
विष्णु त्रिपाठी
मोबाइल के मुताबिक टाइम था रात का एक बजकर 46 मिनट। रास्तों पर आमदरफ्त तो कतई नहीं थी लेकिन सन्नाटा नहीं था। हर 50-100 मीटर पर कर्णशूलक गीत-संगीत। दरअसल मुझे कल्पना नहीं थी। मैंने सवालिया निगाहों से देखा तो आनंद भाई का आगराइट अंदाज में जवाब था, लौंडे हैं, त्यौहार सेलिब्रेट कर रहे हैं। मेरी गुजारिश पर एक सेलिब्रेशन प्वाइंट पर कार थम गई और हम भी कुछ दूर से ही सही सेलिब्रेशन का एहसास जज्ब करने लगे, कंसीव करने लगे। मेरे लिए ये नया एक्सपीरियेंस था। होली पर तो देखा था, जगह-जगह म्यूजिक सिस्टम लगाकर होरिहारों या हुड़दंगियों का इस तरह का सेलिब्रेशन, लेकिन ईद के बारे में ऐसी कल्पना नहीं थी। ये भी हो सकता है कि ईद के मौके पर इतनी रात हम पहली बार इस तरह निकले हों। सेलिब्रेशन की लोकेशन का सीन कुछ इस तरह था, सड़क पर कई कोणों से लाइट्स लगी थीं, जो सेलिब्रेशन प्वाइंट को चकमक कर रही थीं। सड़क किनारे तख्त या चबूतरों पर म्यूजिक सिस्टम आसीन था। उसके ऊपर हरे रंग का सिल्की बैनर भी दिखा, जिस पर बड़े-बड़े हरफों में ‘ईद मुबारक’ लिखा था।
ऊपर जो लिखा है, वो अगर हम नहीं भी लिखते तो इस लिखे हुए पर और इसे पढ़ने वालों पर पड़ने वाले इंपैक्ट में कोई खास बदलाव नहीं होता। लेकिन बात कहीं से तो शुरू करनी ही होती… और तब जब बात मुन्नी की हो रही हो। म्यूजिक सिस्टम पर जो गाना बज रहा था, वो कुछ अलग था। यही वजह है कि दिमाग की सुई उसी पर अटक गई। …और उस सेलिब्रेशन में जितने लोग मौजूद थे, वो सब भी उस कुछ अलग लगने वाले खास गाने पर अटके, लटके और मटके हुए थे। लोगों का जो अटकना था वो अटक रहा था। लोगों का जो लटकना था वो लटक रहा था। लोगों का जो मटकना था वो मटक रहा था। मेरा सिर्फ दिमाग अटक गया। मुझे तो लगा कि म्यूजिक सिस्टम भी उस गाने पर अटका हुआ था क्योंकि हमें वहां थमे हुए सात-आठ मिनट हो चले थे लेकिन वो गाना थमने का नाम ही नहीं ले रहा था या ये भी हो सकता है कि जो लोग उस गाने पर थमने का नाम नहीं ले रहे थे, वही म्यूजिक सिस्टम को भी उस गाने पर थमने से रोक रहे हों।
गाने का ध्रुवपद कुछ इस तरह था… मुन्नी बदनाम हुई, डार्लिंग तेरे लिए। गाना लगातार बज रहा था और जो सेलिब्रेट कर रहे थे, वो अपने-अपने अंदाज में थिरक रहे थे। मैंने थिरकने वालों में खास बात देखी कि वो जोड़ों में थिरक रहे थे, मटक रहे थे या फुदक रहे थे। वो जोड़े एक दूसरे के 63 थे, सम्मुख, आमने-सामने। वो लगातार एक दूसरे पर आंखें काढ़े हुए थे, जिसे हम (अ) सामान्य परिस्थितियों में एक-दूसरे की आंखों में आंखें डालना कहते हैं। उनकी आंखें लगातार चार हो रही थीं, लेकिन निश्चित तौर पर वो, वो नहीं थे, जिनके लिए कुछ दिनों पहले एक (अ) प्राकृतिक कानून बनाया गया है। उनके घुटने एक सुनिश्चित अंश के कोण में मुड़े हुए थे। उन्होंने अपने दोनों हाथ सांप के फन की तरह काढ़े हुए थे। जब उनकी स्प्रिंगनुमा गर्दनों पर टिके हुए सिर भरतनाट्यम शैली में आगे-पीछे हो रहे होते तो उनकी आंखें और ज्यादा एक-दूसरे पर फटी हुई दिखतीं, जिनके लिए प्रतिष्ठित साहित्यकार विस्फरित नेत्र जैसा शब्द इस्तेमाल करते हैं।
उनके फन की मुद्रा में तने हुए हाथ एनसीसी वाली लेफ्ट-राइट की तरह कोहनियों से आगे-पीछे हो रहे थे। वो लगभग 30 अंश मुड़े हुए घुटनों के बल पर कंगारुओं की तरह आगे-पीछे फुदक रहे थे। कोई भी ये बात आसानी से समझ सकता था कि वो ये सब सिर्फ और सिर्फ मुन्नी के लिए कर रहे थे। मैं उस नर्तक समूह में एक संप्रदाय देख रहा था, मुन्नी संप्रदाय। वो सब मुझे परम साधिका मुन्नी के अनुगामी लग रहे थे। वो अस्तव्यस्त होते हुए भी नर्तन की तमाम मुद्राओं में अंतर्व्यस्त होते हुए मुन्यातुर हुए जा रहे थे, मुन्याकांक्षी हुए जा रहे थे, मुन्याभिलाषी हुए जा रहे थे। वो मुन्नी, जो निस्वार्थ कर्मयोगी है, दूसरों के लिए समर्पित है। वो मुन्नी, जो परम संन्यस्त है, दूसरों के लिए न्यस्त और व्यस्त (बदनाम) है। जो सत्य की साधक-शोधक है, इसलिए बिना लाग-लपेट ये मंजूर कर रही है कि हां वो बदनाम हो गई है, बदनाम हो चुकी है (और आगे भी बदनाम होने को उत्सुक रहेगी)। यह स्वीकारोक्ति वह ऐसे-वैसे नहीं, गाते हुए, नाचते हुए, ठुमकते हुए कर रही है। उसकी यह स्वीकारोक्ति इसलिए भी प्रेरणाप्रद लग रही है कि वो यह स्वीकारोक्ति किसी अदालत के कठघरे में नहीं, हाईकमान की वर्किंग कमेटी में नहीं, बास के केबिन में नहीं, थाने की हवालात में नहीं, राखी का इंसाफ में नहीं बल्कि एक दबंग थानेदार को सरेआम अपनी अंगुलियों में थिरकाते हुए कर रही है।
गाने के दौरान मुन्नी जब भी बदनाम होती तो तेबारी हो जाती, तिवारी हो जाती, त्रिपाठी हो जाती। वो तीन बार पाठ करती… तेरे लिए, तेरे लिए, तेरे लिए…। डार्लिंग! तेरे लिए, तेरे लिए, तेरे लिए…। इस त्रिपाठ में एक अदभुत लास्य भाव की अभिव्यंजना है। ललित मिश्रित कामोद और हंसध्वनि की वर्णसंकर भैरवीआइट रागात्मकता है। इस तेबार में जहनी रूमानियत से भरपूर एक Commune Compelism है, जो ‘तेरे लिए’ को ‘तेरे लिएsm’ में Convert कर देता है, Conversion के लिए बाध्य करता है, अंतःप्रेरित करता है। ये जो तेरे लिए, तेरे लिए, तेरे लिए की बारंबारता से अभिप्रेरित ‘तेरेलिएsm’ है और इसके पीछे जो Compelism है, वो समर्पण का चरम बिंदु है, जिसकी मासूम चाहना है, उसके लिए सब कुछ खो बैठने का एवरेस्ट प्वाइंट है। ये जो तेरे लिए, तेरे लिए, तेरे लिए है, वो आग्रह, चाहत, समर्पण और उसी में विलीन हो जाने का compilation (कंपाइलेशन) है। ये जो तेरे लिए, तेरे लिए, तेरे लिए है, वो लास, रास और दास भाव की लाइफस्टाइल मैगजीन कवर स्टोरी का पैकेज प्लान है, जिसमें विजुअल प्रापर्टी सिर्फ और सिर्फ मुन्नी है। ये जो तेरे लिए, तेरे लिए, तेरे लिए का समुच्चय द्रुत आरोह है, वो निरंतर आरोहण की प्रक्रिया के बूते अभीष्ट की सिद्धि और उसे हासिल करने का अवरोहविहीन आध्यात्मिक उपक्रम है।
आखिर मुन्नी के पास है क्या? है, उसके पास मुन्नीत्व है। दरअसल वो अपने मुन्नीत्व के लिए बदनाम हुई है, हो रही है और आगे भी होती रहेगी। मुझे लगता है कि मुन्नी ने मुन्ना भाइयों के इस मुल्क में मुन्नीत्व के तौर पर एक नई विचारधारा का प्रतिपादन किया है। मुझे ये भी एहसास हो रहा है कि इस मुल्क में मुन्नीत्व के कायल होने वालों की तादाद लगातार बढ़ती जा रही है। त्वदीयं वस्तु गोविंदं की तरह मुन्नीत्व से प्रेरित लोग सिर्फ तेरे लिए, तेरे लिए, तेरे लिए की रंटत लगा रहे हैं। मैं कल्पना कर रहा हूं कि जिस देश में मेरे लिए, मेरे लिए, मेरे लिए की पुकार मची रहती थी, वहां तेरे लिए, तेरे लिए, तेरे लिए का मुन्नीत्व हिलोरें ले रहा है। लोग इसकी मांग कर रहे हैं कि तेरा तुझको अर्पण, क्या लागे मोरा, को नई राष्ट्र कविता का दर्जा दिया जाना चाहिए। नई दिल्ली स्टेशन से कनाट प्लेस जाने के लिए मेट्रो के एक कोच में घुसे तो देखा कि सीटें खाली पड़ी थीं और कई लोग फिर भी खड़े थे। मैने खड़े लोगों की ओर सवालिया निगाहों से देखा, उनमें से एक ने गले में पहना हुआ लाकेट मेरी आंखों के सामने कर दिया। मैंने देखा लाकेट में मुन्नी का सेवातुर चित्र था और नीचे सत्यं-शिवम-सुंदरम की तर्ज पर लिखा था, तेरे लिए-तेरे लिए-तेरे लिए।
दरअसल मुन्नी बदनाम नहीं, सतनाम हुई है।
लेखक विष्णु त्रिपाठी वरिष्ठ पत्रकार हैं और दैनिक जागरण, नोएडा में एसोसिएट एडिटर के रूप में कार्यरत हैं. उनका यह आलेख उनके ब्लाग से साभार लिया गया है.












shreedhar agnihotri
November 15, 2010 at 1:44 pm
वो सब मुझे परम साधिका मुन्नी के अनुगामी लग रहे थे। वो अस्तव्यस्त होते हुए भी नर्तन की तमाम मुद्राओं में अंतर्व्यस्त होते हुए मुन्यातुर हुए जा रहे थे, मुन्याकांक्षी हुए जा रहे थे, मुन्याभिलाषी हुए जा रहे थे। वो मुन्नी, जो निस्वार्थ कर्मयोगी है, दूसरों के लिए समर्पित है
वाह विष्णू जी .वाह.काफी समय बाद इस तरह की भाषा से सुसज्जित कुछ पढने को मिला. आपके लखनऊ छोडने के बाद तो इस तरह के शब्द न तो सुनाई पड़ते हैं न कहीं लिखे दिखाई पड़ते हैं
shreedhar agnihotri
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ajeetv
November 17, 2010 at 3:02 pm
अद्भुत है भाई।
विष्णु भाई । राग दरबारी जैसी उच्च कोटि की झलक मिलती है आपके आलेख में। कायल हो गया आपकी लेखनी का । अपना नंबर मुझे मेल करें तो मैं बात भी करना चाहता हूं। पत्रकात्रिता के पेशे में विभिन्न चैनलों में रहा, आजकल टोटल टीवी में काम करता हूं।
अजीत
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