इस हैबते-हालात पे कुछ गौर कीजिये, अब भी तो खौफ छोड़िये आवाज़ दीजिये, ग़म नहीं गुस्से की सदा बनके यशवंत जी, खामोशियों को तोडिये, आवाज़ दीजिये… प्रिय यशवंत जी, नमस्कार, आप तो जानते ही हैं कि अफसर लोग कुत्ता पालते हैं. कुछ अफसर लोग मिंटू, पिंटू, छोटू, बहादुर भी पालते हैं. ये सभी तुच्छ जीव अपने अपने पूर्व-जन्मों के कर्मानुसार फल भोगते हैं…
और इसी कारण ये मिंटू कमिश्नर, डीएम, एडीएम, तहसीलदार… आदि-आदि महान जीवों के यहाँ पलते रहते हैं. कुत्तों में और इनमें गज़ब की समानताएं हैं. कुत्ता साहब का दिया खाता है, निकालता है और दुम हिलाता है. मिंटू भी साहब का दिया खाता है निकालता है और दुम हिलाता है. मिंटू के पास प्राकृतिक दुम होती नहीं, पर मान लिया गया है कि होती है और वो हिलाता भी है. मिंटू पालने का फायदा ये भी है कि वो साहब के घर का काम करेगा, साफ़ सफाई करेगा. साहब को एहसास कराएगा कि वो साहब हैं और साहब की लुगाई का अन्य अफसरों की लुगाइयों के बीच मान बढ़ाएगा.
हमारे बरेली शहर के सीएम साहब, मतलब सिटी मजिस्ट्रेट, श्री मनोज कुमार, के यहाँ भी एक मिंटू था. सीएम साहब उसे 13 सालों से पाल रहे थे. मिंटू अब 22 वर्ष का हो गया था. उसकी अकल-दाढ़ भी निकलने लगी थी. कभी कभी वो समझदारीपूर्ण बात भी कर लिया करता था. जैसे के पगार कम है मैं काम छोड़ना चाहता हूँ आदि-आदि. पर जब-जब मिंटू ऐसी बातें करता मजिस्टरानी उसे प्यार से समझा देतीं- नहीं बेटा ऐसी बात नहीं करते, ऐसा करने से पाप लगता है, महीने की पगार बंद हो जाया करती है और कभी कभी लाखों की चोरी का आरोप भी लग जाता है.
मिंटू प्यार से समझाने पे समझ जाता था. पर 26 मई को पगले के दिमाग में न जाने क्या आया के उसने कैडबरी के बजाये सल्फास खा ली. मिंटू चला गया. सीएम साहब के यहाँ तो बिजनौर से आया था पर अब पता नहीं कहाँ चला गया है. शरीर यहीं छोड़ गया था जो कि अस्पताल, पोस्टमॉर्टम हाउस होते हुए पुनः बिजनौर जाके मिट्टी में मिल गया. मिंटू के इस तरह चले जाने का सबको दुःख हुआ. बरेली प्रशासन सबसे ज्यादा दुखी हुआ. प्रशासन मिंटू के शरीर के साथ ही साथ लगा रहा. बड़ा भारी समय था. पर मिंटू मारा नहीं, मिंटू मरते नहीं. भरमार है हमारे देश में.
मेरे यहाँ हिंदुस्तान समाचारपत्र आता है. 26 मई को मैंने पहले पन्ने पर मिंटू के चले जाने की खबर पढ़ी. साथ ही उसमें ये भी जिक्र था कि हिंदुस्तान अखबार के पास मिंटू का मृत्यु पूर्व दिया हुआ बयान है. खबर बड़ी थी. छठे पन्ने पर भी थी. हमें लगा कि अब काम लगा मजिस्ट्रेट और मजिस्टरानी का. हिन्दुस्तान ने यहाँ पक्षियों को गर्मी में पानी पिला के उन्हें बचने की मुहीम चलाई हुई है. जो समाचार पत्र पक्षियों के लिए इतना कर सकता है, वो मिंटू के लिए क्या कुछ नहीं करेगा. करेगा बिलकुल करेगा. इस विश्वास के साथ मैं सो गया. 27 तारीख को देखा तो मिंटू का संक्षिप्तीकरण हो गया है, फिर 28 …… और फिर 29 को तो मिंटू हिंदुस्तान अखबार से गायब हो गया.
मामला गरमा रहा था. मजिस्ट्रेट साहब का दुःख प्रशासन का दुःख. प्रशासन का दुःख समाचार पत्र का दुःख. स्थानीय सम्पादक आशीष व्यास और ज्यादा दुखी. क्या करें क्या न करें. वो मृत्यु-पूर्व बयान की क्लिपिंग उन्हें अन्दर तक कचोट रही थी. व्यास जी ने परलोक नंबर लगाया, अपने उपनाम का हवाला दे जुगाड़ लगायी. बात बन गयी, कॉल चित्रगुप्त को ट्रान्सफर हुई. चित्रगुप्त ने पूरी बात ध्यान से सुनी, फिर अपना रजिस्टर देख के बताया के मिंटू को तो जन्म 27 को ही मिल गया. अब 29 को मिंटू की क्या खबर लगाना. संपादक जी के दिल से बड़ा भारी बोझ उतर गया. अन्दर खाने में मिंटू के जन्म की बात जैसे ही फैली हर्ष की लहर दौड़ गयी. मजिस्ट्रेट खुश, मजिस्टरानी खुश, प्रशासन खुश सब खुश. मिंटू के तुच्छ जीव ने चोला बदल लिया, अब किसी को पाप नहीं लगेगा. जब पाप धुल गया तो फिर कोर्ट-कचेहरी का क्या काम.
उसी रात मजिस्टरानी मजिस्ट्रेट साहब से लजाते हुए बोलीं सुनो अब हमसे काम नहीं होता, एक मिंटू और पाल लीजिये. मजिस्ट्रेट साहब मुस्कुराए, बोले- पाल लेंगे पर कुछ दिन तो सबर करो, और फिर साहब सो गए.
पर साहब कहानी यहीं ख़तम नहीं होती. यशवंत जी, मैं हिंदुस्तान की कटिंग्स भेज रहा हूँ. वो मिंटू के बयान की क्लिपिंग सहाफियों के मोबाइल में चक्कर लगा रही है. भड़ास के माध्यम से मैं हिंदुस्तान के संपादक आशीष व्यास जी से अनुरोध करता हूँ के वो उक्त बयान की ट्रांसक्रिप्ट जारी करें अथवा उसे इन्टरनेट पे अपलोड करें. अगर मिंटू के मृत्यु-पूर्व बयान में सत्यता है तो मजिस्टरानी को सजा मिलनी चाहिए जैसे व्यास जी बरेली में पक्षियों को बचाने के लिए कुंडे बंटवा रहे है वैसे ही न्याय को बचाने के लिया वो उक्त बयान की क्लिपिंग भी बंटवाएं . यशवंत जी मेरी आपसे भी विनती है के आप इस मामले में जो भी संभव हो करें.
सादर
आम आदमी
भड़ास4मीडिया के पास प्रेषित एक मेल पर आधारित. घटनाक्रम की छानबीन भड़ास ने कर ली है. प्रकरण बिलकुल सत्य है. हिंदुस्तान अखबार समेत बरेली के सभी अखबारों और मीडियाकर्मियों को मिंटू की मौत का हिसाब मांगना चाहिए और दोषियों को दंड दिलाने का प्रयास करना चाहिए. याद रखें, आज अगर किसी गरीब की मौत पर हम चुप हैं तो कल आपकी मौत पर कोई रोने वाला नहीं होगा. आखिर किस बात के लिए हम मीडियाकर्मियों ने कलम को अपना हथियार माना है. पत्रकारिता दिवस पर बरेली के सभी पत्रकारों से अपील है कि वे मिंटू की मौत पर जरूर अपने यहां बात करें, लिखें और अगर कहीं न छपे तो हकीकत भड़ास4मीडिया के पास भेजें, [email protected] पर मेल करें. -एडिटर, भड़ास4मीडिया












sushil kumar. bareilly
May 30, 2011 at 3:27 pm
यशवंत जी चिडियों के बारे में छापना और बात है और इंसान की मौत के बारे में और, और वो भी जब मामला सिटी मजिस्ट्रेट का हो तो.. आजकल यही पत्रकारिता हो रही है..
b.manohar
May 30, 2011 at 4:25 pm
yashwant jee aap hi pehal kar ligiye mai aap ko mintoo ki mout se thode samay pehle ki byte uplabhdh kara dunga ….. dusari bat yeh hai kai channelon ne minto ki mout ka vishesh dikhaya hai, jisme jansandesh ki peshkash sabse khas rahi hi to sabse pehle aap jansandesh channel se byte mang le…..
b.manohar
09359139815,
gagan
May 30, 2011 at 4:47 pm
is k C.M. Ki wife ke saath avaidh sanbandh the, yh baat koi nhin chhap rha, jab ki sab ko pta hai
आम
May 30, 2011 at 6:12 pm
पूरा अमला इसी जद्दोजहद में लगा रहा… डाक्टर ने भी बता दिया कि मिन्टू बयान देने की हालत में नहीं है. अब ये पत्रकार कहां से उडा लाये बेचारे साहब को परेशान करने के लिये बेसिरपैर की…