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राज एक्सप्रेस में प्रिंट लाइन में नाम जाने का मतलब है- … न घर का न घाट का

किसी भी अखबार का संपादक अखबार का चेहरा-मोहरा होता है। संपादक के नाम से अखबार जाता है और लोग संपादक के नाम पर ही भरोसा कर तय करते हैं कि अखबार कितना निष्पक्ष या किस धारा में बहने वाला होगा। लेकिन आजकल मध्यप्रदेश के चार महानगरों से प्रकाशित होने वाले राज एक्सप्रेस नामक अखबार में संपादक नाम की जितनी लानत-मलानत की जा रही है,  उसे देखकर तो यही लगता है कि संपादक कोई भी बन सकता है और कभी भी उस पर गाज गिर सकती है।

किसी भी अखबार का संपादक अखबार का चेहरा-मोहरा होता है। संपादक के नाम से अखबार जाता है और लोग संपादक के नाम पर ही भरोसा कर तय करते हैं कि अखबार कितना निष्पक्ष या किस धारा में बहने वाला होगा। लेकिन आजकल मध्यप्रदेश के चार महानगरों से प्रकाशित होने वाले राज एक्सप्रेस नामक अखबार में संपादक नाम की जितनी लानत-मलानत की जा रही है,  उसे देखकर तो यही लगता है कि संपादक कोई भी बन सकता है और कभी भी उस पर गाज गिर सकती है।

गाज गिरने के बाद प्रिंट लाइन में संपादक के रूप में नाम जाने का सुख भोग चुका पत्रकार फिर इस लायक नहीं रहता कि वह किसी अखबार में रिपोर्टर की भी नौकरी पा सके। अगर राज एक्सप्रेस के 3 जुलाई के ग्वालियर से प्रकाशित होने वाले संस्करण पर नजर डालें तो पता चलता है कि इसमें चार संपादक हैं। प्रधान संपादक हैं मालिक खुद अरुण सहलोत। संपादक हैं नवीन मिश्रा। सह संपादक हैं संदीप मेहता और स्थानीय संपादक हैं अरविंद शीले। शीले के नाम के पीछे स्टॉर भी चिपका है। यानी समाचारों के चयन के लिए उत्तरदायी भी वही होंगे। नवीन मिश्रा का नाम पहली बार गया है। संदीप मेहता की जड़ें मालिक के चूल्हें तक हैं। शीले को पहली बार स्थानीय संपादक बनाया गया है।

अखबारी जगत में काम करने वाले लोग इस अबूझ पहेली का हल तलाशने में लगे हैं कि भला सह संपादक नाम की क्या बला होती है जो प्रिंट लाइन में नाम पा जाए। ग्वालियर संस्करण में अभी तक एक दर्जन लोगों के नाम जा चुके हैं। ग्वालियर में संस्करण का तीसरा और मध्यप्रदेश में पैदा हुए पांच साल हुए हैं। कभी रवींद्र जैन का ग्वालियर संस्करण में स्थानीय संपादक के रूप में नाम जाता है। वो अपने आपको अखबार का समूह संपादक कहते थे। उनकी छुट्टी के बाद यह सुख भोगने का मौका मिला प्रभु मिश्रा को। वे जबलपुर के संस्करण में पहले प्रिंट लाइन में थे। ग्वालियर के संपादक और बन गए। लेकिन सिर्फ तीन दिन के लिए। तीसरे ही दिन उनकी मालिक से अनबन हुई और वे भाग निकले इस्तीफा देकर। फिर अखबार के स्थानीय संपादक बने संदीप मेहता। पांच दिन बाद ही वे सह संपादक बन गए और 3 जुलाई को एक नई प्रिंट लाइन अखबार में देखने को मिल गई। कहने को तो अब लोग यह भी कहने लगे हैं कि राज एक्सप्रेस संपादक लीलने वाला अखबार है। इसमें प्रिंट लाइन में नाम जाने का मतलब है ..न….. न घाट का।

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0 Comments

  1. abhishek

    July 3, 2011 at 6:36 pm

    bhaiyaa inhe to 200 per copy securities de do aur ek mahine ki adwance securities phir uskey baad bajne do apney paison ki band.jai raaj expreess jai arun sahlot. jai satish pimpley

  2. ramesh takur

    July 4, 2011 at 7:25 am

    ye raj h ise raj hi rahne do koun samjay arun sehlot ko

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