धीरेंद्र श्रीवास्तव
इसे सोच कर मन खिन्न है। यह सोच कर और खिन्न है कि यह सब उस धरती पर हो रहा है, जहां के लोग प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में बाबू कुंअर सिंह और अमर सिंह के साथ लड़ने के लिए खुद उनके गांव तक गये। आजादी की इस जंग में सैकड़ों लोग मारे गये और तकरीबन तीन दर्जन लोगों को मुकदमा चलाकर फांसी पर लटकाया गया। इसमें अधिसंख्य एक अकेले गहमर गांव के थे। जहां के अकेले एक गांव शेरपुर ने 1942 में सात सपूतों को स्वतंत्रता की बेदी पर चढ़ाकर महात्मा गांधी की अहिंसा को सधवा कर दिया था। जहां के लोग आपातकाल के विरोध में गीत गाते थे –
मीसा हो चाहे फांसी,
यह तो महासमर है,
चिंता करे वह प्राणी,
जिसको रहना यहां अमर है…।
जेल से आते-जाते समय बवंडर बाबा के इस गीत को सैदपुर के बुजुर्ग अब्बासी चाचा यूं गाते चलते थे, जैसे 19 वर्ष के नौजवान हों। इसे लेकर गाजीपुर के लोग सड़क पर क्यों नहीं उतर रहे हैं, मुझे समझ में नहीं आ रहा। बहरहाल, मां के इस अपमान के खिलाफ लड़ने की जरूरत है। यह लड़ाई इस हद तक जानी चाहिए कि आगे कहीं किसी भी मां के साथ इस तरह की घटना न हो। इस लड़ाई में मुझे शामिल होने का अवसर मिला, तो अपने को गर्वान्वित समझूंगा। भाई, यह पीड़ा केवल आपकी नहीं है, उन सभी कलमकारों की है, जिनकी कलम अभी सामाजिक सरोकारों को भूली नहीं है, जिनके लिए पत्रकारिता पेशा नहीं, मिशन है। मैं उम्मीद करता हूं कि ऐसे सभी लोग लामबंद होकर इस लड़ाई में शामिल होंगे और मां को न्याय मिलेगा।
न्याय की उम्मीद के साथ,
धीरेंद्र श्रीवास्तव
चैनल हेड
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