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बिजेंद्र यादव को शहीद नहीं कर पाओगे!

नूतन तो क्या सिपाही बिजेंद्र यादव शहीद हो गए हैं? जैसी कि मुझे पहले से भी उम्मीद थी, उत्तर प्रदेश के इस वीर और साहसी सिपाही को बहादुरी और जज्बे के साथ अपनी बात कहने की सजा झेलनी पड़ी है. अभी कुछ दिनों पहले ही हम लोगों ने बिजेंद्र यादव के बारे में यह जाना था कि उन्होंने उत्तर प्रदेश के अधीनस्थ पुलिस वालों के हितों के रक्षार्थ एक एसोशिएशन बनाया है, जिसकी जरूरत हम सभी लोग खुद ही एक लंबे समय से महसूस कर रहे हैं.

नूतन तो क्या सिपाही बिजेंद्र यादव शहीद हो गए हैं? जैसी कि मुझे पहले से भी उम्मीद थी, उत्तर प्रदेश के इस वीर और साहसी सिपाही को बहादुरी और जज्बे के साथ अपनी बात कहने की सजा झेलनी पड़ी है. अभी कुछ दिनों पहले ही हम लोगों ने बिजेंद्र यादव के बारे में यह जाना था कि उन्होंने उत्तर प्रदेश के अधीनस्थ पुलिस वालों के हितों के रक्षार्थ एक एसोशिएशन बनाया है, जिसकी जरूरत हम सभी लोग खुद ही एक लंबे समय से महसूस कर रहे हैं.

खुद एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी की पत्नी हूँ, पर ह्रदय से यह मानती हूँ कि उत्तर प्रदेश (और शायद देश भर) में पुलिस के नीचे तबके के कर्मचारियों के साथ आज भी वैसा ही व्यवहार होता है जैसा शायद अंग्रेजों के समय भी नहीं होता हो. आज तो उनकी दशा उस समय से भी बदतर है. उस समय तो कम से कम जनता में उनकी धमक थी. आज एक तरफ नेताजी लोग उनको सड़कों पर सरेआम उनकी औकात दिखा रहे हैं और दूसरी तरफ खुद उन्हीं के विभाग के वरिष्ठ अधिकारी, जो नेताओं और अपने विभाग के ऊपर के हाकिमों की जी हुजूरी और गुलामी करते नहीं थकते, इन नीचे के अधिकारियों के साथ ऐसा व्यवहार करते रहें कि देख के शर्म सी आ जाती है कि ये लोग पढ़े-लिखे लोग हैं या अनपढ़-जाहिल. उससे दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि खुद अफसर तो अफसर, उनकी बीवी-बच्चे भी इसी प्रकार का आचरण करते हैं मानो ये लोग सरकार के नहीं, उनके घर के नौकर हों.

मैं कई जगहों पर पुलिस अधीक्षक बंगलों में रही. शुरू में देखती थी कि जो भी सिपाही या फालोवर घर में रहते, वे इस तरह से डरे-सहमे से दिखते मानो उन लोगों ने भूत देख रखा हो. एकदम

बृजेंद्र सिंह यादव

ब्रिजेंद्र सिंह यादव

सिहरे हुए से बात करते, काफी घबराये से रहते. मुझे ये सब बड़ा अटपटा सा लगता. और मेरे पति तो इस मामले में और भी फक्कड़ और अलमस्त मिजाज रहे हैं. उन्होंने जीवन में और जो भी सही या गलत किया हो, पर एक चीज़ तो मैं दावे से कह सकती हूँ कि उन्होंने किसी सिपाही, दारोगा या इन्स्पेक्टर को नीचा दिखाने, उन्हें भला-बुरा कहने या उनके साथ अमानवीय एवं निंदनीय आचरण करने का काम कभी नहीं किया है.

इसके विपरीत मैं ऐसी कई कहानियाँ अधिकारी और उनकी पत्नी के नाम सहित जानती हूँ जिसमें उन लोगों ने सिपाही, दरोगा या फालोवर को गाली-गलौज करने, दुर्व्यवहार करने, प्रताडि़त करने, घंटों धूप में खड़ा कर देने जैसे कार्य कई-कई बार किये हैं. इन लोगों की छुट्टियों की समस्या पुलिस विभाग में भयानक रूप से है, जहां कई बार तो अपने बहुत ही निकट सगे-सम्बन्धी की मौत और दुर्घटना तक में छुट्टी नहीं मिल पाती. सरकारी काम-काज की परेशानी, आवास की असुविधा जैसी न जाने कितनी ही समस्याएं हैं जिनसे ये अधीनस्थ पुलिस वाले रोज-रोज रूबरू हो रहे हैं, पर इनके ऊपर के अधिकारी जानबूझ कर अनजान बने हुए हैं.

ऐसे में यदि कोई बिजेंद्र यादव सामने आ कर पुलिस वालों की इन समस्याओं को कम करने की कोशिश करता है तो मेरी निगाह में तो वह बहुत ही पुनीत और आवश्यक कार्य कर रहा है. साथ ही यदि वह पुलिस में आईपीएस अफसरों द्वारा एक लंबे समय से किये जा रहे एक कथित भ्रष्टाचार को सामने लाता है, तो हम सबों को उनकी तारीफ़ करनी चाहिए थी, शाबाशी देनी चाहिए थी. पर हुआ तो बिलकुल उल्टा ही. पुलिस अधीक्षक गाजीपुर के आदेश से बिजेंद्र यादव निलंबित कर दिए गए हैं. आईये सबसे पहले हम ये देखें कि उन्हें किस नियम के तहत और क्या कहते हुए निलंबित किया गया है.

बिजेंद्र यादव का निलंबन आदेश कहता है- “आरक्षी को दिनांक 06/09/2010 को पुलिस लाइन से थाना जमनिया स्थानांतरित किया गया तो थाने पर आने के उपरांत कार्य सरकार में रूचि ना लेकर राजकीय हित से अलग अनावश्यक कार्यों में लिप्त रह कर एवं मीडिया में बिना अनुमति बयान प्रकाशित करने के फलस्वरूप, इसके इस कृत्य से पुलिस विभाग में अनुशासनहीनता एवं पुलिस बल की छवि जनता में धूमिल होने के कारण.”

वैसे उत्तर प्रदेश में सिपाही से इन्स्पेक्टर तक का निलंबन उत्तर प्रदेश अधिनस्थ श्रेणी के पुलिस अधिकारियों और कर्मचारियों की आचरण एवं अपील नियमावली 1991 के नियम 17(1) (क) के अंतर्गत होता है. लेकिन बिजेंद्र यादव के आदेश में इस नियम या किसी भी नियम का उल्लेख किये बिना ही उन्हें निलंबित कर दिया गया है. साथ ही यह बात ही महत्वपूर्ण है कि जो उनके राजकीय हित से अलग अनावश्यक कार्यों में लिप्त रहने की बात कही गयी है, वह भी बिना किसी प्रमाण के मनगढंत तथ्यों पर ही आधारित दिखती हैं. या हो सकता है कि बिजेंद्र यादव द्वारा अधीनस्थ कर्मचारियों के कल्याण की बात सोचने को अनावश्यक कार्य मान लिया गया हो.

हम लोगों के लिए यह भी महत्वपूर्ण है कि उनपर जो एक आरोप लगा है वह हम मीडिया वालों से बातचीत करने और हमारे सामने बयानबाजी करने का भी है. यानी कि उन्होंने जो सच्चाई सामने लाने की कोशिश की है, वह अधिकारियों की निगाहों में अनावश्यक बयानबाजी है और जो अब तक संभवतः गड़बडि़यां हो रही थीं, जिन्हें बिजेंद्र यादव ने उजागर करने की कोशिश की है, वह ऐसे आवश्यक कार्य थे जिनसे पुलिस बल की छवि चमक रही थी. बिजेंद्र यादव से साक्षात्कार लेने वालों में एक मैं भी थी और मुझे इस बात का गर्व है. हाँ, एक बार मन में कसक जरूर होता है कि शायद उनका तात्कालिक नुकसान कराने में मेरी भी कुछ भूमिका हो. लेकिन मैं जानती हूँ कि सच की लड़ाई में ये कठिनाईयां आती ही हैं. मुझे प्राप्त जानकारी के अनुसार उनका मामला इलाहाबाद के एक सक्षम और समर्पित अधिवक्ता अपने हाथ में ले चुके हैं और शीघ्र ही वे इलाहाबाद हाई कोर्ट में इस सम्बन्ध में निशुल्क रिट दायर करने वाले हैं. मैं ऐसे अधिवक्ता को भी सलाम करती हूँ. मुझे विश्वास है इस लड़ाई में बिजेंद्र यादव की ही फतह होगी.

डॉ नूतन ठाकुर

संपादक

पीपल’स फोरम, लखनऊ

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0 Comments

  1. Amit Singh Virat

    January 2, 2011 at 10:10 am

    Jai Hind Bijendra ji
    Aur aapka bahut-bahut dhanyavaad nootan ji ki aapne bijendra ki aawaz ko mazbooti pradan ki.

  2. savji chaudhari

    January 2, 2011 at 6:55 am

    डॉ. नूतन ठाकुर जी को…
    और बिजेंद्र यादव जी को लाखों सलाम.
    जीत सच की होगी.

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