
एनके सिंह
उनका कहना था कि 13 दिन से डिब्बा केवल अन्ना और आंदोलन दिखा रहा हैं, चौबीसो घंटे। उनका आरोप था कि इस देश में 20 लाख लोग भूखे सो जाते है तो मीडिया के कान पर जूं नहीं रेंगती लेकिन अन्ना 13 दिन से आंदोलन करते हैं तो इतना हंगामा बरपा। यह समझ में नहीं आया कि शरद यादव का ऐतराज किस बात पर था? उन्हें शायद तर्कशास्त्र के मूल सिद्धांत और कार्य-कारण संबंध की जानकारी नहीं है। अगर होती तो उनका अपना ही तर्क वाक्य मीडिया की वर्तमान भूमिका को सही सिद्ध करता है। क्यों इस डिब्बे को चौबीसों घंटे बगैर खाए–पिए उस ज़िम्मेदारी को निर्वहन करना पड़ा जो मूलरुप से शरद यादव जैसे राजनीतिक लोगों की ज़िम्मेदारी थी? 20 लाख लोग भूख सोते है तो इसका कारण मीडिया नहीं, बल्कि राजनीतिक वर्ग है। नीति मीडिया नहीं बनाती है सरकार और संसद बनाते हैं।
भारत का प्रजातंत्र एडवरसेरियल है। इसमें सत्ता पक्ष और विपक्ष मुद्दे पर जनता के सामने जाते है और एक–दूसरे को चुनौती देते हैं। शरद यादव अपने राजनीतिक जीवन में अधिकांशत: विपक्ष में रहे हैं और कुछ साल सत्ता में। कितनी बार उन्होंने भ्रष्टाचार, गरीबी, आर्थिक विषमता पर या ऐसे ही अन्य सामाजिक मसलों पर इतना व्यापक जनआंदोलन किया? दरअसल सुविधाभोगी राजनीतिक वर्ग ने यह सुनिश्चित किया कि उनका सुविधाभोगी जीवन निर्बाध चलता रहे और मुद्दे संसद के दहलीज पर जाकर दम तोड़ दें। ऐसे में जनता का राजनीतिक वर्ग से मोहभंग हो जाता है तो वह गैर राजनीतिक वर्ग, संस्थाओं और महापुरुषों की तरफ रुख करती है।
प्रजातंत्र में मीडिया की भूमिका से नाराज़ राजनीतिक वर्ग को शायद यह भी समझ में नहीं आ रहा है कि संविधान बनाने वाले महापुरुषों ने अनुच्छेद 19(1) में प्रावधान किया हैं – अभिव्यत्ति की स्वतंत्रता। उन्हें यह भी मालूम नहीं कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता रास्ता केवल विधानसभाओं और संसद के चुने हुए कुछ प्रतिनिधियों की तरफ से नहीं जाता बल्कि एक बड़ा रास्ता रैली, धरना-प्रर्दशन से भी होकर जाता है। और इस प्रक्रिया का शुमार प्रजातंत्र के मूल तत्वों में किया जाता है।
आज से कुछ समय पहले तक जब समाज इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर गैर जनउपयोगी कन्टेंट देने का का आरोप लगता था तब इस मीडिया ने इसको सकारात्मक तरीके से लिया। स्वनियंत्रण के प्रयास के तहत हमने रेगुलेटरी आथॉरिटी बनाई। संपादकों की एक संस्था ब्रॉडकास्ट एडिटर्स एसोसिएशन के रुप में आई और सभी संपादक चैनलों को और जनोपयोगी बनाने का सार्थक प्रयास कर रहे हैं।
तब आज किस बात पर ऐतराज है? क्या भ्रष्टाचार के खिलाफ हर जिले, हर शहर, हर प्रान्त में जनआंदोलन चल रहा हो तब हमें राखी सांवत का डांस दिखाना चाहिए था? क्या भारतीय मीडिया ने ऐलान किया था कि अगर शरद यादव सरीखे तथाकथित समाजवादी अन्ना के पहले या अन्ना के साथ एक समानांतर आंदोलन छेड़ें तो वह इसे कवरेज नहीं देगा? क्या मीडिया ने इस दौरान राजनीतिक वर्ग की बाईटें लेना बंद कर दिया था? क्या शरद यादव, लालू यादव या राहुल गांधी जब लोकतंत्र के लिए खतरा बता रहे थे तो क्या इन्हें इस डिब्बे ने नहीं दिखाया?
64 साल में राजनीतिक वर्ग ने अपने मूल कर्तव्य का पालन नहीं किया और सड़े सिस्टम के सहारे गरीबों का मांस नोच कर खाते रहे और दोषपूर्ण चुनाव व्यवस्था के ज़रिए ए.राजा और कलमाड़ी पैदा करते रहे, क्या इसमें भी मीडिया का दोष था? आज से कुछ वर्षों बाद जब भ्रष्टाचार से पनपे आंदोलन का विश्लेषण होगा, भारतीय मीडिया को विश्लेषक मानक के रूप में प्रस्तुत करेंगे। जहां तक इस डिब्बे को बंद करने का सवाल है शरद यादव यह भूल रहे है कि यह किसी राजनेता के एहसान का प्रतिफल नहीं है। यह भारतीय प्रजातंत्र का आपरिहार्य उत्पाद है और इसे बंद करना किसी भी संसद की ताकत से बाहर है। 13 दिन से ज्यादा चौबीसों घंटे आंदोलन दिखाने से मीडिया को आर्थिक नुकसान ही हुआ होगा। अन्ना हज़ारे कोई कॉर्पोरेट नहीं हैं जिन्हों ने विज्ञापन दिया और ना ही यह खबरें पेड न्यूज़ थीं, जिसके बारे में राजनीतिक वर्ग हंगामा खड़ा कर रहा है।
अगर यह आंदोलन गलत था, अगर मीडिया ने इसे अतिरंजित करके पेश किया तब क्यों झुकी पूरी संसद और क्यो नहीं किसी शरद यादव या किसी लालू यादव ने संसद से इस्तीफा दे दिया? तस्वीर का एक दूसरा पहलू देखिए। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने किसानों की ज़मीन अधिग्रहण के खिलाफ धरना दिया। देश के 32 ओ.बी वैन ने पूरे धरने को कवर किया। अंतिम दिन अलीगढ़ में केवल कुछ हज़ार आदमी ही जुट पाए। अगर मीडिया के कवर करने से जनआंदोलन बनता होता तो देश में राहुल गांधी का यह आंदोलन भी महज एक स्थानीय घटना ना बना होता बल्कि एक जनआंदोलन के रूप में खड़ा होता। राजनीतिक वर्ग ने जनता में अपनी विश्वसनीयता खो दी है जिसकी वजह से जनता गैर राजनीतिक संस्थाओं व व्यक्तियों को अपना रहनुमा मानने लगी है।
दरअसल पिछले कुछ वर्षों से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने अपने कर्तव्य को पूरी तरह पहचानते हुए एक सश्क्त भूमिका निभायी है इसमें दो राय नहीं है। विश्व के किसी भी प्रजातंत्र में एक स्टिंग ऑपरेशन के वजह से लगभग एक दर्जन सांसद एक झटके में नहीं निकाले गए। यह भारत की मीडिया ने ही संभव करके दिखाया है। निठारी में कंपकपाती ठंड में भारतीय मीडिया ही दिन-रात जनता को हकीकत से रूबरू कराता रहा जबकि पुलिस वाले भी ठंड ना बर्दाश्त करके अपनी ड्यूटी से गायब हो गए। मुंबई हमले और अयोध्या फैसले पर भारतीय मीडिया ने जिस शालीनता का परिचय दिया वह किसी से छिपा नहीं है। और यह सब करने में कहीं भी कोई कॉर्पोरेट इंट्रेस्ट नहीं था बल्कि कर्तव्य के प्रति निष्ठा थी।
आज जरूरत इस बात की है कि प्रजातंत्र की गुणवत्ता बेहतर करने के लिए राजनीतिक वर्ग अपने गरेबान में झांके और अपने को जनता के प्रति उपादेय बनाए, बजाय इसके कि भारतीय मीडिया पर नकेल डालने की कोशिश करे और वह भी इसलिए कि उसने एक सार्थक जनआंदोलन को जनता तक पहुंचाने का पुनीत कार्य किया है।
लेखक एनके सिंह वरिष्ठ पत्रकार, ब्रॉडकास्ट एडीटर्स एसोसिएशन के महासचिव और साधना न्यूज चैनल के एडिटर इन चीफ हैं. उनका यह लेख दैनिक भास्कर में छप चुका है. वहीं से साभार लेकर इसे प्रकाशित किया गया है.











Tarkeshwar Mishra
September 6, 2011 at 8:08 am
एन के सर,
सत-सत नमन! आप मेरे गुरुदेव हैं जिसका मुझे हमेशा गर्व रहा है. इस कलम तोड़ लेख का सचमुच कोई जवाब नहीं.
अखिलेश कुमार
September 6, 2011 at 8:46 am
सर शानदार लेख है मीडिया को कटघडे में खड़ा करने वाले नेताओं के मुंह पर करारा तमाचा है । इसी लिए हम गर्व से कहते है कि हमने अपने गुरु से वो सीखा है जो बहुत कम लोगों को नसीब होता है। ईमानदीरी से वो सब कुछ कह जाना जसके बाद कुछ नुकसान उठाना पड़े तो हम गुरेज नही करते ।
beeru maurya
September 6, 2011 at 10:14 am
bahut aacha laga n.k.bhaiya dahade rahiye ser lion ki tarh. aapne josh bhar diya.
navin rai
September 6, 2011 at 2:19 pm
सर, हमेशा आपकी लेखनी को भड़ास पर तलाशता हूँ, जरुर पढ़ता हूँ,सवाल ऐ है की हिंदुस्तान में नेतिकता की बात करने वाले और मीडिया को पानी पीकर कोसने वाले ऐ राजनेता राजनीति में देश सेवा या जन सेवा की मंशा से नहीं आते, इनका मकसद ही होता है एन तेन प्रकाड़ाने सत्ता की मलाई कहना. सरद यादव इससे अछूते नहीं है. उनकी नियत का पता संसद में उनके भाषण से लगता है वो गंभीर विषय पर बोलने वाले राजनेता काम मसखरा ज्यादा दिखे. लालू के अंदाज और वनस मोर की ध्वनि लगाने वाले नेता असली मुद्दे से लोगो का ध्यान हटाने की कवायद ज्यादा करते दिखे. जाहिर सी बात है जब मकसद में कामयाबी नहीं मिलाती है तो खीज तो निकलती है. जाहिर सी बात है उनकी खीज की खुजली मिटाने और मुंहतोड़ जबाब देने के लिए आप की तरह कुछ लोग भी है जो बेवाक लिखते है तो हमारी तरह कुछ नई पीढ़ी के लोग भी है जो उसपर प्रतिक्रिया ही नहीं कुछ कर गुजरने की सोच लेकर चलते है अन्ना के आन्दोलन में नई पीढ़ी की भागीदारी को देख इस बात का अंदाजा लगाया जा सकता है. हालाकिं मंजिल अभी दूर है लेकिन हर किसी का वक़्त होता है. फ़िलहाल शरद यादव और लालू की तरह लोग भले ही अपनी पीठ थपथपा लें हिसाब तो उनको भी देना होगा फ़िलहाल जबाब तो उनको करार मिला है.
बधाई हो.
munger se sunil gupta
September 6, 2011 at 3:44 pm
आपका यह लेख भारतीय नेताओं के मुह पर तमाचा है.वाकई इन तथ्यों को जानकर गर्वित हुआ की मिडिया का रोल अच्छा रहा और इस रोल को इतिहास के स्वर्णिम अक्षरों में लिखा जायेगा.मुंगेर से सुनील गुप्ता [आपका regular pathak]
ashish gupta
September 6, 2011 at 6:24 pm
kayal ho gaya apki lekhni ka ……..
योगेन्द्र सिँह जादौन
September 7, 2011 at 5:46 am
हम देख रहे है सारा देश समझ रहा कि विपक्ष की एक मजबूत भूमिका मीडिया ही निभा रहा है मीडिया ने ही नेताओँ के मुखौटे नोच कर उनके असली चेहरे दिखाये और उनको नंगा किया है जहाँ तक मेरा मत है कि सारे नेता व कुछ सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना की ख्याति से ईष्या वश अन्ना व मीडिया की बुराई कर अपने लिये गढ्ढे खोद रहे है ।
योगेन्द्र सिँह जादौन
September 7, 2011 at 5:59 am
देश समझ रहा कि विपक्ष की एक मजबूत भूमिका मीडिया ही निभा रहा है मीडिया ने ही नेताओँ के मुखौटे नोच कर उनके असली चेहरे दिखाये और उनको नंगा किया है सारे नेता व कुछ सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना की ख्याति
से ईर्ष्या वश अन्ना व मीडिया की बुराई कर अपने लिये गढ्ढे खोद रहे हैँ ।
vikas
September 7, 2011 at 6:00 am
You are wrong at one place surely Mr. Singh. Many from the media went overboard during the coverage of ‘Mumbai Hamla’…this is on record that akas of terrorists were watching live coverage and guiding them. How can you call this ‘shaalinata’? And I am sure this is not the first and last such instance.
anurag shukla
September 7, 2011 at 6:38 am
शरद यादव जैसे लोग सिर्फ इस डिब्बे पर अपनी शक्ल देखकर ही खुश होते है…आज तक देश के इस सबसे सशक्त माध्यम को डिब्बा कह कर अपने सामान्य ज्ञान का परिचय दे रहे है….इनके अनर्गल प्रलाप को दिखाये तो अच्छा मुद्दे उठाने वाले अन्ना को उठाये तो डिब्बा…दरअसल इलेक्ट्रानिक मीडिया को डिब्बा कह कर ये अपनी झुंझलाहट दिखा रहे है….64 साल से सिर्फ जुबानी जमाखर्च कर रहे नेता अब मुद्दे उठाने वाले मीडिया को डिब्बा ही तो कहेंगे…आपका जवाब शायद उनका डब्बागोल कर देगा बधाई हो सर….
नरेन्दर
September 7, 2011 at 12:55 pm
शरद यादव को आज तक इस लेख से करारा कोई जबाब नही मिला होगा। सर आपने इस फिजूल नेता को आईना दिखाया उसके लिए धन्यवाद। एक बात बहुत अच्छी लगी कि सुविधाभोगी राजनीतिक वर्ग ने ये सुनिश्चित कर लिया है कि उनका सुविधा सम्पन्न जीवन निर्वाध चलता रहे और जनता की समस्यायें संसद की दहलीज पर जाकर दम तोड़ है। सर, यह आज की राजनीति का बहुत बड़ा सत्य है। तभी तो हरेक राजनीतिज्ञ अपने बेटे, बेटी, दामाद, बहू, पत्नी और रिश्तेदारों को राजनीति में उतार कर जनता के ऊपर अपनी विरासत थोप देता है और अपना भविष्य सुनिश्चित कर लेता है। लेकिन आज डिग्रियों के पुलिंदे होने के बाबजूद हम जैसे नौजवानों की जिंदगी अपनी जीवन के लिए एक स्थायित्व तलाशने में गुजर जाती है। सच में ये सारे नेता जनता का बेबकूफ बनाते है। मैने भी भट्टा पारसौल में राहुल को कई दिन कवर किया। भीड़ नही थी और जिस गाँव में वह जाते थे, पूरे गाँववाले भी उनके पास नही आते थे। बस मीडिया के कैमरो ने ही उनके आंदोलन में हवा भरी थी, अलीगढ़ की रैली के लिए बड़ी तैयारियां की गई, लेकिन अलीगढ़ में वह हवा फुस्स हो गई। आज कहाँ है राहुल गांधी। क्या दे दिया उन्होने भट्टा-पारसौल के किसानों को। किसानों के लिए जैसी मायावती वैसे ही राहुल बाबा। एक सांपनाथ तो दूसरे नागनाथ। वोटों की खातिर रोटियां सेंकी और निकल लिए। अन्ना के अनशन के बाद भले ही कोई कानून ना बना हो, लेकिन जनता इन नेताओं को जरूर समझ गई है। बुलंदशहर में एक युवा नेता ने अन्ना के अनशन पर बैठने के बाद उनका पुतला फूँकने की कोशिश की तो जान के लाले पड़ गये। नेताजी शायद अभी भी शहर के बाहर है। इस तरह के बहुत से उदाहरण है और आने वाले चुनावों में इन नेताओं को हम जैसे नौजवान जबाब देने के लिए बैठे है। बड़ा बुरा लगा नेताओं को जो उन्हें ओमपुरी ने गँवार, अनपढ़ और नालायक कह दिया। अरे ये ऐसे ही है और अगर नही है तो जनता के लिए किये गये कामों को हिसाब दें। बुलंदशहर के सांसद रहे कल्याणसिंह ने अपनी सांसद निधि से करोड़ों रूपये के काम केवल उन निजी कालोनियों में करवाये है जो उनके मुँहलगे नेताओं और दलालों की थी। उनके वोटों की विरासत पर अनपढ़ अगूँठाटेक कमलेश वाल्मिकी संसद तक पहुँच गये। जिले की समस्याऐं तो चूल्हे में गई, मैने उनके संसद में अनुभवों के बारे में पूछा तो बोले- जयाप्रदा के पास बैठा था, क्या बताऊँ आज तक इतनी सुन्दर औरत ही नही देखी। ऐसे है हमारे सांसद…अब हम गँवार को गँवार नही तो क्या विद्वान कहेगें।
आने वाले समय में भारत और भारत की जनता का भविष्य बहुत उज्जवल है और इन नेताओं के बुरे दिन शुरू हो गये है। जब ये जनता के बीच जायेगें तो सिरफिरे इनमें जूते मारेगे और बुद्धिजीवी सवालों की झड़ी लगा देगें। इनके लिए अच्छा होगा कि वक्त रहते सुधरकर जनता के बन जाये।
जय हिन्द
Iknowtruth
September 9, 2011 at 2:06 pm
N K singh jo bol rahe usi me apni pol bhi khol rahe hai.. reporter kapkapati thand mein ya ghanghor barish me isliye bhi majbooran khada hota hai kyonki aap jaise tathakathit brahma jaise editor unki job par har waqt talwar latkae rehte hai. nk singh apne gireban me bhi kabhi jhako. tumahe BEA ne aj tak kya bada kaam kiya hai.. ibn7 ke lucknow reporter par hamala mamle mein tumne kya jaanch ki.. kisko saza hui ye bhi to batao..
प्रशान्त
September 9, 2011 at 5:15 pm
दर-असल मीडिया उनसे मैनेज नहीं हो सकी..;D