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भला हुआ मेरी मटकी फूटी..

: ज़िन्दगी से छूटने की ख़ुशी मना रहे हैं कबीर… : साथ हैं गुलज़ार और आबिदा परवीन :

: ज़िन्दगी से छूटने की ख़ुशी मना रहे हैं कबीर… : साथ हैं गुलज़ार और आबिदा परवीन :

सूफ़ियों-संतों के यहां मौत का तसव्वुर बडे खूबसूरत रूप लेता है… कभी नैहर छूट जाता है, कभी चोला बदल लेता है.. जो मरता है ऊंचा ही उठता है, तरह तरह से अंत-आनन्द की बात करते हैं… कबीर के यहां, ये खयाल कुछ और करवटें भी लेता है, एक बे-तकल्लुफ़ी है मौत से, जो जिन्दगी से कहीं भी नहीं…

माटी कहे कुम्हार से, तू क्या रौंदे मोहे ।
एक दिन ऐसा आयेगा, मैं रौंदूंगी तोहे ॥

माटी का शरीर, माटी का बर्तन, नेकी कर भला कर, भर बरतन में पाप पुण्य और सर पे ले… आइये हम भी साथ-साथ गुनगुनाएँ… “भला हुआ मेरी मटकी फूटी रे”..

…नीचे दिए गए आडियो प्लेयर पर क्लिक करें… साउंड फुल कर लें….

  • भला हुआ मेरी मटकी फूटी..

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भला हुआ मेरी मटकी फूटी रे ।
मैं तो पनिया भरन से छूटी रे ॥

बुरा जो देखन मैं चला, बुरा ना मिलिया कोय ।
जो दिल खोजा आपणा, तो मुझसा बुरा ना कोय ॥

ये तो घर है प्रेम का, खाला का घर नांहि ।
सीस उतारे भुँई धरे, तब बैठे घर मांहि ॥

हमन है इश्क़ मस्ताना, हमन को हुशारी क्या ।
रहे आज़ाद या जग से, हमन दुनिया से यारी क्या ॥

कहना था सो कह दिया, अब कछु कहा ना जाये ।
एक गया सो जा रहा, दरिया लहर समाये ॥

लाली मेरे लाल की, जित देखूं तित लाल ।
लाली देखन मैं गयी, मैं भी हो गयी लाल ॥

हँस हँस कुन्त ना पाया, जिन पाया तिन रोये ।
हाँसि खेले पिया मिले, कौन सुहागन होये ॥

जाको राखे साईंयाँ, मार सके ना कोये ।
बाल न बांकाँ कर सके, जो जग बैरी होये ॥

प्रेम न भाजी उपजै, प्रेम न हाट बिकाय ।
राजा-प्रजा जोही रूचें, शीश देई ले जाय ॥

कबीरा भाठी कलाल की, बहूतक बैठे आई ।
सिर सौंपें सोई पीवै, नहीं तो पिया ना जाये ॥

सुखिया सब संसार है, खाये और सोये ।
दुखिया दास कबीर है, जागे और रोये ॥२६१॥

जो कछु सो तुम किया, मैं कछु किया नांहि ।
कहां कहीं जो मैं किया, तुम ही थे मुझ मांहि ॥

अन-राते सुख सोवणा, राते नींद ना आये ।
ज्यूं जल छूटे माछरी, तडफत नैन बहाये ॥

जिनको साँई रंग दिया, कभी ना होये कुरंग ।
दिन दिन वाणी आफ़री, चढे सवाया रंग ॥

ऊंचे पानी ना टिके, नीचे ही ठहराय ।
नीचे होये सो भरि पिये, ऊँचा प्यासा जाय ॥

आठ पहर चौंसठ घडी, मेरे और ना कोये ।
नैना मांहि तू बसे, नींद को ठौर ना होये ॥

सब रगे तान्त रबाब, तन्त दिल बजावे नित ।
आवे न कोइ सुन सके, के साँई के चित ॥

कबीरा बैद्य बुलाया, पकड के देखी बांहि ।
बैद्य न वेधन जानी, फिर भी करे जे मांहि ॥

यार बुलावे भाव सूं, मोपे गया ना जाय ।
दुल्हन मैली पियु उजला, लाग सकूं ना पाय ॥


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