नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने कार्पोरेट लाबिस्ट नीरा राडिया के नेताओं, पत्रकारों और कार्पोरेट दिग्गजों से बातचीत के सभी टेपों की विषय वस्तु का खुलासा करने की मांग करने वाली एक जनहित याचिका पर केंद्र सरकार से प्रतिक्रिया मांगी है। इन सभी फोन काल्स को टैप सरकार ने किए थे।
न्यायमूर्ति जीएस सिंघवी और न्यायमूर्ति एस एस निज्झर ने सोमवार को इस बारे में केंद्र को नोटिस जारी करते हुए मामले की सुनवाई दो फरवरी तक के लिए स्थगित कर दी। कोर्ट ने यह आदेश ‘सेंटर फार पब्लिक इंट्रस्ट लिटिगेशन’ की याचिका पर दिया है। इस संस्था ने नेताओं, पत्रकारों और कार्पोरेट दिग्गजों समेत विभिन्न लोगों से नीरा की बातचीत के 5,800 टेपों का खुलासा करने की मांग की थी। याचिका में कहा गया था कि इन टेपों का खुलासा करना जनहित में है क्योंकि इससे विभिन्न सरकारी विभागों में भ्रष्टाचार का खुलासा हो सकता है। सरकार ने वित्त मंत्रालय में एक शिकायत के बाद नीरा की फोन पर बातचीत टैप की थी।
शिकायत में कहा गया था कि वह कथित तौर पर राष्ट्रविरोधी गतिविधियों में लिप्त है। याचिकाकर्ताओं ने अपनी याचिका में कहा है कि इन टेपों की पूरी सामग्री का खुलासा इसलिए भी जनहित में है क्योंकि इससे नेताओं, नौकरशाहों, कॉरपोरेट दिग्गजों, व्यावसायिक घरानों और यहां तक कि पत्रकारों के बीच चल रहे भ्रष्टाचार के पूरे चक्र का खुलासा हो सकता है। उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया है कि नीरा से जुड़े टेपों को सार्वजनिक करने से संभवत: ऊंचे स्थानों पर जमे भ्रष्टाचार की परतें खुलेंगी।
नीरा की विभिन्न लोगों से बातचीत रिकॉर्ड करने के दौरान सरकार ने नीरा की उद्योगपति रतन टाटा से बातचीत भी रिकॉर्ड की थी। टाटा ने इसके बाद अदालत में याचिका दायर करते हुए मांग की थी कि नीरा के साथ उनकी बातचीत के कुछ हिस्से लीक होने के मामले में सरकार को जांच करने के आदेश दिए जाएं। टाटा ने नीरा के साथ अपनी बातचीत लीक होने के खिलाफ अदालत में दस्तक देते हुए कहा था कि यह उनकी निजता के अधिकार का उल्लंघन है, जो सम्मान से जीने के उनके अधिकार से जुड़ा है।
टाटा ने न्यायालय में दाखिल अपने हलफनामे में कहा था, ‘याचिकाकर्ता [टाटा] इस बात को लेकर गंभीर रूप से चिंतित हैं कि इस तरह की चुराई हुई सामग्री के मुक्त वितरण, इसे वापस लेने के लिए कोई कदम उठाए बिना और इसके लीक होने का स्रोत जाने बिना इसके प्रकाशन की अनुमति देने में सरकार ने लापरवाही भरा रवैया रखा।’ टाटा ने टेप लीक होने की जांच करने की मांग करते हुए याचिका दायर की थी, जिसका केंद्र ने जवाब दिया था। केंद्र के इस जवाब के बाद टाटा ने यह हलफनामा दाखिल किया था।
उद्योगपति टाटा ने कहा था कि उनकी टैप की हुई बातचीत को संरक्षित न रख पाना और इसका बाहरी लोगों तक पहुंचना ‘हमारे महान कानून की परंपरा का हिस्सा नहीं है।’ टाटा ने इस बात पर भी जोर दिया कि केंद्र का हाई कोर्ट में दायर हलफनामा, ‘सरकार का यह रुख पेश करता है कि हालांकि ऐसी टैप की हुई सामग्री का संरक्षण कानून के मुताबिक जरूरी है, पर ऐसा न हो पाने और इसके बाहरी लोगों तक पहुंचने की हालत में इन्हें वापस लाने के लिए सरकार की ओर से कोई कदम नहीं उठाया जाता’ और न ही इस बात की जांच होती है कि यह कैसे लीक हुए। टाटा ने इस बात पर भी आपत्ति जताई कि कर नियमों के उल्लंघन संबंधी मामलों की जांच में लोगों की टेलीफोन पर हुई बातचीत को रिकॉर्ड करने की कवायद बढ़ती जा रही है, जबकि इस प्रावधान का मूल तौर पर उपयोग देश की सुरक्षा से जुड़े गंभीर अपराधों की जांच में ही किया जाता था। साभार : जागरण डॉट कॉम












madan kumar tiwary
January 24, 2011 at 4:06 pm
वह बातचीत जो राष्ट्र को दीमक लगाने के लिये की जाय , उसे क्यों न सार्वजनिक किया जाय । न्यायालय टाटा की बात नही मानेगा यह मेरा अनुमान है । निजता अगर किसी राष्ट के अस्तित्व को खतरे में डाले तब उसे उजागर करना ही कानून सही है । आर टी आई एक्ट के तहत किसी तिसरे व्यक्ति की जानकारी तभी दी जा सकती है, जब वह व्यापक हित में है । और आर टी आई एक्ट की धारा ८ जे का वह प्रवाधान संविधान के निजता की रक्षा के अधिकार को ध्यान में रख कर बनाया गया है , टाटा के इस मुकदमें में भी न्यायालय उसका अनुकरण करेगा ।