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मेरा परेशान मन और ये दुष्‍ट दुनिया

मेरे लिए शराब छूना हराम है, लेकिन तेरी निगाह पिलाए तो क्या करूं? बड़ी मुद्दत के बाद एक खुले दिल के व्यक्ति का पटना आना हुआ था। नाम सबलोग जानते हैं… यही हैं यशवंत जी। भड़ास वाले। एक एसएमएस आया। उन्होंने लिखा था। मिलना चाहता हूं। उसमें होटल का एड्रेस भी था। मैं नहीं मिल सका। मुजफ्फरपुर में था। उपर से मेरे भाई की तबीयत भी खराब थी। खैर… जाने दिजिए। मेरा मन भी आजकल बड़ा परेशान रहता है। डाक्टर से दिखाया। उनका कहना था कि मन आपका बहुत इनोसेंटिया रहता है। ई ठीक नहीं है।

मेरे लिए शराब छूना हराम है, लेकिन तेरी निगाह पिलाए तो क्या करूं? बड़ी मुद्दत के बाद एक खुले दिल के व्यक्ति का पटना आना हुआ था। नाम सबलोग जानते हैं… यही हैं यशवंत जी। भड़ास वाले। एक एसएमएस आया। उन्होंने लिखा था। मिलना चाहता हूं। उसमें होटल का एड्रेस भी था। मैं नहीं मिल सका। मुजफ्फरपुर में था। उपर से मेरे भाई की तबीयत भी खराब थी। खैर… जाने दिजिए। मेरा मन भी आजकल बड़ा परेशान रहता है। डाक्टर से दिखाया। उनका कहना था कि मन आपका बहुत इनोसेंटिया रहता है। ई ठीक नहीं है।

डा. बिनायक सेन की गिरफ्तारी के बाद से लगता है सेवा करना भी जुर्म है। खासकर इस देश में। समाज, देश, सरकार सभी चुप हैं। एक दूसरे का मुंह ताक रहे हैं। कौन बोले। कौन आवाज उठाए। गाहे बगाहे हंस में। हिन्दुस्तान अखबार के किसी कालम में। महाश्वेता देवी जैसे लोग कुछ लिख बोल लेते हैं। अपने पास तो वैसी कलम भी नहीं। न वैसा शब्दों का सानिध्य है। कैसे बताएं। सोमालिया के उस फोटोग्राफर की याद आती है। जिसने एक बच्चे की तस्वीर खींची थी। उस तस्वीर के लिए उसे पुलिंत्जर पुरस्कार मिला था। लेकिन पुरस्कार के तुरंत बाद किसी ने उससे पूछा कि यदि आप चाहते तो उस बच्चे को बचा सकते थे की नहीं? इतना सुनने के बाद और उस बच्चे के बारे में सोचकर उस फोटोग्राफर की मौत हो गई। सोमालिया के उस अकाल में उस बच्चे के उपर गिद्ध अपनी नजर गड़ाए था। बड़ी ही दर्दनाक तस्वीर थी।

अब तो लोग यह सोचकर मरते भी नहीं। मानवता, संवेदना, परकाया प्रवेश यह सारी बातें पुरानी हो गई। इसके बारे में कोई सुनना भी नहीं चाहता। यशवंत जी से मेरी बात पटना के गिलहरियों को लेकर शुरु हुई थी। आज भी तकरीबन जारी है। कभी कभार मुझे शक होता है कि वे बड़े स्वार्थी और नीच किस्म के इंसान होंगे। लेकिन मेरा शक और सोचना सही नहीं है। पटना के उस कार्यक्रम में, जिसमें वे भाग लेने आए थे। मेरा एक मित्र भी गया था। उज्ज्‍वल नाम है उसका। वह यशवंत जी से मिला। उसने मुझे बताया कि… अरे यार यशवंत तुझे बहुत याद कर रहे थे। यह भी कह रहे थे कि आशुतोष को मैंने कितनी बार दिल्ली बुलाया। लेकिन वो आता ही नहीं। यह सुनकर मुझे झटका लगा। मेरे मन ने कहा यशवंत सिर्फ ठरकी बनकर ही रात में फोन नहीं करते हैं। मेरे लिए सोचते भी हैं।

बहरहाल… पटना ही नहीं किसी शहर में किसी काम के प्रोफेशनल को खोजना आसान है। लेकिन इंसान बड़ी मुश्किल से मिलते हैं। हाल में दो घंटे के लिए मेरा पटना जाना हुआ था। पहुंच गया पीपल के पेड़ के नीचे। बुलाने लगा गिलहरियों को। कन्हाई राय चाय वाले ने कहा… अरे सर आपके देखादेखी बहुत सारे लोग अब रोटी, मक्का, चन्ना और अपने टिफिन से कुछ-कुछ निकालकर खिलाने लगे हैं। तब मैंने उनसे कहा। इसका मतलब राय जी हमको ई सब भूल गई का?

बेचारे हंसने  लगे। उसके बाद मैने बिस्कुट लिया और आवाज लगाई। यह क्या छह महीने बाद भी आवाज और मेरे शरीर की सुगंध उनको पता है। सभी दौड़ी चली आईं। उसके बाद पता चला कि मंटू जी जो छोटी सी चौकी पर पान दुकान चलाते हैं। उनके बेटे का इंजीनियरिंग में नामांकन हो गया है। खुशखबरी में गोल्ड फ्लैक चला। एक अनजाने से शहर में किसी के द्वारा की गई छोटी सी पहल कितने लोगों को प्रभावित करती है। यह गिलहरियों के मामले में सीखा जा सकता है।

प्रभात खबर के हरिवंश जी आज भी कहते हैं कि मैं आपके साथ गिलहरियों को देखना चाहता हूं। लेकिन बिजी आदमी हैं। कभी आए नहीं। यशवंत जी भी अब उसी श्रेणी में हैं। इनलोगों का समय अब देश और समाज के लिए बना है। अच्छी बात है समय देना भी चाहिए। एक साल पहले इन्हीं गिलहरियों की वजह से मैनें स्टेट बैंक के सहयोग से प्याउ खुलवाया था। लगभग कई लाख लोगों ने गर्मी में उस प्याउं से अपनी प्यास बुझाई। हाल में पूर्णियां के विधायक की हत्या के बाद वहां अपने पैसे से एक छोटा सा अखबार निकालने वाले पत्रकार नवलेश की गिरफ्तारी हो गई। क्योंकि झूठे, मक्कारों, चापलूसो, इंटरनेशनल स्तर के स्वार्थी किस्म के तत्वों के बीच एक सच का होना किसी को बर्दास्‍त नहीं होता। बेचारे को पुलिस ने पकड़ लिया।

इसे लेकर मुजफ्फरपुर में कुछ बुद्धिजीवी पत्रकारों और सांस्कृतिकर्मियों और रंगकर्मियों ने एक कार्यक्रम का आयोजन किया। नवलेश की गिरफ्तारी के बहाने कुछ सुलगते सवाल। साथी अल्टरनेटिव मीडिया की ओर से आयोजित इस कार्यक्रम में मुझे भी बुलाया गया था। दैनिक जागरण के वरिष्ठ पत्रकार और दरभंगा के कुश्शेवर स्थान से तहलका में विशेष रिपोर्टिंग कर चुके संजय झा भी वहां मौजूद थे।

सवाल यही उठा कि विकास की पटरी पर दौड़ रही नीतीश बाबू की सरकार जब चुनाव लड़ रही थी। उस वक्त चुनावी सभा में नीतीश जी मंच पर उस विधायक को चढ़ने नहीं दे रहे थे। क्योंकि वह अपने इलाके में बदनाम थे। और यही सच्ची बात एक पत्रकार ने लिख दी तो क्या गलत हो गया। खैर… अब सच और सच्चाई, ईमानदारी और कर्तव्‍य जैसे शब्द समाप्त हो चले हैं। लेकिन यह शब्द अभी भी जिंदा हैं सिर्फ जानवरों में, इंसानों में नहीं… जैसे मेरी गिलहरियां।

आशुतोष बिहार के पत्रकार हैं. ईटीवी, मौर्य समेत कई चैनलों में काम कर चुके हैं.

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