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भूषण पिता पुत्र पर चुप क्यों हैं सिविल सोसायटी के लोग

डा. नूतन ठाकुरकल मैंने समाचारों में देखा था कि प्रसिद्ध पत्रकार और भ्रष्टाचार-विरोधी कार्यकर्ता विनीत नारायण ने यह मांग रखी थी जब तक प्रशांत भूषण और उनके पिता शांति भूषण के खिलाफ जो गंभीर आरोप लगाए गए हैं, उनकी जांच हो कर उसका दूध का दूध, पानी का पानी नहीं हो जाता तब तक इन दोनों पिता-पुत्र को भ्रष्टाचार-विरोध के लिए बनने वाले लोकपाल बिल की ड्राफ्टिंग कमिटी से अलग रहना चाहिए.

डा. नूतन ठाकुरकल मैंने समाचारों में देखा था कि प्रसिद्ध पत्रकार और भ्रष्टाचार-विरोधी कार्यकर्ता विनीत नारायण ने यह मांग रखी थी जब तक प्रशांत भूषण और उनके पिता शांति भूषण के खिलाफ जो गंभीर आरोप लगाए गए हैं, उनकी जांच हो कर उसका दूध का दूध, पानी का पानी नहीं हो जाता तब तक इन दोनों पिता-पुत्र को भ्रष्टाचार-विरोध के लिए बनने वाले लोकपाल बिल की ड्राफ्टिंग कमिटी से अलग रहना चाहिए.

विनीत नारायण ने इसके साथ ही इन पिता-पुत्र के साथ जैन हवाला कांड के दौरान के कुछ कटु अनुभवों को भी बताया जिसके आधार पर उन्होंने एक तरह से शांति भूषण और प्रशांत भूषण पर व्यक्तिगत आक्षेप ही लगाए.इसके ठीक बाद दिल्ली के सुप्रीम कोर्ट के ही एक अन्य वकील एमएल शर्मा ने कुछ और वकीलों के साथ मिल कर उस सरकारी गजट को ही चुनौती दे डाली जिस में लोकपाल बिल के लिए ड्राफ्टिंग कमिटी बनाए जाने की बात कही गयी थी और जिसमें ‘अन्ना हजारे के पांच नुमाइंदे’  शब्द का इस्तेमाल हुआ था. अखबारों की जानकारी के अनुसार इस रिट में लगभग वही बातें कही गयीं हैं जो मैंने भी यहाँ भड़ास पर ”कमेटी में होंगे अन्‍ना हजारे के पांच नुमाइंदे”  लेख में कहा था. कुल मिला कर उनका यह तर्क है कि यह एक असंवैधानिक स्थिति है जिसे तत्काल समाप्त किया जाना चाहिए.

इसी बीच कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने अन्ना हजारे की टीम के भूषण द्वय तथा अरविन्द केजरीवाल को आरोपित किया और फिर हमेशा की तरह शुरू हो गया -‘खुला खेल फर्रुखाबादी’ यानी कौन किसे, किस तरह से आरोपित कर रहा है, यह बात किसी की भी समझ में नहीं आ रहा है. उस लोकपाल विधेयक को लेकर जो प्रारंभिक उत्साह का सृजन हुआ था वह अब धीरे-धीरे अजीब शक्ल अख्तियार करने लगा है.

लेकिन एक बात जो सबसे अधिक गंभीर है, वह है इस मामले में कथित सिविल सोसायटी के बड़े लोगों की भूमिका और उनकी चुप्पी. मैं अपने व्यक्तिगत अनुभव से जानती हूँ कि ये सिविल सोसायटी वाले किसी भी मुद्दे पर कितनी तेजी से लपकते हैं और उस पर किस तरह की तीखी प्रतिक्रियाएं करते हैं. इस बार भी देखिये, जब उमा भारती और कुछ और नेता अपना लाव-लश्कर ले कर जंतर-मंतर पहुंचे थे तो किस तरह सिविल सोसायटी वाले ये सेलिब्रिटी एक्टिविस्ट उन नेताओं के खिलाफ लामबंद हो गए और विरोधी नारे लगाने लगे क्योंकि उनकी निगाहों में ‘नेता भ्रष्ट होते हैं.’

ज्ञातव्य हो कि अभी तक उमा भारती किसी भ्रष्टाचार के मामले में आरोपित या सजायाफ्ता नहीं हुई हैं. लेकिन चूँकि अन्ना हजारे का यह धरना शुचिता के लिए था, एक नूतन सवेरे के लिए था और समाज में नए मानदंड स्थापित करने के लिए था, अतः उसमें ऐसे लोगों की कैसे हिस्सेदारी हो सकती थी जो किसी भी तरह से बदनाम कौम (यानी नेतागिरी) से हों.

खैर, सब ठीक रहा और सरकार ने अन्ना हजारे की बात मान ली. एक ज्वायंट ड्राफ्टिंग कमिटी बनी और उसके सदस्य ‘ अन्ना हजारे के पांच नुमाइंदे (उन्हें लेकर)’  बने. यहाँ तक भी ठीक था. वैसे इस तरह से एक व्यक्ति के नाम पर नुमाइंदगी किया जाना और उसे शासकीय पत्रों में मान्यता दिया जाना ऐतराजपरक था क्योंकि यह भविष्य के लिए खतरनाक रास्ते खोल रहा था पर फिर भी उस मनोस्थिति में लोग इन ‘छोटी-छोटी’  बातों को नज़रअंदाज़ कर रहे थे.

पर गड़बड़ी तक शुरू हो गयी जब अन्ना के समूह के पांच लोगों में दो, पिता-पुत्र शांति भूषण और प्रशांत भूषण पर गंभीर आरोप लगने शुरू हुए. अब तक उन पर जो दो आरोप लगे हैं वे दोनों ही मामूली नहीं हैं. एक आरोप के मुताबिक़ इन लोगों ने इलाहाबाद में लगभग बीस करोड़ की एक जमीन और मकान मात्र एक लाख में ख़रीदा. वैसे ऐसा हर किसी के साथ तो नहीं होता पर खैर, दुनिया में कई तरह के लोग होते ही हैं. संभव है किसी ने सच में ही बीस करोड़ की जमीन एक लाख में दे दी हो.

पर दिक्कत वहाँ है जब यह कहा जा रहा कि इन लोगों ने इस लैंड डील में नियमानुसार एक करोड तैतीस लाख रुपये की स्टैम्प ड्यूटी सरकार को देने की जगह मात्र सैंतालीस हज़ार रुपये ही दिए. इस तरह एक करोड़ से ऊपर का राजस्व का नुकसान इन लोगों द्वारा किये जाने की बात कही जा रही है. मैं नहीं कहती कि यह जो आरोप लगा है वह बिलकुल सही होगा. बहुत संभव है वह गलत हो, पर सबसे बड़ी बात यह है कि भूषण पिता-पुत्र में से किसी ने भी इस आरोप के ऊपर किसी प्रकार की प्रतिक्रया तक नहीं व्यक्त की. यह बात अपने-आप में बहुत गंभीर जरूर है. इतने बड़े वकील हैं, उनके लिए इस लैंड डील में स्थिति स्पष्ट करना कोई बड़ी बात नहीं है. ऐसे में एकदम से चुप हो जाना! कुछ हैरानी सी होती है.

दूसरा आरोप तो और भी गंभीर है. एक सीडी सामने आया है जिसमे मुलायम सिंह यादव, अमर सिंह और शांति भूषण के बीच बातचीत है. छोटी सी बातचीत हुई जिसमे शांति भूषण आगरा से जुड़े एक पीआईएल के लिए ‘मात्र चार करोड़ रुपये’  मांग रहे हैं. वे देश में फैले भ्रष्टाचार के लिए सभी लोगों को कोसते हुए अपने लड़के प्रशांत भूषण की तारीफ़ करते हैं और कहते हैं कि पीआईएल में खर्चा तो आता ही है, जज को भी देना होता है. लिहाजा चार करोड़ की मामूली धनराशि खर्च करनी होगी.

इस सीडी के आने के बाद से हर तरफ कोहराम मचा हुआ है. सभी एक दूसरे को कोस रहे हैं, गरिया रहे हैं. पर यदि यही काम नेतानगरी से होती तो मुझे कोई खास तकलीफ नहीं होती.  पर कष्ट तब होता है जब अपने आप को विशिष्ट बताने वाले ये ‘सिविल सोसायटी’  के लोग भी दोहरे मानदंडों का परिचय देते हैं. अब देखिये, इन आरोपों पर हर कोई चुप है- अरविन्द केजरीवाल भी, किरण बेदी भी, अरुणा रॉय भी, बाकी दूसरे भी. मैं पूछती हूँ कि यदि ये सब मैगसेसे पुरस्कार पाए लोग इस गंभीर आरोप के बारे में चुप हैं तो आम सामाजिक कार्यकर्ता की क्या औकात है.

फिर उससे भी बढ़ कर मैं अन्ना हजारे को कहना चाहूंगी कि यदि वे और कुछ नहीं कह सकते हैं या कर सकते हैं तो कम से कम बिना खुद जांच किये कोई फैसला तो ना दे दें. क्या अन्ना हजारे ने इस मामले में कोई जांच की, क्या अब तक कोई सरकारी जांच हुई? क्या ये दोनों आरोप बहुत गंभीर नहीं हैं? क्या इन आरोपों पर उनको तत्काल निष्पक्ष और त्वरित जांच की बात नहीं कहनी चाहिए थी? क्या उन्हें स्वयं ही इस मामले में जांच तक शांति भूषण और प्रशांत भूषण को ड्राफ्टिंग कमिटी से अलग नहीं कर देना चाहिए था?

मैं एक बार भी नहीं कह रही कि जो दो आरोप इन दोनों पर लगे हैं वह सत्य हैं. संभव हों दोनों गलत हों, बनावटी हों. जानबूझ कर वे मामले किन्ही सोची-समझी रणनीति के तहत सामने लाये गए हों, कोई घृणित साजिश हों. मैं तो कहती हूँ कि ऐसा ही निकले. पर ऐसा होने पर भी यह जरूरी है कि अन्ना हजारे तथा दूसरे सिविल सोसायटी वाले तुरंत सामने आ कर वे बातें कहें जो मैं यहाँ कह रही हूँ. अन्ना हजारे कोई मुख्यमंत्री नहीं हैं और ना ही भूषण द्वय उनके मंत्री कि उनपर आरोप लगने पर तुरंत बचाव की मुद्रा में आ जाएँ. ये लोग एक पवित्र उद्देश्य से एक साथ आये हैं ना कि किसी गिरोहबंदी के लिए. ऐसे में इस तरह से बिना जांच के ही व्यवहार करना और भूषण द्वय को सही बता देना कदापि उचित प्रतीत नहीं होता है.

इन तथ्यों के मद्देनज़र मैं अन्ना हजारे से यह निवेदन करती हूँ कि जनता के समर्थन का मान रखते हुए वे तत्काल इन दोनों आरोपों पर शीघ्र जांच कराने की बात करें, सरकार जल्द से जल्द जांच कर के सच्चाई सामने लाये और तब तक के लिए शांति भूषण और प्रशांत भूषण शुचिता और शालीनता के निगाह से इस अतिसंवेदनशील ड्राफ्टिंग कमिटी से अलग हो जाएँ.

डॉ. नूतन ठाकुर

संपादक,

पीपल’स फोरम, लखनऊ

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0 Comments

  1. waseem ur rehman

    April 20, 2011 at 5:48 am

    ya bat sahi ha ki in 2 logo par aarop lage hain inki janch honi chahiya aaraop sahi ya ghalat hon ya to waqt hi sabit karega. magar ya bhi satty ha ki aaropo ma rajniti ki boo aa rahi ha, ajj desh ka 99% leaders bhirasht han, jo bhi ak bar M.P. YA M.L.A.ban jata ha vo apni kam sa kam 2 pidhiyo ka intazam kar jata ha, ab nahi lagta ki hindustan sa ya bimari khatm hogi . yahan HAMAM me sab NANGAE hain. koi bhi parti apne ko doodh ka dulah nahi kah sakti. waseem ur rehman seohara bijnor up MOBILE NO9259298273

  2. Anil Saxena

    April 20, 2011 at 8:30 am

    डॉ. नूतन ठाकुर के लेख में मौजूदा हालात को देखने की अपरिपक्वता झलकती है. मैं यह नहीं कहता कि भूषण द्वय कोई बहुत बड़े सत्यवादी हैं लेकिन सत्य के इस यज्ञ क़ी तैयारी में कोई जुटा है तो फिलहाल उसकी जेबों को न टटोलें. राक्षसों क़ी बस्ती में राम को ढूँढकर लाना बेमानी होगा. मेरा आशय है कि आज के शातिर राजनीतिबाजों की ताकत और मंशाओं को देखते हुए अन्ना द्वारा जलाई गयी एक आशा की लौ को बुझाने की मुहिम का हिस्सा न बने. कम से कम यह तो देखिये कि यह गंदे आरोप लगाने वाला शख्स कौन है. वह आदमी जिसने नेताओं ( जोकि भ्रष्टतम माने जाते हैं) को भी नहीं छोड़ा और असलियत खुलने पर नेताओं ने भी उससे किनारा कर लिया. बालीवुड के महानायक के घर में घुसा बैठा यह शख्स अब वहां से भी लात मारकर निकाल दिया गया जिसने अन्ना हजारे के उपवास को नौटंकी बताया था और अन्ना को अपने गिरेबान में झाकने की सलाह दे डाली. फिर भी जब अन्ना की जीत हो गयी तो उसने सीडी काण्ड उछालकर एक नए भ्रम का अँधेरा फैलाने की कोशिश की. क्या में पूछ सकता हूँ कि यह सीडी अब तक कहाँ रखी थी ? इसे ऐसे वक्त पर ही क्यों निकाला गया जब भ्रष्टाचार के पहाड़ को कुरेदने की पहल की जा रही है. क्या इसमें शातिर नेताओं के षड़यंत्र की बू नहीं आ रही है. एक नंगा आदमी दूसरों के कपडे तार-तार करने की कोशिश कर रहा है और हम उसकी इस हरकत को ” आग लगी है तो चिंगारी जरूर रही होगी” जैसा कहकर “किन्तु परन्तु” में उलझे हुए हैं. यह शर्मनाक है और लगता है हम भी सच्चाई की उस लौ को बुझाने में शामिल हो चुके हैं.

  3. chandan srivastava

    April 21, 2011 at 11:09 am

    bollywood ke mahanayk ke ghar se bhagaya vyakti ek baar 10 janpath se bhi bhagaya gaya tha, bina bulaye waha ke kisi karyakram me pahuncha tha….iska pahle se target congress me entry karne ka tha….abki fir se try kar rha hai

  4. nishant

    April 21, 2011 at 2:36 pm

    achchi samiksha hai.civil society ke member ki bhi samajik arthik janch jaruri hai.inke arthik shroto ki gahan sameeksha anivaryahai

  5. shyam Hardaha

    May 20, 2011 at 3:19 pm

    Nutan ji aapke chintan ko salam. aapne bahut achchi samiksa sahi hai. Mujhe to anaa hajareki puri kwayad hi aloktantrik lagti hai.

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