल पाठकीय सरोकारों को अभिव्यक्ति देने के नाम पर होता रहा है। जहां ऐसी परंपरा रही हो, जहां टीआरपी और पाठकीयता के नाम पर ऐय्यारी, भूत-प्रेत और एलियन की अविश्वसनीय कथाओं को पेश करने में ही भलाई दिखती रही हो, वहां दोनों तरह के नजरिए का अतिवाद नहीं दिखता तो सकारात्मक सवाल उठेंगे ही।
इस सवाल का जवाब तलाशने से पहले हमें इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले पर मुलायम सिंह यादव की प्रतिक्रिया और उस प्रतिक्रिया पर उनके वोटर समझे जाते रहे मुसलिम समाज की आक्रामक प्रतिक्रिया पर गौर किया जाना चाहिए। मुलायम ने फैसले के बारे में कहा कि हाईकोर्ट के फैसले के बाद मुसलमान खुद को ठगा महसूस कर रहा है। अपने इस लिखित बयान में सुप्रीम कोर्ट से अपील करते हुए मुलायम सिंह ने कहा है कि उसे मुसलिम साक्ष्यों की तरफ भी देखना होगा। मुलायम सिंह को इस फैसले की आलोचना करने का आधार और ताकत अयोध्या आंदोलन ने ही दी है। अयोध्या में 1990 में उन्होंने पंचकोशी परिक्रमा नहीं होने दी थी। इसके लिए उन्हें गोली भी चलानी पड़ी थी।
मुलायम के बल प्रयोग से तब बाबरी मस्जिद बच गई थी और इस एक फैसले से मुलायम सिंह यादव मुसलिम समुदाय की नजर में हीरो बन गए थे। उनका यह हीरोवाद ही है कि वह एक बार फिर मुसलमानों के हक का सवाल उठाने से खुद को रोक नहीं पाए। लेकिन अब वही मुसलमान उनके इस बयान को स्वीकार करने को तैयार नहीं है। उसे लगता है कि मुलायम सिंह नाहक ही मामले को तूल दे रहे हैं। जिस तरह घरेलू विवादों को खत्म करने के लिए अकसर हम सब दोषियों को माफ कर देते हैं और जिंदगी की राह पर आगे बढ़ लेते हैं, कुछ इसी अंदाज में अब मुस्लिम समाज भी आगे की ओर देखना चाहता है। जाहिर है कि भारतीय मीडिया भी इस तथ्य को समझने लगा है। उसे पता है कि अगर वह अतिवादी रूख अख्तियार करेगा तो उसका भी हश्र मुलायम सिंह के बयानों जैसा होगा। इसीलिए वह आक्रामक रूख अख्तियार करने से बच रहा है।
लेकिन इसका यह मतलब निकाल लेना कि मीडिया दांवपेंचों की दुनिया से बाहर निकलने लगा है और अपने व्यवसायिक हितों की परवाह नहीं कर रहा है। सच तो यह है कि वर्चुअल मीडिया का विस्तार होने के चलते हालिया दौर की मीडिया की भूमिका पर सवालों की झड़ी लगनी शुरू हो गई थी। हालांकि आलोचनाओं के बढ़ते वितान को लेकर शुरू में मीडिया बेपरवाह रहा। अपनी ताकत ने उसे इस बेपरवाही में खास भूमिका निभाई है। निश्चित तौर पर तब मीडिया लोकतांत्रिक समाज में अपनी सीमाओं को ध्यान में नहीं रख रहा था। इसकी वजह से मीडिया पर सवालों की जैसे झड़ी ही लग गई।
सामाजिक मंचों और शहरी मध्यवर्ग की कॉलोनियों की तो बात छोड़िए, विश्वविद्यालयों में आने वाली नई पीढ़ी तक के सवालों के घेरे में मीडिया की भूमिका आने लगी। हर मंच से होने वाली मीडिया की आलोचना को पहले व्यवसायिक मजबूरियों के नाम पर टाला जाता रहा। इस तरह मीडिया दरअसल जनता और लोकतांत्रिक समाज को भुलावे में रखने की कोशिश में था। उसे लगता था कि जनता उसकी गलतियों को बाद में भूल जाएगी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। शिक्षा के विस्तार और अभिव्यक्ति के लोकतांत्रिक साधन के रूप में सामने आए वर्चुअल स्पेस ने सचेत पीढ़ी को नया हथियार दे दिया है। और यही हथियार सीमित ही सही, मीडिया को लोकतांत्रिक तरीके से सीमित कर रहा है।
1975 में आपातकाल की घोषणा ने भारतीय मीडिया को सचेत करने में अहम भूमिका निभाई थी। उसके बाद ही भारतीय मीडिया का सरोकारी दायरा और तेवर बढ़ना शुरू हुआ था। अयोध्या आंदोलन ने अतिवादी पत्रकारिता की वजह बना। 1977 का जनता आंदोलन रहा हो या फिर 1990 का अयोध्या आंदोलन, अगर मीडिया में तेवर युग या अतिवादी दौर की शुरूआत हुई तो उसके पीछे जनता की तब की सोच भी थी। 1977 में जनता को तेवर पसंद आ रहा था। 1990 में एक हद तक उसे अयोध्या का पक्ष या विपक्ष पसंद था। लेकिन अब उसी जनता को अयोध्या का पक्ष या विपक्ष पसंद नहीं है। ऐसे में मीडिया अतिवादी भूमिका निभाने की कोशिश करेगा तो वह मुलायम की ही तरह अप्रासंगिक साबित हो सकता है। मीडिया यह समझ रहा है, इसीलिए वह परिपक्वता का परिचय दे रहा है।
लेखक उमेश चतुर्वेदी वरिष्ठ पत्रकार और स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं.












Rajnish Agrawal
October 27, 2010 at 5:14 pm
Babari mudda itne salo se chal rha hai or logo ne isme bhut kuch khoya hai. isliye na hindu ko na hi musalman ko isme interst hai. vote bank walo ke liye spl mudda hai.
Sabse badi Bat- Hindausatan ka nagrik samjhadar ho gaya hai ki Fasale ke bad desh me kahi ko ghatna nahi hui. shayad isme media ko role ho sakta hai.