लगता है अमेरिका बहुत अच्छी जगह है और अमेरिका का महिलाओं के रूप-विन्यास पर बहुत सम्यक प्रभाव पड़ता है. यह भी लगने लगा है कि अमेरिका के आबोहवा में कुछ ऐसी ताजगी और खुशबू है जो महिलाओं के चित्त को आनंदित और प्रफुल्लित कर देता है, खास कर के तब जब उनके पति उनके साथ ना चिपके पड़े हों.
एक और बात जो मुझे अमेरिका के बारे में महसूस हो रही है कि वहाँ सांवले लोगों के रंग में भी सुधार आता है, शायद कभी-कभी तो तत्काल ही. जैसा हम लोग पुलिस विभाग में हर बात में कहते और लिखते हैं-“तत्काल प्रभाव से.” इसके अलावा अंग्रेजी भाषा में लगातार बतियाना भी अमेरिका सिखा देता है. अगर ऐसा है तब तो मुझे लगता है कि हर “भले” पुरुष को एक बार अपनी पत्नी को अमेरिका अवश्य ही भेजना चाहिए और कम से कम मैं तो ऐसा ही सोच रहा हूँ. मैं आज तक अमेरिका गया नहीं हूँ, अतः इस सम्बन्ध में मेरा जो भी ज्ञान या निष्कर्ष है, वह अपनी आँखों-देखी पर आधारित नहीं हो कर मेरी पत्नी डॉ. नूतन पर आधारित है.
अब आप ही देखिये, मैं उन्हें कहते-कहते थक गया था कि अंग्रेजी आप ठीक-ठाक लिख लेती हैं पर बोलती क्यों नहीं. पर उन्होंने मेरी बात आज तक नहीं मानी थी. इस अमेरिका ने उन्हें आठ दिन में अंग्रेजी बोलना सिखा दिया. आज हालत यह हो गयी है कि जब मैं स्काईप पर उनसे बात करता हूँ तो कई बार वे अंग्रेजी छोड़ कर हिंदी पर उतरना ही पसंद नहीं करतीं, जैसे पैदाइशी अँगरेज़न हों.
इसके अलावा चेहरे की रंगत और चमक में भी अमेरिका ने व्यापक सुधार किया है, दुनिया भर के स्टाइल अलग से पैदा कर दिए हैं. मैं इस बात के लिए अमेरिका का खासा शुक्रगुजार हूँ. साथ ही हर पाठक से यह भी गुजारिश करता हूँ कि यदि आप भी अपनी पत्नी को एक ही दिन में मोडर्न बनाना चाहते हैं तो कुछ पैसे खर्च कीजिये, उन्हें अमेरिका भेजिए.
संयोग है मुझे पैसे नहीं लगे क्योंकि नूतन अमेरिकी सरकार के खर्चे पर वहाँ गयीं पर उनकी रंगत, नाजो-अंदाज़ और अंग्रेजियत से लगाव को देखने के बाद मैं अपने साथियों से यही कहूँगा कि यदि लाख-दो लाख खर्चा भी करना पड़े तो कत्तई बुरा नहीं है. लेकिन साथ ही यह भी ध्यान रहे कि आप भी साथ-साथ मत लग लीजियेगा, नहीं तो हिन्दुस्तानी श्रीमतीजी शायद अपनी हिंदुस्तानियत से बाहर निकलने से मना कर दें.
बस इतनी प्रार्थना करता हूँ कि नूतन की यह अंग्रेजियत अमेरिका भर ही नहीं रहे. ऐसा ना होता हो कि जैसे ही स्टेच्यू ऑफ लिबरटी को सलाम किया और अमेरिकी धरती छोड़ी कि सारी अंग्रेजियत फिर से पानी पीने चली जाए.




लेखक अमिताभ आईपीएस अधिकारी हैं. इन दिनों मेरठ में पदस्थ हैं.












jaatak
April 10, 2011 at 4:17 pm
“…..हर पाठक से यह भी गुजारिश करता हूँ कि यदि आप भी अपनी पत्नी को एक ही दिन में मोडर्न बनाना चाहते हैं तो कुछ पैसे खर्च कीजिये, उन्हें अमेरिका भेजिए.”
Sir, ur line mocks the love between us destitutes…..:(:(:(:(
मदन कुमार तिवारी
April 10, 2011 at 4:46 pm
लगता है नूतन जी की बहुत याद आ रही है । अच्छी बात है कुछ दिनों तक दुर रहने से प्यार में एक नवीनता आ जाती है । यह अच्छी बात है की अंग्रेजी बोलनी चाहिये लेकिन इसका उपयोग सिर्फ़ अंग्रेजीदां लोगो के साथ करे । हमारे यहां अक्सर अपने-आप को ज्यादा काबिल साबित करने के लिये इसका उपयोग किया जाता है । एक बात से तो मैं पुरी तरह सहमत हूं कि अकेले समस्या को फ़ेस करने से आत्मविश्वास बढता है । नूतन जी जब वापस आयेंगी तो उनके तेवर बदला हुआ है एक नये आत्मविश्वास और उर्जा से भरी हुई नूतन ठाकुर हमारे सामने होंगी । अमे्रिका में रह रहे भारतियों के बारे कहियेगा कुछ जानकारी ईकठ्ठी करके आयें। खासकर जो एक -दो पिढी ्से वहां बसे हुये हैं।
भारतीय नागरिक
April 10, 2011 at 6:50 pm
क्या गजब ढ़ा रहे हैं, मेरी श्रीमती जी ने सुन लिया तो फिर सारा बैंक बैलेंस गया…:D
rajiv
April 11, 2011 at 10:31 am
bhdas ko bhadas hi rhane do dayri na banao
दीपक श्रीवास्तव, गोरखपुर
April 11, 2011 at 12:05 pm
भईया लग रहा है कि भाभी की बहुत याद आ रही है आपको………… कोई बात नही जल्द ही आयेंगी परेशान मत होईयेगा………
m faisal khan(saharanpur)
April 11, 2011 at 2:11 pm
amitabh sir mujhe lagta hai ki aap bhabhi ke bina pareshan hain aur zahir baat hai ki aik achche pati ke sath aisa hota bhi hai.magar aap aise mashvare to mat den ki hamari bhi jaan par ban pade shukar hai ki ye mai akele hi padh raha hoon warna aap to bilkul hi ghar se nikalwane ke mood mai hain..m faisal khan(saharanpur)
रजनीश कुमार
April 14, 2011 at 3:27 pm
एक बात तो तय है कि यह सब सीन देखकर अमेरिका से जलन होने लगता है, क्या भारत में ऐसा कभी नहीं होगा !
Ajay Tiwari
April 14, 2011 at 4:15 pm
So nice to know that she is doing what ‘ While in Rome do as romens do.
talent is talent but get its recoginazation , identification as well as modification only away from home.
shahid parwez
April 14, 2011 at 5:04 pm
yayawari se vayakti mukt hota hai alpgyan se …….avsar prapt hota hai naye cheezo dekhne aur samajhne ka.achcha hai aapki pratikiriya sir.
Shailendra Singh
April 15, 2011 at 7:51 pm
Yaswant jee Ghar ki khbar kab se publish karne lage.?