ईर्ष्या और दुख के कारण अनेक होते हैं. मुझे एवार्ड नहीं मिला तो उसे क्यों मिल गया. उसे अगर मिल तो क्यों मिला. उसने लिखा तो क्या लिखा. जो लिखा वो कहां से लेकर लिखा. कुछ यही हाल दैनिक भास्कर, इंदौर में कार्यरत रुमनी घोष के विरोधियों का है. हफ्ते भर में करीब सात ऐसी मेल भड़ास4मीडिया के पास आई हैं जिनमें रुमनी घोष को एवार्ड के नाकाबिल बताया गया. रुपनी पर आरोप लगाया गया है कि जिस लिखे पर उन्हें एवार्ड मिला है, वो मौलिक नहीं है, चोरी का है. जिस एवार्ड के तहत न्यूयार्क में उन्हें दो लाख रुपये दिए जाएंगे, उसके लिए वे हकदार नहीं है. जिस महिला पर रिपोर्ट उन्होंने प्रकाशित की है, उससे वे मिली ही नहीं, उसके गांव वे गई ही नहीं. चोरी की रचना पर उन्हें एवार्ड दे दिया गया है. आदि आदि. इसके प्रमाण में कई सुबूत भी भेजे गए हैं.
लेकिन इन दुखी आत्माओं को कोई तो यह बताए कि मौलिक लेखन होता क्या है. एक ही थीम पर दर्जनों लोग लिख सकते हैं. सबका एंगल अलग अलग हो सकता है. सबका लिखने का अंदाज अलग हो सकता है. सबकी प्रस्तुति अलग हो सकती है. और सभी को मौलिक लेखन करार दिया जा सकता है. आदिवासियों की समस्याओं पर बहुत लोग लेखन करते हैं लेकिन एवार्ड मिलता है उसको जो पुरस्कार के लिए अपनी प्रविष्टि सजा-धजा कर भेजता है. या जो बडे़ प्लेटफार्म पर उन समस्याओं को उठाने में सफल होता है और उसे पुरस्कार प्रदान करने वाले मंचों के सामने पेश कर पाता है. या फिर जो अपने लिखे की उपयुक्त जगहों पर मार्केटिंग कर पाता है. महिलाओं के मुद्दे पर बहुत लोग लिखते हैं लेकिन पुरस्कार मिलता है उसे जो पुरस्कार की शर्तों को मानते हुए समय से आवेदन कर देते हैं. फिर भी, अगर रुमनी के एवार्ड पर कई लोगों ने सवाल खड़ा किया है तो उनके सवाल सामने आने चाहिए.
लेकिन मेरा निजी तौर पर मानना है कि रुमनी की अमासो पर जो खबर है, वह ज्यादा सहज सरल पठनीय, प्रजेंटेबल, टू द प्वाइंट, अमासो सेंट्रिक है. उससे पहले जिन लोगों ने अमासो पर खबर लिखकर विभिन्न जगहों पर प्रकाशन कराया है, हो सकता है उनने पुरस्कार के लिए आवेदन ही न भेजा हो. या फिर उन्हें अंदाजा न हो कि वे जो लिख रहे हैं, उनका जो लिखा प्रकाशित हुआ है, वह पुरस्कार लायक है.
यह बाजार का दौर है बाबू, मौलिक लोग मलूकदास बने रहते हैं और थोड़ी चतुराई के साथ कदम बढ़ाने वाले औसत लोग शिखर पर होते हैं. गुस्सा करने से कुछ नहीं होता. खुद बड़ी लकीर खींचिए ताकि एवार्ड आपको भी मिले. फिलहाल, रुमनी को एवार्ड मिलने पर भड़ास4मीडिया की तरफ से ढेर सारी शुभकामनाएं.
-यशवंत, भड़ास4मीडिया
प्रिय यशवंतजी, यह एक अंतरराष्ट्रीय पुरुस्कार से जुड़ा मसला है. और आपकी वेबसाइट की पहुंच भी अंतरराष्ट्रीय है. कृपया इस तथ्यात्मक आलोचना को अपने पोर्टल पर जगह देने की कृपा करें. मैं एक आलोचक हूँ और मध्यप्रदेश में निवासित हूँ. बात करते हैं तीन महिलाओं की. सरोजनी नायडू, अमासो बाई और रूमनी घोष. सरोजनी नायडू भारत की मशहूर कवियत्री और इंडियन नेशनल कांग्रेस की प्रथम महिला अध्यक्ष थीं। अमासो बाई मध्यप्रदेश के छिंदवाड़ा जिले के तिंसई गांव की पूर्व सरपंच हैं। रूमनी घोष एक जनवादी किस्म की पत्रकार हैं और फिलहाल दैनिक भास्कर इंदौर की विशेष संवाददाता हैं।
जाने-अनजाने ही सही, पर इन तीनों में एक संबंध स्थापित हो गया है। दरअसल, हुआ यूं कि अमासो बाई की सरपंची की कहानी को रूमनी ने अपने अखबार के महिला विशेषांक में प्रकाशित किया और हंगर प्रोजेक्ट ऑफ इंडिया द्वारा घोषित सरोजनी नायडू पुरस्कार हासिल कर लिया। वे बधाई की पात्र हैं क्योंकि एक तो वे महिला पत्रकार हैं और दूसरा पंचायती राज में महिलाओं की स्थिति पर लेखन करके उन्होंने यह सम्मान हासिल किया है।
परन्तु सरोजनी, अमासो और रूमनी में बड़ा फर्क है। सरोजनी के मौलिक लेखन ने उन्हें नाइटइंगल ऑफ द इंडिया की पदवी मिली थी, अमासो को उसके मौलिक सोच और संघर्ष के कारण मप्र के पंचायती राज में विशेष स्थान हासिल हुआ…परंतु रूमनी का पुरस्कार मौलिक लेखन पर आधारित नहीं है।
घुमावदार बातों के बजाए सीधी बात। रूमनी ने जिस खबर पर यह पुरस्कार हासिल किया है, वह उनकी मूल रचना नहीं है। वह कम से कम चार बार प्रकाशित हो चुकी है। एक बार मीडिया फॉर राइट्स की वेबसाइट पर (सीमा जैन द्वारा) , दूसरी बार सेंट्रल क्रानिकल में, तीसरी बार शिखर वार्ता में (राजू कुमार द्वारा) और चौथी बार पीपुल्स समाचार में।
क्या कोई खबर किसी अखबार में छप जाने भर से अमौलिक कहलाएगी? सवाल तो यही उठता है। इसका भी जवाब मौजूद है। पहले जो चार समाचार प्रकाशित हुए हैं, उनमें और रूमनी की स्टोरी में कोई फर्क नहीं दिखता है। एक तथ्य यह भी है कि जब रूमनी ने समाचार लिखा, तब अमासो सरपंच नहीं थी, जबकि दूसरों ने जब खबर बनाई तब अमासो सरपंच हुआ करती थी। तभी उसने हस्ताक्षर करना सीखा, गांव में शराबबंदी करवाई और महिलाओं को एकजुट करके विकास कार्य किए।
एक चौंकाने वाला तथ्य यह भी है कि पहले की खबरों में जो फोटो प्रकाशित हुए हैं उनमें और रूमनी की स्टोरी के फोटो में कोई अंतर नहीं है। ताज्जुब है खबरों में अमासो ने एक सी साड़ी, चूडिय़ां और ब्लाउज पहन रखा है। सभी में उसकी मुस्कराहट भी एक सी है।
कहीं ऐसा तो नहीं कि अमासो की खबर सबसे पहले रूमनी ने कवर की और उसे गलती से दूसरों ने छाप लिया। ऐसा हो भी सकता है, परंतु यकीन नहीं होता क्योंकि भला महिला दिवस के विशेष पेज के लिए कोई एक खबर को 11 महीने संभाल कर क्यों रखेगा? यदि वास्तव में ऐसा हुआ भी हो, तो क्या 11 महीने पुरानी खबर को प्रकाशित कर देना चाहिए? कर भी दे तो क्या उसे पुरस्कार की एंट्री में भेज देना चाहिए? और पुरस्कार की घोषणा हो भी जाए, तो क्या पुरस्कार ले ही लेना चाहिए?
सोचें… मैं तो एक आलोचक हूं… आलोचना मेरा कर्म और धर्म है … पत्रकार का क्या कर्म और धर्म मुझे नहीं पता… कुछ अटैचमेंट भी संलग्न हैं, जो आलोचना से उपजी जिज्ञासाओं को शांत करते हैं.
सबको सन्मति दे भगवान
गाँधी जयंती, २०१०
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आदरणीय यशवंत सर,
हाल ही में दैनिक भास्कर की न्यूज एडिटर रुमनी घोष को द हंगर प्रोजेक्ट का सरोजिनी नायडू पुरस्कार देने संबंधी खबर भडास पर पढ़ी। यह पुरस्कार उन्हें ‘पंचायती राज में महिलाएं’ विषय पर हिंदी श्रेणी में श्रेष्ठ रिपोर्टिंग के लिए दिया गया है। इसके लिए न्यूयॉर्क में 23 अक्टूबर को सुश्री घोष को दो लाख रुपये का नकद पुरस्कार और प्रशस्ति पत्र मिलेगा। इसके लिए उन्हें बधाई।
लेकिन इस संबंध में जहां तक मेरी जानकारी है कि यह पुरस्कार उन्हें एक झूठी खबर के लिए मिला है। रुमनी घोष की खबर ‘सावधान यहां अमासो रहती है…’ के लिए दिया गया है। जो दैनिक भास्कर के इंदौर संस्करण में आठ मार्च 2010 को प्रकाशित हुई थी। असल में खबर में जिस तिंसई गांव का जिक्र है वह छिंदवाड़ा जिले में है और यह भोपाल व इंदौर के पत्रकारिता जगत में सर्वज्ञात तथ्य है कि रुमनी जी वहां गई ही नहीं है। यह खबर पूरी तरह डेस्क पर तैयार की गई है। जिस दिन स्टोरी छपी उसके 10 दिन पहले तक के रुमनी जी के मोबाइल लोकेशन देखने से भी यह बात स्पष्ट हो जाएगी।
इस संबंध में अन्य जानकारी जो मिली है। उसके अनुसार, विकास संवाद की एक टीम मार्च 2009 में तिंसई गांव गई थी। जिसके बाद विकास संवाद के लोगों ने विभिन्न अखबारों में इस संबंध में खबरें लिखीं। स्मृति शुक्ला की खबर 30 अप्रैल 2009 को ‘वॉच टॉवर : ट्रांसफॉर्मिंग वुमन्स इमेज’ हैडिंग से ‘सेंट्रल क्रानिकल’ में प्रकाशित हुई। इसके बाद विकास संवाद की हाउस मैगजीन में सीमा जैन की रिपोर्ट ‘विकास की बयार को तेज करती अमासो’ प्रकाशित हुई। जुलाई 2009 के शिखर वार्ता के अंक में पेज 8,9 और दस पर राजू कुमार की रिपोर्ट ‘राजनीतिक पहचान का संघर्ष करती आदिवासी महिलाएं’ शीर्षक से प्रकाशित हुई।
इस संबंध में सभी रिपोर्ट और अमासो के दो फोटो आपको भेज रहा हूं। अधिक जानकारी के लिए आप अपने इंदौर-भोपाल के अन्य सूत्रों को टटोल सकते हैं।
आपका
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नोट : यह खबर मेरे नाम से प्रकाशित करना ठीक नहीं होगा। हालांकि मुझे रुमनी जी से बैर लेने में कोई तकलीफ नहीं है, लेकिन मैं खुद भी इंदौर के ही एक अखबार में काम करता हूं और मैं नहीं चाहता कि इस प्रकरण को निजी रूप में देखा जाए। आशा है आप इस बात का ख्याल रखेंगे। इस संबंध में अन्य खबर और तथ्य जानकारी मिलने पर दे दूंगा।
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रुमनी घोष के लिखे को आप यहां क्लिक करके पढ़ सकते हैं- अमासो1 व अमासो2
सेंट्रल क्रानिकल में प्रकाशित अमासो की कथा- अमासो1 व अमासो2
एक वेबसाइट पर प्रकाशित सीमा जैन लिखित अमासो कथा- अमासो1 व अमासो2
शिखर वार्ता मैग्जीन में प्रकाशित राजू कुमार द्वारा लिखित अमासो कथा- अमासो1, अमासो2, अमासो3
एक अन्य जगह प्रकाशित अमासो की तस्वीर- अमासो












इंदौर से एक पत्रकार
October 5, 2010 at 12:19 am
यशवंत जी, जरा रूमनी को भी बोलने दिजीए
बोलो रूमनी बोलो
सवाल इनाम पर नहीं बल्कि फर्जी ग्राउंड रिपोर्ट पर उठ रहे है
रूमनी घोष को मिले पुरस्कार को पुरे मध्यप्रदेश के पत्रकारों ने स्वागत किया था। भडास तथा अलग अलग मीडिया साईट्स पर जो मैंने पढ़ा उससे तो यही स्पष्ट हो रहा है कि किसी को उन्हें मिले पुरस्कार पर आपत्ति नही ंहै। आपत्ति जिस तरह से उन्होंने दूसरों की खबर हड़पी है और उसे झुठी ग्राउंड रिपोर्ट बताकर अपने नाम से प्रस्तुत की है उस पर है। मैं आपको बताना चाहूंगा कि साथी रिपोर्टस की खबर को हडपना और उसे फ्लेवर देकर संयुक्त बायलाइन से प्रस्तुत करना रूमनी की आदत में है। विरोधाभासी खबरें लिखने तथा गलती उजागर होने पर गरियाकर उसे दबाने में भी रूमनी को कभी परहेज नहीं होता है। यदि उनका साथी रिपोर्टर अपनी खबर में कोई गलती कर जाए तो वे उसे जलील करने में कोई कसर बाकि नहीं रखती और यदि खुद गलती करें तो तरह तरह की सफाई देकर उस गलती को सही ठहराने में पीछे नहीं रहती है।
अब इस पुरस्कार पर जो सवाल उठे है उसके बाद रूमनी घोष को जवाब देना चाहिए। वे एक जिम्मेदार रिपोर्टर है। भास्कर प्रबंधन का उन पर अटूट विश्वास है। पुरस्कार के लिए इस खबर को इंट्री के लिए भेजने से ज्यादा बड़ी गलती उन्होंने इसे महिला दिवस के विशेष अंक के लिए ग्राउंड रिपोर्ट के नाम से प्रस्तुत करके की है। ऐसा करके उन्होंने पत्रकारिता के अपने गुरू कल्पेश याज्ञिनक के साथ भी धोखा किया है। दैनिक भास्कर मैनेजमेंट के सबसे चहेते रिपोर्टस में से एक रूमनी घोष ऐसा भी कर सकती है यह किसी ने सोचा भी नहीं था। जो जानकारी भडास 4 मिडिया पर आयी है उसने रूमनी की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़ा कर दिया है। एक नहीं चार बार प्रकाशित हो चुकी खबर को रूमनी ने अपनी बता कर जिस तरह की फर्जी ग्राउंड रिपोर्ट तैयार की और उसे पुरस्कार के लिए भेज दिया उसने महिला दिवस पर प्रकाशित भास्कर के विशेष अंक की विश्वसनीयता पर ही प्रश्नचिंह लगा दिया है। मैं यह मानता हूं की यह खुलासा रूमनी के साथ ही भास्कर के लिए भी एक करारा तमाचा है। जिस अखबार ने उन्हें इतनी उंचाई दी उसके साथ वे ऐसा करेंगी इसकी किसी को कल्पना भी नहीं थी। महिला दिवस का यह अंक सुधीर अग्रवाल का ड्रीम प्रोजेक्ट था। रिपोर्टस् के जिम्मेदारी खुद उन्होंने तय करवायी थी। जब रूमनी को कल्पेश याज्ञनिक ने रिपोर्टिंग के अलावा कोई अन्य दायित्व सौंपा था तो उसने सुधीरजी की मौजूदगी में हुई बैठक में अपना दायित्व बदलवाकर उक्त ग्राउंड रिपोर्ट का दायित्व लिया था।
इस खबर को लेकर अभी कुछ और चौंकाने वाले तथ्य सामने आने वाले है। इसके लिए बस थोड़ा इंतजार और करें।
फिलहाल जो बातें सामने आयी है उसके बाद भास्कर प्रबंधन को इस तरह से धोखाधड़ी करने वाली रूमनी घोष के खिलाफ कड़ी कार्रवाही करना चाहिए। खुद को पत्रकारों के बीच अपवाद बताने वाली रूमनी क्या इस खुलासे के बाद अपनी गलती स्वीकार कर क्या झूठी ग्राउंड रिपोर्ट पर लिये गए उक्त पुरस्कार को वापस लौटाने की हिम्मत जुटा पायेंगी।
खुलासे के बाद अब यह सवाल भी खड़े हो गए है जिनका जवाब रूमनी घोष के देना ही चाहिए
1. तिंसई से रूमनी घोष.. रूमनी बताएं की वे कब तिंसई गई.. यदि नहीं गई तो महिला दिवस के विशेष अंक में अपनी खबर छपवाने के लिए उन्होंने झूठ का सहारा क्यों लिया? क्या ऐसा करके उन्होंने कल्पेश याज्ञनिक के साथ ही सुधीर अग्रवाल के साथ धोखा नहीं किया?
2. यदि रूमनी तिंसई गई थी तो कब गई इसका खुलासा करें? यदि गई तो वहां किस-किस से मिली
3. क्या वे कभी अमासोबाई से मिली? मिली को कहां मिली?
4. क्या 3 से 8 मार्च 2010 के बीच रूमनी ने कभी छिंदवाड़ा की यात्रा की?
5. क्या छिंदवाड़ा में कार्यरत भास्कर के किसी रिपोर्टर से उन्होंने यह खबर अपने मेल पर नहीं बुलवायी?
6. कल्पेश याज्ञनिक को उन्होंने छिंदवाड़ा जाकर ग्राउंड रिपोर्ट तैयार करने की झुठी जानकारी क्यों दी?
7. क्या मिडिया फॉर राईट्स से भोपाल कार्यालय से उन्होंने यह खबर व अमासोबाई को फोटो हासिल नहीं किया?
8. वही फोटो जो इस बारे में पहले प्रकाशित खबरों के साथ प्रकाशित हुआ रूमनी की खबर में कैसे उपयोग में लाया गया?
9. यह फोटो जो खबर के साथ लगा है वह उन्होंने कब खिंचवाया था?
Indore se reporter
October 5, 2010 at 5:37 am
Bolo Roomni Bolo……:o:'(>:(
khabar kumar
October 5, 2010 at 3:54 pm
rumani ke mamale main yashwant ka sampadkiya comment hajam karne layak nahi hai…
unahain tathyon par dhyan dena chahiye na ki rumani aur bhaskar par….
yashwant ko yah bhi sochana chahiye ki yah puruskar kisi press club ka nahi hai, yah ek aantarrashtriya award hai… yadi molikta nahi hai to kisi ko yah award aakhir kyon diya jana chahiye?
nishith
October 6, 2010 at 4:04 pm
WRITTEN BY NISHITH
Yashwant ji lagta hai aap Rumni ji se koi khas rshta rakhte hai. Itne sare proof dene ke bad bhi aap Rumni ki tarafdari ker rahe hain yeh to bade ashcharya ki bat hai. kam se kam apni nishpakshta per to aanch nahi aane dijeye. aap hi khud Rumni se kyon nahi kahte ki bo apni sachhai ke sare saboot pesh ker de taki doodh ka doodh aur pani ka pani ho jaye.
NISHITH
yogi
October 10, 2010 at 8:31 pm
rumni ko jawab dena chahiye.
Wo chup hai iska matlab usne chori ki ha.
Sunita
October 11, 2010 at 4:48 am
Senior Journalist Manimala Ji is one of jury member for this prestigeous Sarojini Naidu Award. I would like to request Yashwant ji to ask for Manimala Ji’s comment on it.