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बाल रिपोर्टर लिख रहे हैं बदलाव की नई इबारत

दुर्ग, छत्‍तीसगढ़।  जब 16 साल की पौशा मधारिया बोलती है तो वह छत्तीसगढ़ के हर बच्चे के लिये उम्मीदों, सपनों एवं भय की आवाज बन जाती है। छत्‍तीसगढ विधान सभा के समक्ष खड़ी पौशा मधारिया बाल श्रम, कम उम्र की लड़कियों के साथ होने वाले भेदभाव और अनेक लड़कियों द्वारा स्कूल जाने के रास्ते में आने वाली दिक्कतों को लेकर अपनी चिंतायें जाहिर करती है।

दुर्ग, छत्‍तीसगढ़।  जब 16 साल की पौशा मधारिया बोलती है तो वह छत्तीसगढ़ के हर बच्चे के लिये उम्मीदों, सपनों एवं भय की आवाज बन जाती है। छत्‍तीसगढ विधान सभा के समक्ष खड़ी पौशा मधारिया बाल श्रम, कम उम्र की लड़कियों के साथ होने वाले भेदभाव और अनेक लड़कियों द्वारा स्कूल जाने के रास्ते में आने वाली दिक्कतों को लेकर अपनी चिंतायें जाहिर करती है।

पौशा बिना किसी झिझक के विधायकों से कहती है कि उसके पास के एक गांव मुरमुंडा में शराब की एक दुकान के बाहर शराबी लोग नशे में धुत होकर झूमते रहते हैं और वहां से गुरजने वाले बच्चों को धमकाते रहते हैं। वह कहती है,  ”मैंने शराब पीने वाले लोगों से कहा कि वे स्कूल जाने वाले बच्चों के लिये बाधा पैदा कर रहे हैं।”  वह याद करते हुये कहती है,  ” मैंने कहा कि इस दुकान को सार्वजनिक जगह से हटा कर कहीं और ले जाया जाये।”

उसने इस मामले पर हाल में शुरू हुये ”बाल स्वराज”  नामक समाचार पत्र में भी लिखा है। यह समाचार पत्र यूनिसेफ की चाइल्ड रिपोर्टर्स इंसिएटिव के तहत राज्य में 2007 से निकलना शुरू हुआ और यह महीना में दो बार प्रकाशित होता है। शराब की दुकान चलाने वाले मिथलेश पाण्डे का कहना है कि बच्चों की चिंताओं के प्रति वह अब अधिक संवेदनशील हो गया है। पाण्डे कहता है,  ”मैं यहां अपनी नौकरी कर रहा हूं। लेकिन समाचार पत्र में रिपार्ट पढ़ने के बाद मैं बच्चों की भी मदद कर रहा हूं।” वह कहता है। हाल में उसने सड़क पर गिरे एक आदमी को उठाया।

संयुक्त राष्‍ट्र बाल अधिकार प्रस्ताव के अनुच्छेद 12 के अनुपालन के प्रयास के तौर पर चाइल्ड रिपोर्टस इनिशिएटिव के तहत बाल कार्यकर्ताओं की भर्ती की जाती है और उन्हें प्रशिक्षण दिया जाता है। यह बच्चों को निर्भीक होकर बोलने और अपनी चिंताओं को उजागर करने का अधिकार देता है। छत्तीसगढ़ के एक बड़े क्षेत्र में हिंसक राजनीतिक उपद्रव हुये हैं, जिसके कारण बच्चों एवं उनके परिवारों के लिये सामाजिक सुविधाओं को हासिल करना अधिक मुश्किल हुआ है। मायाराम सुरजन फाउंडेशन नामक गैर सरकारी संगठन की सहायता से पौशा जैसे करीब 1,200 बाल रिपोर्टर उन्हें, उनके परिवारों एवं राज्य में विभिन्न समुदायों को प्रभावित करने वाले मुददों के बारे में लिख रहे हैं।

गंभीर मुददों को उजागर करना :  एक अन्य बाल रिपोर्टर 16 वर्षीय पूजा देवांगन की मदद से पौशा ने गांव में मरीजों का इलाज डाक्टरों से कराने के बजाय झाड़-फूंक करने वालों से कराने की प्रथा पर काबू पाने में सफलता पायी। वे कहते हैं, ”सही इलाज नहीं मिलने के कारण एक बच्चे की मौत हो गयी।” उसने हाल में एक त्यौहार के मौके पर अपने घर के बाहर अत्यंत मनोरम रंगोली बनायी। उसने झाड़-फूंक पर लिखे गये लेख के साथ प्रकाशित हुये एक कार्टून की डिजाइन बनाने में मदद की। इस कार्टून में दिखाया गया है कि बड़े-बड़े बालों वाला एक साधु एक मरीज के सिर पर झाडू फेर रहा है तथा एक दूसरे को काटने वाली दो हडिडयों के बीच एक कपाल इस खतरे से लोगों को आगाह कर रहा है।

स्वराज के एक नवीनतम अंक में पोलियो से ग्रस्त एक बच्ची के कष्‍ट, तंबाकू खाने के खतरों, होटलों में एवं बढ़ई के रूप में गैर कानूनी तौर पर काम करने वाले बच्चों तथा उन्हें स्कूल जाने से रोकने वाली गरीबी के बारे में भी लेख छापे गये हैं। मुमुंडा के सरकारी माध्यमिक स्कूल में छह बच्चे अपने लेख नियमित तौर पर अखबार को देते हैं। चैदह साल के उमा शंकर जोशी ने उस बच्चे के बारे में लिखा है जो बिना ढके एक कुएं में गिर गया और वह डूबते-डूबते बचा। एक गर्मी भरी दोपहरी में देवरथ चंडेल नामक बच्चा कुएं के पास अपने दोस्तों के साथ नहाता है। खेल-कूद के दौरान वह अपना संतुलन खो देता है और कुएं के पानी में गिर जाता है। उसके दोस्त लाकेश लाहरे और अन्य बच्चे एक मानव श्रृंखला बनाते हुये उस बच्चे को बाहर निकाल लेते हैं।

उमा शंकर का लेख प्रकाशित होने के बाद गांव के सरपंच ने उसका लेख पढ़ा और एक निर्जन घर के बाहर खुदे उस कुएं को मिट्टी से भरवाने की व्यवस्था की। उमा शंकर कहता है, ”मैं बहुत अच्छा महसूस कर रहा हूं। मैं बच्चों की मदद करने के लिये इस तरह का काम कर रहा हूं।” उसके माता-पिता निरक्षर मजदूर हैं। उसे अपने बेटे पर गर्व है। वह कहता है, ”मेरे माता-पिता कहते हैं कि यह अच्छा काम मैं करता रहूं।”

द टीन ने गांव के त्यौहार में रस्सी पर चलने का करतब दिखाने वाले पांच साल के एक बच्चे के बारे में भी लिखा है। द टीन ने लिखा है, ”हर रात वह एक धूल भरे चैराहे पर अपना अत्यंत खतरनाक करतब दिखाने के लिये अपने लिये यह खतरा मोल लेता है।” द टीन लिखता है, ”यह खतरनाक काम है और बाल श्रम की अनुमति नहीं है।”

परिवर्तन के दूत :  हर बाल रिपोर्टर को एक आधिकारिक प्रेस पास जारी किया गया है जिसे वे अपनी रिपोर्ट लिखने के लिये संबंधित लोगों को दिखा सकते हैं। चैदह साल की सुमन जोशी जब एक लेख लिखने के लिये शोध के लिये लोक निर्माण विभाग जाती है तब अपना प्रेस पास दिखाती है। उसे स्कूल के पास की नहर में बाढ़ के बारे में लिखना था।

सुमन कहती है, ”लोग समझते हैं कि हम यहां परिवर्तन लाने की कोशिश कर रहे हैं।”  वह कहती है, ”वे हमारी रिपोर्टों से प्रभावित होते हैं!”  स्कूल के हेडमास्टर हेमराज साहू कहते हैं, ”वह नियमित तौर पर बच्चों के अखबार को पढ़ते हैं और वह इस तरह से अपने समुदाय के बारे में बहुत कुछ जानकारी पाते हैं।” साहू कहते हैं, ”ये छात्र समस्याओं को उजागर करते हैं और वे उस हौसले को दिखा रहे हैं जिसे ज्यादातर बड़े लोग नहीं दिखा पाते।”

यह लेख फर्स्ट न्यूज लाइव डाट काम से साभार लेकर प्रकाशित किया गया है.

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0 Comments

  1. rajat

    June 14, 2011 at 5:10 pm

    bahut badhiya. kaash hamara muddo se bhatakta media bhi in bacho se kuch seekh paata.

  2. krishnakuamrpandey

    June 16, 2011 at 10:16 am

    it is best for the future i like it

  3. sudhanshu gupta

    June 17, 2011 at 3:57 pm

    so called bade akhbaron ke bade logon ko inse kuch sikhana chahiye.
    sudhanshu

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