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मुंबई के राजपूत

[caption id="attachment_21060" align="alignleft" width="85"]शेषजी[/caption]मुंबई में इस बार मुझे एक बहुत ही अजीब बात समझ में आई. आमतौर पर अपनी बिरादरी की पक्षधरता से मैं बचता रहा हूँ. उत्तर प्रदेश में ज़मींदारी उन्मूलन के आस-पास जन्मे राजपूत बच्चों ने अपने घरों के आस पास ऐसा कुछ नहीं देखा है जिस पर बहुत गर्व किया जा सके. अपने इतिहास में ही गौरव तलाश रही इस पीढ़ी के लिए यह अजूबा ही रहा है कि राजपूतों पर शोषक होने का आरोप लगता रहा

शेषजी

मुंबई में इस बार मुझे एक बहुत ही अजीब बात समझ में आई. आमतौर पर अपनी बिरादरी की पक्षधरता से मैं बचता रहा हूँ. उत्तर प्रदेश में ज़मींदारी उन्मूलन के आस-पास जन्मे राजपूत बच्चों ने अपने घरों के आस पास ऐसा कुछ नहीं देखा है जिस पर बहुत गर्व किया जा सके. अपने इतिहास में ही गौरव तलाश रही इस पीढ़ी के लिए यह अजूबा ही रहा है कि राजपूतों पर शोषक होने का आरोप लगता रहा

शोषण राजपूत तालुकेदारों और राजाओं ने किया होगा लेकिन शोषक का तमगा सब पर थोप दिया जाता रहा है. आम राजपूत तो अन्य जातियों के लोगों की तरह गरीब ही हैं. मैं ने अपने बचपन में देखा है कि मेरे अपने गांव में राजपूत बच्चे भूख से तड़पते थे. मेरे अपने घर में भी मेरे बचपन में भोजन की बहुत किल्लत रहती थी. इसलिए राजपूतों को एक वर्ग के रूप में शोषक मानना मेरी समझ में कभी नहीं आया. लेकिन सोशलिस्टिक पैटर्न आफ सोसाइटी और बाद में वामपंथी सोच के कारण कभी इस मुद्दे पर गौर नहीं किया. संकोच लगता था.

मेरे बचपन में मेरे गाँव में राजपूतों के करीब 16 परिवार रहते थे. अब वही लोग अलग-विलग होकर करीब 40 परिवारों में बँट गए हैं. मेरे परिवार के अलावा कोई भी ज़मींदार नहीं था. सब के पास बहुत मामूली ज़मीन थी. कई लोगों के हिस्से में तो एक एकड़ से भी कम ज़मीन थी. तालाब और कुओं से सिंचाई होती थी और किसी भी किसान के घर साल भर का खाना नहीं पूरा पड़ता था. पूस और माघ के महीने आम तौर पर भूख से तड़पने के महीने माने जाते थे. जिसके घर पूरा भी पड़ता था उसके यहाँ चने के साग और भात को मुख्य भोजन के रूप में स्वीकार कर लिया गया था.

मेरे गांव में कुछ लोग सरकारी नौकरी भी करते थे हालांकि अपने-अपने महकमों में सबसे छोटे पद पर ही थे. रेलवे में एक स्टेशन मास्टर, तहसील में एक लेखपाल और ग्राम सेवक और एक गाँव पंचायत के सेक्रेटरी. तीन-चार परिवारों के लोग फौज में सिपाही थे. सरकार में बहुत मामूली नौकरी करने वाले इन लोगों के घर से भूखे सो जाने की बातें नहीं सुनी जाती थीं. बाकी लोग जो खेती पर ही निर्भर थे उनकी हालत खस्ता रहती थी. लेकिन जब हम बड़े हुए और डॉ. लोहिया की समाजवादी सोच से प्रभावित हुए तो मेरी समझ में आया कि राजपूत तो शोषक होते हैं, लेकिन जब मैं अपने गाँव के राजपूतों को देखता था तो मुझे लगता था कि मेरे गाँव के लोग भी तो राजपूत हैं, लेकिन शोषक होना तो दूर की बात, वे तो शोषण के शिकार थे.

बाद में समझ में आया कि चुनावी राजनीति में कांग्रेस के एकाधिकार को खत्म करने के उद्देश्य से राजनीतिक बिरादरी ने कुछ ऐसी जातियां मार्क कर दी थीं जिनके खिलाफ पिछड़ी और दलित जातियों को संगठित किया जा सके. हालांकि उस काम में वे सफल नहीं हुए. सवर्ण जातियों को गरिया कर पिछड़ी जातियों के वोट तो हाथ आ गए, लेकिन बाद में मायावती और कांशी राम के नेतृत्व में उन्हीं पिछड़ी जातियों के खिलाफ दलित जातियों ने मोर्चा खोला और आज उत्तर प्रदेश में सबसे ऊंची ब्राह्मण जाति के लोग मायावती के साथ हैं, जबकि राजपूत वोट बैंक के रूप में विकसित हो चुका है और उसे अपनी तरफ खींचने के लिए सभी राजनीतिक पार्टियां कोशिश कर रही हैं.

आज राजपूतों के एक बहुत बड़े वर्ग के लोग गरीबी की रेखा के बहुत नीचे रह रहे हैं. हालांकि यह भी सच है कि इसी बिरादरी से आने वाले बहुत सारे लोगों ने उत्तर प्रदेश में राजनीति का सहारा लेकर अच्छी खासी ताक़त अर्जित कर ली है. लेकिन वे माइनारिटी में हैं. उत्तर प्रदेश के अवध इलाके में स्थित अपने गांव के हवाले से हमेशा बात को समझने की कोशिश करने वाले मुझ जैसे इंसान के लिए यह बात हमेशा पहेली बनी रही कि सबसे गरीब लोगों की जमात में खड़ा हुआ मेरे गाँव का राजपूत, शोषक क्यों करार दिया जाता रहा है. मेरे गाँव के राजपूत परिवारों में कई ऐसे थे जो पड़ोस के गाँव के कुछ दलित परिवारों से पूस-माघ में खाने का अनाज भी उधार लाते थे, लेकिन शोषक वही माने जाते थे.

बाद में समझ में आया कि मेरे गाँव के राजपूतों के पिछड़ेपन का सबसे बड़ा कारण शिक्षा की उपेक्षा रही है. जिन घरों के लोग पढ़-लिख गए वे आराम से रहने लगे थे. वरना पिछड़ेपन का आलम तो यह है कि इस साल राज्य सरकार ने जब सफाईकर्मी भर्ती करने का फैसला किया तो मेरे गाँव के कुछ राजपूत लड़कों ने दरखास्त दिया था. जब गाँव से बाहर निकल कर देखा तो एक और बात नज़र आई कि हमारे इलाके में जिन परिवारों के लोग मुंबई में रहते थे उनके यहाँ सम्पन्नता थी. मेरे गाँव के भी एकाध लोग मुंबई में कमाने गए थे. वे भी काम तो मजूरी का ही करते थे लेकिन मनी आर्डर के सहारे घर के लोग दो जून की रोटी खाते थे. मेरे ननिहाल में लगभग सभी संपन्न राजपूतों के परिवार मुंबई की ही कमाई से आराम का जीवन बिताते थे.

ननिहाल जौनपुर जिले में है. 2004 में जब मुझे मुंबई जाकर नौकारी करने का प्रस्ताव आया तो जौनपुर में पैदा हुई मेरी माँ ने खुशी जताई और कहा कि भइया चले जाओ, बम्बई लक्ष्मी का नइहर है. बात समझ में नहीं आई. जब मुंबई में आकर एक अधेड़ पत्रकार के रूप में अपने आपको संगठित करने की कोशिश शुरू की तो देखा कि यहाँ बहुत सारे सम्पन्न राजपूत रहते हैं. देश के सभी अरबपति ठाकुरों की लिस्ट बनायी जाय तो पता लगेगा कि सबसे ज्यादा संख्या मुंबई में ही है. दिलचस्प बात यह है कि इनमें ज्यादातर लोगों के गाँव तत्कालीन बनारस और गोरखपुर कमिश्नरियों में ही हैं.

कभी इस मसले पर गौर नहीं किया था. इस बार की मुंबई यात्रा के दौरान कांदिवली के ठाकुर विलेज में एक कालेज के समारोह में जाने का मौक़ा मिला. वहां राष्ट्रीय राजपूत संघ के तत्वावधान में उन बच्चों के सामान में एक कार्यक्रम आयोजित किया गया था, जिनको 2011 की परीक्षाओं में बहुत अच्छे नंबर मिले थे. बहुत बड़ी संख्या में 70 प्रतिशत से ज्यादा नंबर पाने वाले बच्चों की लाइन लगी हुई थी और राजपूत समाज के ही सफल, संपन्न और वरिष्ठ लोगों के हाथों बच्चों को सम्मानित किया जा रहा था. वहां जो भाषण दिए गए उसे सुनकर समझ में आया कि मामला क्या है. उस सभा में मुंबई में राजपूतों के सबसे आदरणीय और संपन्न लोग मौजूद थे. उस कार्यक्रम में जो भाषण दिए गए उनसे मेरी समझ में आया कि माजरा क्या है.

मुम्बई में आने वाले शुरुआती राजपूतों ने देखा कि मुंबई में काम करने के अवसर खूब हैं. उन्होंने बिना किसी संकोच के हर वह काम शुरू कर दिया जिसमें मेहनत की अधिकतम कीमत मिल सकती थी. और मेहनत की इज्ज़त थी. शुरुआत में तबेले का काम करने वाले यह लोग अपने समाज के अगुवा साबित हुए. उन दिनों माहिम तक सिमटी मुंबई के लोगों को दूध पंहुचाने का काम इन लोगों ने हाथ में ले लिया. जो भी गाँव-जवार से आया सबको इसी काम में लगाते गए. आज उन्हीं शुरुआती उद्यमियों के वंशज मुंबई की सम्पन्नता में महत्वपूर्ण हस्ताक्षर है. साठ और सत्तर के दशक में जो लोग मुंबई किसी मामूली नौकरी की तलाश में आये, उन्होंने भी सही वक़्त पर अवसर को पकड़ा और अपनी दिशा में बुलंदियों की तरफ आगे चल पड़े.

आज शिक्षा का ज़माना है. प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने बारम्बार कहा है कि भारत को शिक्षा के एक केंद्र के रूप में विकसित किया जाएगा. मुंबई के राजपूत नेताओं ने इस बयान के आतंरिक तत्व को पहचान लिया और आज उत्तर प्रदेश से आने वाले राजपूतों ने शिक्षा के काम में अपनी उद्यमिता को केन्द्रित कर रखा है. उत्तरी मुंबई में कांदिवली के ठाकुर ग्रुप आफ इंस्टीट्यूशन्‍स की गिनती भारत के शीर्ष समूहों में होती है. इसके अलावा भी बहुत सारे ऐसे राजपूत नेताओं को मैं जानता हूँ जिन्हों ने शिक्षा को अपने उद्योग के केंद्र में रखने का फैसला कर लिया है. लगता है कि अब यह लोग शिक्षा के माध्यम से उद्यम के क्षेत्र में भी सफलता हासिल करेंगे और आने वाली पीढ़ियों को भी आगे ले जायेंगे. बहरहाल मेरे लिए यह यात्रा बहुत शिक्षाप्रद रही क्योंकि भारतीय सामाजिक जीवन के एक अहम पहलू पर बिना किसी अपराधबोध के दौर से गुजरे हुए मैं ने एक सच्चाई लिख मारी.

लेखक शेष नारायण सिंह वरिष्‍ठ पत्रकार तथा कॉलमिस्‍ट हैं. वे इन दिनों दैनिक अखबार जनसंदेश टाइम्‍स के नेशनल ब्‍यूरोचीफ हैं.

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0 Comments

  1. Ashutosh Kumar Singh

    September 5, 2011 at 11:12 am

    शेष जी, आपने जिस तरह से एक अनछूए पहलू को उठाने का काम किया है, वह सराहनीय है। लेकिन एक बात जिससे आप इंकार नहीं कर सकते हैं कि राजपूतों ने दलितो के साथ बहुत नाइंसाफियां की हैं। इन नाइंसाफियों का ही प्रतिफल है कि राजपूतों को शोषक वर्ग के तमगे से नवाजा गया…समय के साथ-साथ चीजे बदली है…राजपूतों की वर्तमान सामाजिक परिदृश्य भी बदल चुके हैं…राजपूतो को लेकर समाज में चली आ रही अवधारणाओं को तो तोड़ने का वक्त तो आ ही गया है…इस दिशा में राजपूतों को भी अपनी सोच में सकारात्मक बदलाव लाने की जरूरत है….

    आशुतोष कुमार सिंह
    मुंबई[b][/b][b][/b][b][/b][b][/b]

  2. shravan hsukla

    September 5, 2011 at 12:17 pm

    ashutosh.. lekh shuru hone se pahle hi shesh ji ne sthiti spast kar di hai.. kuch talukedar aur raj gharane ke log hain unme se.. sabhi nahi…

  3. shiv shankar singh

    September 5, 2011 at 1:45 pm

    Sir, main Bhee Bihar ka ek yuva Rajpoot hoon jo Aarakshan ke khel main kai baar sarkari naukari se vanchit rah gaya. Papa se Dada jee Dwara Dalito ke Sosan ke kahani Bhee Suna. Mumbai je Rajpooton ke bare me aap ke article main pada, lekin Desh bhar ke rajpooton ke halat aap ke gaon jaise he hai.

  4. parveen

    September 5, 2011 at 5:31 pm

    मुझे लगता है कि ठाकुर करुर रहे होगे लेकिन इतने भी नहीं की हरेक ठाकुर को गलत निगाह से देखा जाए ठाकुर तो अपने अह्म में मर गए या दारू बाजी या अय्याशी मे लेकिन अब जो नई प्यौध जो आ रही है वो कुछ हद तक अपना भविष्य तलाश रही है चाहे वो किसी भी क्षेत्र में हो ठाकुरो की जय हो नही तो अंग्रेज तो हमारा देश पुरा ही तबाह कर जाते यदि ये क्षत्रिय ना होते

    प्रवीण मेरठ 9358631858

  5. SP Singh Piplaj

    September 5, 2011 at 6:05 pm

    शेषनारायण सिंह जी, कुछ राजघरानों और ठिकानेदारों/ताल्लुकेदारों के सामंती सोच और उत्पीड़न की वजह से ही आज सारा राजपूत समुदाय आलोचना का केंद्र बना है.जबकि सच यह भी है कि रुनिचा के बाबा रामदेव (जो कि जाति से तंवर राजपूत थे ) सामाजिक न्याय के पहले ऐसे नायक बने जिन्हें दलित दमित लोक देवता के रूप में पूजते हैं और मुस्लिम रामसा पीर के रूप में मानते हैं .पूर्व प्रधान मंत्री स्व0 विश्व नाथ प्रताप सिंह ने पिछड़ों के आरक्षण यानि मंडल की रिपोर्ट लागू की और पूर्व केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्री स्व 0अर्जुन सिंह ने उच्च शिक्षण संस्थानों में पिछड़ों के आरक्षण और मुस्लिम आरक्षण के लिए पहल की.यानि दलित-पिछड़ी जातियों के लिए समर्पण का जो भाव राजपूतों में रहा है,वह शायद किसी और उच्च- द्विज जाति में नहीं.राजपूतों को समझना है तो राजस्थान के चर्चित विचारक स्वर्गीय आयुवान सिंह का साहित्य पढ़ें.जिन्होंने मंडल रिपोर्ट से पहले ही लिखा दिया था कि राजपूत छोटी जातियों के उत्थान के लिए काम करें.और,उन्हें उनका हक़ दिलाने की पहल करें,जिन्हें आरक्षण दिये जाने की पीड़ा है,उन्हें समझ लेना चाहिए कि समाज के सबसे कमजोर तबके को मजबूत किये बिना समाज आगे नहीं चल सकता और जिन्हें हर राजपूत सामंत नजर आता है,उन्हें समझ लेना चाहिए कि राजपूत एक सैनिक कौम रही है,पहले उसने तत्कालीन राज्यों के हित में जान न्यौछावर की,अब देश के लिए शीश कटाने में भी यही आगे है.आपने मुम्बई के राजपूतों के उत्थान की बात कही है.मेरे ख्याल से बदलाव की यह बयार हर उस जगह आप महसूस करेंगे,जहां पढ़ाई की अहमियत समझी गई है.

  6. नमन

    September 12, 2011 at 11:10 am

    .पूर्व प्रधान मंत्री स्व0 विश्व नाथ प्रताप सिंह ने पिछड़ों के आरक्षण यानि मंडल की रिपोर्ट लागू की और पूर्व केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्री स्व 0अर्जुन सिंह ने उच्च शिक्षण संस्थानों में पिछड़ों के आरक्षण और मुस्लिम आरक्षण

    ऊपर लिखे गये दो नाम जो मेरे हिसाब से राजपूत कह्लाने के अधिकारी तो कभी नही हो सकते मड्ल कमीशन की सिफारिशे लागू करवाकर समाज का इक और विभाजन करना कभी भी राजपूत का धर्म तो नही हो सकता ये सिर्फ अपना हित साधने वाले नेता है और कुछ नही रही बात अर्जुन सिह तो उनके बारे मे कुछ कहना और राजपूत की मां को गाली देना बराबर है….

  7. kamlesh

    September 16, 2011 at 3:44 pm

    :o:o:o

  8. दुष्यन्त राघव

    September 17, 2011 at 5:45 am

    आशुतोष जी नमस्कार
    आपका लेख बहुत पसंद आया।
    लेकिन मैं एक बात जरूर कहना चाहूंगा कि सरकार और समाज दोनों ने ही राजपूतों के साथ कुछ-एक आरोपों के चलते बहुत नाईंसाफी की हैं और अभी भी कर रहें हैं। जिन चंद ‘राजपूतों’ के कारण समस्त राजपूत समूदाय पर आरोप लगे, उनकी तो अच्छी कटी ही, और उनके परिवारों और वंसजों की भी अच्छी कट रही है और रही बात सरकार की, तो वो तो अब भी ‘उन लोगों’ के साथ है। ‘उन लोगों’ को आरक्षण से कोई मतलब नहीं। क्योंकि उनके काम तो कभी रुकते नहीं ना……………..
    मारा गया बेचारा आम-राजपूत………..

  9. narendra singh

    November 9, 2013 at 3:59 am

    aaj ke sabhi rajput bakai kshatriya hai,. rajput to matr kuchh raje rajware ke vanshaj hai, na ki sabhi kshatriya jati.atah hame apne aap ko kshatrya hi kahna chahiye .rajput batakar hame kamtar kar dia gaya hai
    narendra singh

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