लोकतांत्रिक सरकारों की अगुवाई करने वाले शक्तिशाली राष्ट्र भारत के प्रधानमंत्री के मजबूरी की दास्तान सुनने के बाद बस यही कहने को दिल करता है कि मिस्टर प्राइम मिनिस्टर हम भी आपको ढोने के लिए मजबूर हैं। जिस तरह से पूरे विश्व के सामने भारत के प्रधानमंत्री ने बड़ी बेशर्मी से स्वीकार किया कि वे देश में हो रहे घोटालों को रोकने का काम गठबंधन की मजबूरी के चलते नहीं कर पाए, तो उससे साफ हो जाता है कि देश के प्रति उनके मन में कोई भी निष्ठा और भावना नहीं है।
भारत के गौरवशाली इतिहास में अपने बलिदान देने वाले देशभक्त शहीद आज देश के वर्तमान हालात को देखते हुए क्या सोचते होंगे कह नहीं सकता। लेकिन मेरा मन जरूर यह कह रहा है कि गर्व से कहो हम भारतीय हैं, का दम भरने वाले भारतीयों को अब वैश्विक समुदाय के सामने यह कहने से पहले सौ बार सोचना होगा।
मनमोहन सिंह की प्रधानमंत्री पद पर पहली नियुक्ति का प्रमुख कारण कांग्रेस के दामन पर लगे 1984 के दंगों का दाग धोने का कवायद थी। कांग्रेस मनमोहन सिंह की आड़ में अपने मंसूबों को पूरा करने में सफल रही। शायद इसी का प्रतीक था जरनैल सिंह का जूता। न्यायिक तौर पर इस मामले में कोई न्याय मिलने की उम्मीद किसी को नहीं है। इस बात को ध्यान में रखते हुए सिर्फ यही कह सकता हूं कि मिस्टर प्राइम मिनिस्टर आप देश और कौम दोनों के गद्दार हो।
राकेश शर्मा पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं.












Manoj Burnwal
February 19, 2011 at 6:27 am
main aap ki baat se sahmat hoon. Ab lhud ko bhartiye kahne mai sharm aati hai. yah to tai hai ki Mr. manmohan singh sachmuch majboor hain, isliye unhe resign kar dena chhaiye. waise bhi wo desh ke PM nahin, balki Bharat mata (kuch khas logon ke liye) Sonia gandhi ke PM hai. Sharm karo Manmohan singh, Sharm karo Sonia…………………….
rajkumar sahu, janjgir chhattisgarh
February 19, 2011 at 9:23 am
rakesh ji, aapne theek hi kaha.
राम प्रवेश
February 20, 2011 at 5:51 am
इतने मजबूर हो तो कुर्सी क्यों नहीं छोड देते प्रधान मंत्री जी । क्या देश की ऐसी तैसी करने पर लगे हो। तुम्हें खुद पर शर्म नहीं आती । नहीं आती है तो पूरे देश की खटियाखडी करके ही मानोगे क्या, या तुम पर कोई जूता उछाला जाना चाहिए इसके लिए और जूते खाने के बाद ही आप मानोगे बेशर्म कहीं के ??????