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मुस्लिम समुदाय को भड़काने में लगे अजीज बर्नी!

अज़ीज़ बर्नी की कलम पर बहुत दिन तक सहारा ने प्रतिबंध लगाये रखा, पर पिछले दस पन्द्रह दिनों से वह फिर लिख रहे हैं और समाज को बांटने का काम कर रहे हैं. कल तो उन्होंने हद ही कर दी. आन्ध्र प्रदेश के किसी छोटे से शहर में हुई घटना को पहले पृष्ट पर न सिर्फ प्रकाशित किया बल्कि मुसलमानों की पवित्र पुस्तक के फटे हुए पृष्ट भी छाप दिए. इससे मुसलामानों में काफी आक्रोश पैदा हुआ.

अज़ीज़ बर्नी की कलम पर बहुत दिन तक सहारा ने प्रतिबंध लगाये रखा, पर पिछले दस पन्द्रह दिनों से वह फिर लिख रहे हैं और समाज को बांटने का काम कर रहे हैं. कल तो उन्होंने हद ही कर दी. आन्ध्र प्रदेश के किसी छोटे से शहर में हुई घटना को पहले पृष्ट पर न सिर्फ प्रकाशित किया बल्कि मुसलमानों की पवित्र पुस्तक के फटे हुए पृष्ट भी छाप दिए. इससे मुसलामानों में काफी आक्रोश पैदा हुआ.

उर्दू सहारा में काम करने वाले एक वरिष्‍ठ साथी ने बर्नी को पवित्र कुरान के फटे हुए पृष्ट ना छापने की सलाह भी दी लेकिन उन्‍होंने इसे अनसुना कर दिया. बर्नी की इस हरकत के विरोध में उर्दू अखबारों ने जम कर सहारा की आलोचना की है, विशेष कर जदीद खबर नाम के एक उर्दू दैनिक ने अज़ीज़ बर्नी को जम कर लताड़ा. अन्य उर्दू पत्रकार और मुसलमान भी काफी दुखी हैं. कई मुसलमानों ने अनेकों बार बर्नी से उन के आरएसएस से माफ़ी मांगने के बारे में सफाई भी मांगी लेकिन उन की ओर से कोई जवाब प्रकाशित नहीं हुआ. असल में जब से जागरण समूह का उर्दू अखबार इन्कलाब लांच हुआ है सहारा में हड़कंप है. हर दिन इन्‍कलाब में कुछ नया होने के कारण बर्नी इतना घबराये कि एक दिन उन्‍हों ने अपने अखबार में इन्कलाब की ही तारीफ लिख मारी. फिर इन्कलाब को पछाड़ने की कोशिश में मुसलमानों को भड़काने वाली खबरें प्रकाशित करना शुरू कर दी. इतना ही नहीं बाटला हॉउस की मुठभेड़ पर अपनी तीन वर्ष पुरानी रिपोर्ट छापना भी प्रारंभ कर दी.

सहारा हिंदी में इस मामले को लेकर काफी गुस्सा है और सहारा की छवि खराब किये जाने को ले कर हिंदी के पत्रकारों ने अपने संपादक तक बात पहुंचाई भी लेकिन बर्नी को कोई रोकने वाला नहीं है. सहारा उर्दू के लोग भी इस बात से आहत हैं और हिंदी पत्रकारों से अपने मन की बात कहते हैं, लेकिन बर्नी के डर से खुल कर ज़बान नहीं खोल पाते. इस बात पर भी सहारा के कर्मियों को ताज्जुब यह है कि स्‍वतंत्र मिश्र को बर्नी ने किस प्रकार किनारे लगा दिया? जब कि उपेन्द्र राय ने बर्नी के पर कतर रखे थे और उन के लिखने पर प्रतिबंध लगा दिया था. उपेन्द्र राय ने उर्दू अखबार पर काफी कंट्रोल किया था, लेकिन सुना है कि स्‍वतंत्र मिश्र ने उर्दू सहारा पर से नियंत्रण खो दिया है और बर्नी जी जो मन में आये लिख रहे हैं. सुना है उन्होंने सहारा प्रबंधन को बताया है कि सहारा का जो सर्कुलेशन कम हुआ है उस का कारण यह था कि उन्होंने लिखना बंद कर दिया था, जब कि सहारा के सर्कुलेशन के कम होने का बड़ा कारण इन्कलाब का आना है.

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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0 Comments

  1. xyz

    October 11, 2011 at 2:21 pm

    shrimaan lekhk mohaday aapki jaankari kei lei batana chahta hun ki yeh urdu rashtriya sahara hi hai jisnei himmat dikhatei hue gopalgarh mei polce kei davara marei gayei muslmano ka samachar perkashit kya. iskei vipreet bharat ka koi bhi channel ya print media jo apnei ko sekular kehta hai is samachar ko perkashit kernei ki himmat nahi dikha saka. kyoki dawa kerna aur us per khara uterna alag alag baat hai. iskei baad rudr pur, partapgarh, behraich aur A.P. mei musalmano kei khilaf ki janei wali sazishon ko chanpna aur niyay ki guhar lagana kahan tak ghalat hai. zara pathko ko samjhaein. mei koi saharamei kaam nahi kerta hun lekin perta zaror hun. ab inqlaab ki baat: kisi akbar kei dwara dosrei akhbar ki tareef kernei sei koi chota nahi ho jata hai. yeh to uska barkpen hai. aur khud inqlaab jo hinsawadi aur communal minded political party ki kai so crore ki funding sei khula woh kya bataei ga aur kitna muxlim hiteshi hoga iska andaza bhi hai. inqlaab ki halat yeh hai ki abhi tak dainik jagran ki office sei chalnei wala yeh akhbar apni building per inqlaab ka board tak nahi tang saka hai usei der hai ki jo ginei chinei pathak usnei jorei hain kahin woh pathak bhi na naraz ho jain.

  2. prashant

    October 11, 2011 at 4:25 pm

    ye to kuchh bhi kar sakte hai. kahin aisa n ho ki inke likhne se log bhadak jaayen..

  3. सिकंदर हयात

    October 12, 2011 at 9:58 am

    1857 के बाद से ही जबसे नया जमाना आया तब से ही भारतीय उपमहादीप के हमारे अधिकतर मुस्लिम नेताओ रहनुमाओ लेखको के पास न तो कोई सोच हे न कोई विचार अगर कुछ हे तो सिर्फ हर वक्त शिकायतों का अम्बार और खुद को घोर पीड़ित देखने- दीखाने की अजीबो गरीब सनक. जबकि भारत में मुस्लिम न तो सिखो ईसाएयो बोधो आदि की तरह से 2 -4 % हे और ना हीं मुस्लिम कभी दलितों आदिवासियो की तरह दीन -हीन शोषित ही रहे हे . भारत में मुस्लिम 17 – 18 % हे और भारत में हर फिल्ड में काफी या ठीक ठाक पर्भाव रखते हे उनमे वेसे ही अमीर- गरीब, गुंडे दबंग असामाजिक तत्व crupt – शरीफ सीधे साधे इमानदार नेक , शोषक शोषित ,पूंजीपति lebour , वेसे ही हे जेसे बाकि भारत में.

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