विख्यात साहित्यकार राजेंद्र यादव के जन्मदिन पर ली गई एक तस्वीर. ढोल उर्फ ढोलक पर स्त्री शब्द लिखा होना और इसे राजेंद्र यादव का बजाना कई अर्थों में विवाद को जन्म देने वाला है. लेकिन जमाना ऐसा है कि ”जो है नाम वाला वही बदनाम है”. राजेंद्र यादव की इस हरकत पर क्या कहा जाए!













hindi wala
September 21, 2010 at 6:44 pm
राजेंद्र यादव के पीछे जो शख्स खड़े दिख रहे हैं और बजाने में राजेंद्र यादव का साथ दे रहे हैं, उनका नाम भारत भारद्वाज है. ये भारत भारद्वाज ही इस सीन के सूत्रधार हैं.
hindi wala
September 21, 2010 at 6:46 pm
अबे ससुरे, बुढापा में तो बजाना बंद कर दो…………..
vivek kumar
September 21, 2010 at 6:47 pm
lagta hai bhadas ko bhi tv waalo ka roag lag gaya hai. ignore karna chahiye en faaltu cheejo ko
arpit bisen
September 21, 2010 at 6:50 pm
dhny des apna… ye ek baja raha hai, dusri dekh rahi hai… ;D;);)
ESME KYA HAI?
September 21, 2010 at 6:57 pm
AAP LOG NAHI SAMJH PAYENGE RYADAV KO. EK SITE PE RAJENDRA JI KE BARE MEI CHHAPI EK MAHILA JOURNALIST KE VICHAR PADHIYE…
पहली बार कब पढ़ा था राजेंद्र यादव को.. ..? लगभग तीस साल पहले. उस समय की दूसरी किशोरियों की तरह साहित्य पढ़ने की शुरुआत में ही दो महत्वपूर्ण उपन्यास से रूबरू हुई धर्मवीर भारती का ‘गुनाहों का देवता’ और राजेंद्र यादव का ‘सारा आकाश’. ‘गुनाहों का देवता’ ने मुझे उतना प्रभावित नहीं किया, जितना ‘सारा आकाश’ ने किया था. सुधा और चंदर खास कर सुधा का चरित्र जरूरत से ज्यादा कमजोर लगा. बीच में चंदर और नर्स का प्रसंग भी मुझे अरुचिकर लगा. लेकिन ‘सारा आकाश’ की नायिका के संघर्ष से मैं अपने को जोड़ पाई. भाषा, शैली, सब कुछ सहज और सरल.
इसके कुछ सालों बाद जब धर्मयुग से जुड़ी, तो सारा आकाश और राजेंद्र यादव के जिक्र पर एक सीनियर कलीग ने टिप्पणी की, “ उपन्यास अच्छा लगा, तो वहीं तक रखो. कभी लेखक से मिलने की इच्छा मत करना. यादव जी भारती जी नहीं हैं.” भारती जी मेरे बॉस थे, संपादक थे. हालांकि जिस समय मैं धर्मयुग से जुड़ी (1985 में), वे दूसरों के हिसाब से काफी बदल चुके थे. हंसते भी थे और अपने स्टाफ को ब्रीदिंग स्पेस भी देते थे. लेकिन कभी मुझे उनके साथ यह नहीं लगा कि मैं सहज हो कर गपियाऊं या उनसे चर्चा करूं. दूरियां थीं, काफी थीं. (मैं कुछ ज्यादा अपरिपक्व थी और वे उम्र और पद के हिसाब से ज्यादा परिपक्व).
सालों बाद मुंबई से दिल्ली आना और बसना हुआ. राजेंद्र यादव के जिक्र पर कई लोगों से सुनने को मिला, “रसिया आदमी हैं. अगर आप अपने को बचा सकें, तो जरूर जाइए और मिलिए.” हंस की गोष्ठियों में दूर से उन्हें देखा, हमेशा युवा स्त्रियों से घिरे, हंसते-ठहाके लगाते हुए यादव जी. कभी हिम्मत नहीं हुई पास जाने की, बात करने की. इस बीच उनसे बिना मिले ही हंस में दो कहानियां छपीं. उसी दौरान धीरेंद्र अस्थाना और उनकी पत्नी ललिता भाभी के साथ पहली बार राजेंद्र यादव से मिलना हुआ. धीरेंद्र जी ने परिचय कराया, तो राजेंद्र जी ने सहजता से कहा, “तो तुम हो जयंती! ”
उस दिन एक दीवार टूट गई. मेरे सामने जो था वो एक पारदर्शी व्यक्ति था. सहज और सरल. मेरी कल्पना से परे. लगा कि एक्ट कर रहे हैं. लेकिन सबके साथ वे ऐसे ही थे. फिर भी एक संकोच था. जो टूटा कुछ सालों बाद, जब मैं गीताश्री, अमृता, कमलेश और असीमा के साथ उनसे मिलने लगी, अकसर उनके घर पर हम सब धमाल मचाने पहुंचने लगे. राजेंद्र जी खुश होते थे, हंसते थे, तमाम विषयों पर खुल कर जिक्र करते थे. हमें वे कहते गुंडियां- बड़ी गुंडी, मंझली गुंडी और छोटी गुंडी. अपनी असुरक्षाओं का जिक्र करते, जिंदगी में अकेलेपन को लेकर अपना पक्ष बताते. लेकिन अधिकतर वे खुश रहते, ठहाके लगाते.
इन सबके बीच वो राजेंद्र यादव कहां है, जिनके बारे में सालों पहले मुझे सावधान किया गया था? ये तो एक ऐसा शख्स था, जिसके सामने हम अपनी तरह से रह सकते थे, वो कह सकते थे जो ना जाने कब से हमारे अंदर था और बाहर निकल नहीं पा रहा था. क्या हम स्त्रियां ऐसे पुरुष को नहीं जानना चाहतीं, जो उनका चेहरा पढ़ ले, जिनके सामने वे अपना स्त्री होना भूल जाए और सिर्फ यह याद रखे कि वो एक जीती-जागती मनुष्य भी है आकांक्षाओं और इच्छाओं से लबालब.
हमारे गैंग के कुछ सदस्यों को राजेंद्र यादव के नॉनवेज जोक्स पर एतराज है. लेकिन एंजाय सभी करते हैं. एसएमएस सभी शेअर करते हैं. हर साल राजेंद्र यादव के जन्मदिन की पार्टी में कई दिलचस्प किरदारों से मुलाकातें, बहस, शेअरिंग, गैंग में शामिल होते नए सदस्य-कड़ी से कड़ी जुड़ रही है. मैं हर बार जान रही हूं राजेंद्र यादव के व्यक्तित्व के नए पहलुओं को. वाकई यह व्यक्ति औरों से अलग है. अपने ऊपर उम्र को हावी होने नहीं देता. कभी यह अहसास नहीं होने देता कि वह ‘ द राजेंद्र यादव’ है. हां, इसका नुकसान भी है. जब कोई नया व्यक्ति उनसे मिलता है और उनके आसपास एक खास किस्म के ‘ऑरा’ की अपेक्षा करता है, तो उसे निराश होना पड़ता है.
उनसे कई बार कई विषयों पर बात हुई. गंभीर और अगंभीर बातें. फिजूल की बहसें भी हुईं. उनकी टिप्पणियां हर बार आपको अच्छी लगें, यह भी जरूरी नहीं. लेकिन मित्रवत बातचीत के अलावा एक औपचारिक इंटरव्यू लेने की बात जब आई, तो तय हुआ कि हम साहित्य से इतर ही बात करेंगे. ऐसे राजेंद्र यादव के बारे में बात करेंगे, जो अभी भी कुछ स्त्रियों को ‘डराता’ है, एक बौध्दिक वर्ग को ‘छिछोरा’ लगता है और हंस के पाठकों और एक बड़े प्रशंसक वर्ग को ‘अभिभूत’ करता है.
CHANDAN SINGH
September 22, 2010 at 7:21 am
NAME BARE OR KAM V BARDE YE YADAV J KUCHH JAYADA HI NARIVAD KO EJAT DETE HAI BUT HANS KE PANNO MAI….. LEKIN YE ENKE LIE KOI BARI BAT NAHI HAI….. YE TO ESSE V ADHIK APNE HANS KE EDITORIAL MAI LIKHTE HAI OR READER KO ACHHA LAGTA HAI…….
EK KOI NAI BAT NAHI HAI JAB KISI ISTRI KO APMANIT KIYA JATA HAI OR DUSRI ESTRI DEKHTI HAI….. YE SARE KE SARE EK HI DAL KE KABUTARI HAI……
OR VIVEK AP KO L AGTA HAI SAMAJIK SAROOKAR NAHI HAI……….. ETNI BARI BAT KO AP FALTU KA KAHTE HAI….
OR
rahul
September 22, 2010 at 6:13 am
bade rasiya hai chcha