Connect with us

Hi, what are you looking for?

Local News Community

कहिन

मीडिया की स्‍वतंत्रता पर नकेल कसने की साजिश

गांधी ने कहा था कि “समाचार के उद्देश्यों में से एक है जनभावनाओं को समझना और उन्हें अभिव्यक्त करना; दूसरा है जनता में कुछ वांछित व न्यायोचित भावनाओं को उभारना और तीसरा है समाज के गुण-दोषों को उजागर करना”। क्या भारत प्रजातांत्रिक संस्थाएं जिनमें मीडिया भी है इन अवधारणाओं पर खरी नहीं उतरी हैं?

गांधी ने कहा था कि “समाचार के उद्देश्यों में से एक है जनभावनाओं को समझना और उन्हें अभिव्यक्त करना; दूसरा है जनता में कुछ वांछित व न्यायोचित भावनाओं को उभारना और तीसरा है समाज के गुण-दोषों को उजागर करना”। क्या भारत प्रजातांत्रिक संस्थाएं जिनमें मीडिया भी है इन अवधारणाओं पर खरी नहीं उतरी हैं?

सरकार को कुछ प्रजातांत्रिक संस्थाओं के व्यवहार पर ऐतराज है। पहले प्रधानमंत्री ने औपचारिक रूप से कुछ चुनिंदा संपादकों की मीटिंग में और अभी हाल में भारत सरकार की एक कबीना मंत्री ने वरिष्ठ मीडियाकर्मियों से एक अनौपचारिक बातचीत में कहा कि मीडिया खुद ही आरोपकर्ता, जांचकर्ता व जज बन जाती है। इसके पहले संसद में राजनीतिक वर्ग का आरोप था कि अन्ना का आंदोलन मीडिया की देन है। उधर केंद्र सरकार के वकील ने टूजी स्पेक्ट्रम मामले में सुप्रीम कोर्ट को लक्ष्मण रेखा न लांघने की सलाह दी, जिसपर अदालत ने कहा कि लक्ष्मण रेखा सीता ने न लांघा होता तो रावण का वध न होता। सूत्रों के अनुसार मंत्रिमण्डल की ताजा बैठक में अधिकांश मंत्रियों ने सूचना प्रसारण मंत्रालय पर दबाव डाला कि मीडिया पर नकेल कसी जाए। प्रजातंत्र और आपातकाल को नज़दीक से देखने वाली एक मंत्री ने स्पष्ट रूप से कहा कि वह ऐसा नहीं कर सकतीं।

आज ज़रूरत यह है कि इस बात का विश्लेषण हो कि क्या यह संस्थाएं लक्ष्मण रेखा लांघ रही हैं और अगर ऐसा कर रही हैं तो क्यों? दरअसल लक्ष्मण रेखा देश, काल व स्थिति-सापेक्ष होती है। मीडिया की कवरेज और कंटेंट संबंधी सीमारेखा भी शाश्वत नहीं होती। 2007 से इक्का-दुक्का चैनलों या अखबारों में सी.ए.जी की रिपोर्ट आने के बाद टूजी स्पेक्ट्रम घोटाले की खबर को पंख लग गए और भारतीय मीडिया का यह एक फुलटाइम जॉब बन गया। क्योंकि वह घोटाला न केवल एक लाख छिहत्तर हज़ार करोड़ रुपए का माना गया (वह भी एक सी.ए.जी ऐसी संस्था के मुताबिक) बल्कि उसके पीछे स्पष्ट रूप से सिस्टेमिक असफलता दिखाई देने लगी। आरोपकर्ता मीडिया नहीं बल्कि सी.ए.जी, देश की जनता व यहां तक कि खुद सुप्रीम कोर्ट थी। दरअसल यह सारी समस्या संस्थाओं के प्रति सर्वथा उचित अविश्वास को लेकर है। यह बात सही है कि मीडिया कई बार अतिरेक की हद तक जाता है लेकिन इसका कारण यह है कि संस्थाओं की क्षमता और विश्वसनीयता बुरी तरह गिरी है और ऐसे में जब जनभावनाएं सार्थक रूप से उद्वेलित हों तब मीडिया का स्वर भी ऊंचा हो जाता है।

संविधान में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को मौलिक अधिकार माना गया है। इस अधिकार की विस्तृत विवेचना करने पर पाया गया कि जनता को सूचना पाने व सूचना देने का अधिकार भी इसी से निसर्ग होता है। जहां एक ओर भारतीय मीडिया को कोई हक नहीं है कि वह जनभावनाओं को अभिव्यक्त ना करे वहीं सरकार से भी यह अपेक्षित है कि वह जनता और मीडिया के बीच में अवरोध ना बने। हाल ही में जारी एक प्रेस वक्तव्य में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने ताकीद की कि अगर किसी न्यूज़ चैनल ने उसके द्वारा बनाए गए कंटेट कोड का पांच बार उल्लंघन किया तब उसके लाइसेंस का पुनर्नवीनीकरण नहीं किया जाएगा। कौन तय करेगा कि कंटेंट सही है या गलत? क्या इसे सरकारी अधिकारी के हांथ में सौंपा जा सकता है? फिर अचानक इसकी जरूरत क्या पड़ी? क्या वर्तमान दर्जनों कानून काफी नहीं हैं? कहीं ऐसा तो नहीं कि भ्रष्टाचार के खिलाफ उभरे जनांदोलन में मीडिया की भूमिका सरकार को रास नहीं आई और क्या यह नहीं माना जा सकता कि यह वक्तव्य मीडिया को एक धमकी है?

ऐसा नहीं कि मीडिया ने गलतियां नहीं की। लेकिन 16 साल के इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में अभी ऐसी गलतियां स्वाभाविक हैं। इसके बाद भी इसकी सामाजिक उपादेयता देखनी होगी। पिछले दो वर्षों में स्वनियमन के जबरदस्त सार्थक प्रयास किए गए फिर भी अभी बहुत कुछ अपेक्षित है। उदाहरण के तौर पर यह सही है कि आरोपी तब तक निर्दोष माना जाना चाहिए जब तक अंतिम अदालत उसे दोषी न करार दे। लेकिन यह सिद्धान्त सामान्य स्थितियों के लिए होता है न कि सिस्टेमिक असफलताओं के मामले में। अगर इस सिद्धान्त का अक्षरश: अनुपालन किया जाए तब ए.राजा को मंत्री पद से हटाना भी उतना ही गलत था जितना मीडिया का उसे भ्रष्टाचारी बताना।

अमरीकी जज एजरटन ने एक सर्वसम्मत फैसले में कहा था “जनहित व्यक्तिगत अधिकारों से बड़ा होता है”। क्या टूजी स्पेक्ट्रम के हर पहलू को उजागर करना व तथ्यों, मतों और जनाक्रोश को बाहर लाना लक्ष्मण रेखा पार करना माना जाएगा? संस्थाओं को अतिप्रतिक्रियावादी तब होना पड़ता है जब राज्य के अभिकरण जाने-अनजाने में एक नेक्सस बना लेते हैं और जनता का विश्वास उन अभिकरणों से खत्म होने लगता है। आस्ट्रेलिया में मानहानि का कानून बहुत सख़्त है। न्यू वेल्स में सर रॉबर्ट एस्किन जो कि न्यू साउथ वेल्स के प्रधानमंत्री थे (जो कि अमेरिका के किसी राज्य के गवर्नर के बराबर का पद है) करीब एक दशक तक पद पर रहे और इस दौरान उनके बारे में ज़बरदस्त अफवाह थी कि वह एक संगठित अपराध सिंडिकेट के मुखिया हैं। मानहानि के डर से ऑस्ट्रेलिया की मीडिया उनके कुकर्मों का राजफाश नहीं कर पायी और यह राज एस्किन के मरने के बाद ही 1981 में खुल पाया। ऑस्ट्रेलिया में हर इस तरह की खबर को पहले एक वकील को दिखाया जाता है ताकि मानहानि का दावा न हो सके। क्या भारत में हम ऐसी मीडिया चाहते हैं?

यहां हम आपको दो ताजा उदाहरण दे रहे है कि किस तरह भारतीय इलेक्ट्रॉनिक मीडिया अपने को बेहतर व जनोपयोगी बना रही है। पिछले दो माह में ब्रॉडकास्ट एडीटर्स एसोसिएशन के सामने दो घटनाएं आयीं और दोनों पर फैसला 15 मिनट के अंदर सर्वसम्मति से लिया गया। पहला था अजहरुद्दीन के बेटे की मौत के बाद का कवरेज। चूंकि भारतीय इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर एक आरोप लगता रहा है कि यह मृतकों के घर वालों से यह पूछता है कि आपको कैसा लग रहा है? इसलिए जब इस घटना के कवरेज का मुद्दा आया तब सारे संपादकों ने एक स्वर में कहा कि चूंकि यह घटना एक नौजवान की दुर्घटना में मृत्यु का है, लिहाज़ा इसको पारिवारिक डोमेन मानकर इसका कवरेज न किया जाए। अगले 15 मिनट के अंदर सारे कैमरामैन व रिपोर्टरों को वापस बुला लिया गया। दूसरा उदाहरण राजस्थान के गोपालपुर की साम्प्रदायिक हिंसा का। इसके कवरेज के मामले में यह सुनिश्चित किया गया कि चूंकि खबर देना हमारा मूल कर्तव्य है इसलिए खबर दी जाएगी। लेकिन चूंकि भारत में परिधान से कई बार सम्प्रदाय का पता चलता है इसलिए यह सुनिश्चित किया गया कि ऐसा कोई विज़ुअल न दिया जाए जिससे किसी व्यक्ति के सम्प्रदाय का पता चले। साथ ही रिपोर्टरों को आगाह किया गया कि अपने फोन-ओ या पी.टू.सी में शब्दों के चयन का खासा ध्यान रखें।

थॉमस जेफरसन ने 1787 में कहा था “अगर मुझे एक प्रेस विहीन सरकार और सरकार विहीन प्रेस के बीच चुनना हो तो मैं एक क्षण भी विलंब किए बगैर दूसरे विकल्प को चुनूंगा। भारतीय इलेक्‍ट्रानिक मीडिया की उम्र अभी महज 16 साल है और आत्मनियमन के जरिए यह लगातार अपने प्रोफेशनल संहिता का विकास कर रही है। चूंकि विविधतापूर्ण देश में हर घटना पर एक नया नॉर्म विकसित करना पड़ रहा है इसलिए कई बार मीडिया की प्रतिक्रिया में तादात्म्य की कमी दिखाई देती है जो कि वांछित होती है।

लेखक एनके सिंह वरिष्‍ठ पत्रकार, ब्रॉडकास्ट एडिटर्स एसोसिएशन के महासचिव और साधना न्यूज चैनल के एडिटर इन चीफ हैं. उनका यह लेख उनके ब्‍लॉग पोस्‍टकार्ड से साभार लेकर प्रकाशित किया जा रहा है. इस लेख दैनिक भास्‍कर में भी प्रकाशित हो चुका है.

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

0 Comments

  1. Abhishek sharma

    October 12, 2011 at 12:36 pm

    wajib hai…. media ko 19 (1) se aage karna sarkar ki chheechhaledar karna hai…lihaja media pe nakel kasna jaruri lag raha hai sarkar ko…har mudde pe media sarkar ke virodh me hotee hai…..virodh ka matlab sarkare apni ijjat neelam hone ke barabar maan rahi hai.

  2. कुमार सौवीर, लखनऊ

    October 12, 2011 at 1:38 pm

    एक शानदार प्रतिक्रिया और स्‍पष्‍टीकरण।
    बेहद संतुलित।
    इससे इतर एक बात और, शायद हम उस मुकाम पर पहुंचते जा रहे हें जहां हमें अब देश की मनो-समाजशास्‍त्रीय व्‍याख्‍या की सर्वाधिक जरूरत है। जाहिर है इसके लिए मानसिक और भावनात्‍मक संयम तथा धैर्य ही पहली सीढ़ी है।

  3. nr rajput

    October 12, 2011 at 6:20 pm

    aaj kal sayad he aisa koi shar ya kaswa hoga jahan patrakaron ki
    bheed na ho. nakali farji patrakaron se achhe patrakaron ko pahunch rahi thes.

  4. Mohan Tiwari

    October 13, 2011 at 3:45 pm

    vichar achhe hai…amal karane ki jaroorat hai-kalbharo

  5. prashant

    October 14, 2011 at 5:50 pm

    अभी ऐसा क्या हो गया, क्योंकि मीडिया तो अभी उसी हिसाब से चल रही है जैसे चलना चाहिये. तस्लीमा पर हमला करने वालों पर कोई सीरीज चलाई? याकूब जी पर कोई सीरीज चलाई? केरल के प्रोफेसर पर कोई सीरीज चलाई?

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

भड़ास तक खबर सूचनाएं जानकारियां मेल करें : [email protected]

भड़ास के वाट्सअप चैनल से जुड़ें और नवीनतम खबरें पाएं : Bhadas Whatsapp

भड़ास लीगल टीम : किसी किस्म की लीगल हेल्प के लिए संपर्क करें- Bhadas Legal Team

You May Also Like

Uncategorized

भड़ास4मीडिया डॉट कॉम तक अगर मीडिया जगत की कोई हलचल, सूचना, जानकारी पहुंचाना चाहते हैं तो आपका स्वागत है. इस पोर्टल के लिए भेजी...

Uncategorized

भड़ास4मीडिया का मकसद किसी भी मीडियाकर्मी या मीडिया संस्थान को नुकसान पहुंचाना कतई नहीं है। हम मीडिया के अंदर की गतिविधियों और हलचल-हालचाल को...

हलचल

[caption id="attachment_15260" align="alignleft"]बी4एम की मोबाइल सेवा की शुरुआत करते पत्रकार जरनैल सिंह.[/caption]मीडिया की खबरों का पर्याय बन चुका भड़ास4मीडिया (बी4एम) अब नए चरण में...

Uncategorized

मीडिया से जुड़ी सूचनाओं, खबरों, विश्लेषण, बहस के लिए मीडिया जगत में सबसे विश्वसनीय और चर्चित नाम है भड़ास4मीडिया. कम अवधि में इस पोर्टल...