अब केंद्र सरकार और कांग्रेस पार्टी चाहे जितनी सफाई दे दे, योग गुरू बाबा रामदेव को कपटी, ढोंगी निरुपित कर विश्वासघाती के रूप में पेश कर ले, 4-5 जून की मध्यरात्रि दिल्ली के रामलीला मैदान पर पुलिसिया कार्रवाई को सही बता ले, वहां की जमीं, वहां की हवा, वहां के पेड़-पौधे चीख-चीख कर गवाही दे रहे हैं कि जो कुछ घटित हुआ वह बर्बर था, दमनकारी था।
अगर केंद्र सरकार और कांग्रेस नेतृत्व अपना विवेक खो बैठा था तो दिल्ली पुलिस नंगी हो फासीवादी नृत्य कर रही थी। अभी दो-चार दिन पहले ही कांग्रेस के एक महासचिव दिग्विजय सिंह ने टिप्पणी की थी कि अगर सरकार बाबा रामदेव से डरती तो उन्हें जेल भेज देती। साफ है कि दिग्विजय सरकार और पार्टी के अंदर गढ़ी जा रही साजिश का अपरोक्ष रेखांकन कर रहे थे। आरोप बिल्कुल सही है कि लोकतांत्रिक भारत के इतिहास में आपातकाल के बाद यह दूसरा अवसर था, जहां खुले मैदान में खुले आकाश के नीचे लोकतंत्र का चीरहरण हुआ, उसके साथ बलात्कार हुआ। 5 जून की मध्यरात्रि की घटना ने 36 वर्ष पूर्व 25 जून 1975 की मध्यरात्रि की याद दिला दी, जब बिल्कुल तानाशाही कृत्य को अंजाम देते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश पर आपातकाल थोपा, जयप्रकाश नारायण जैसे लोकप्रिय कद्दावर नेता सहित देश के अन्य बड़े नेताओं-पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को जेलों में ठूंस दिया था। संविधान के अनेक प्रावधानों को स्थगित कर देश की जनता को उसके मौलिक अधिकारों से वंचित कर दिया था। समाचार पत्रों पर सेंसरशिप लगा, लोगों को सूचना के अधिकार से दूर कर दिया था। न्यायपालिका तक को एक पांव पर खड़े होने को विवश कर दिया था।
पूरा देश त्राहिमाम कर रहा था, जबकि तत्कालीन सरकार और उसके चाटुकार ‘अनुशासन’ के कथित मंत्र का जाप कर रहे थे। तब जयप्रकाश आंदोलन के निशाने पर भी भ्रष्टाचार और कुशासन ही थे। हम यहां जयप्रकाश आंदोलन की तुलना अण्णा हजारे अथवा बाबा रामदेव के आंदोलन से करना नहीं चाहते। समान स्थितियों से उत्पन्न संभावित खतरों को रेखांकित भर करना चाहते हैं। अण्णा हजारे के बाद भ्रष्टाचार और काले धन के मुद्दे पर बाबा रामदेव ने आंदोलन छेड़कर गलत क्या किया? देश के हर नागरिक को यह अधिकार प्राप्त है कि वह भ्रष्टाचार, अन्याय, शोषण के खिलाफ और जनता के मूलभूत अधिकारों के पक्ष में आवाज उठाए। सरकार जब इनके विपरीत आचरण करने लगती है, असंतोष की आवाज की अनसुनी करने लगती है तब जनआंदोलन शुरू होते हैं।
इतिहास गवाह है कि कोई भी सत्ता या तानाशाह ऐसे आंदोलनों को कुचलने में सफल नहीं हो पाया है। केंद्र की वर्तमान सरकार तो एक ऐसी खिचड़ी है जिसकी तासिर दो-चार सांसदों वाला कोई भी सहयोगी दल जब चाहे उतार दे। पता नहीं संप्रग अध्यक्ष सोनिया गांधी और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह इस तथ्य को कैसे भूल गए? आधी रात को बुजुर्गों और महिलाओं पर लाठियां बरसा वे स्वयं को लोकतांत्रिक व जनहितचितंक कैसे बता पायेंगे? निश्चय ही लोकतंत्र और देश के खिलाफ कोई बड़ी साजिश रची जा रही है। बाबा रामदेव के खिलाफ बर्बर कार्रवाई कर जनता के धैर्य की परीक्षा तो नहीं ली गई? विपक्षी दल आपातकाल के दिनों की याद कर इसे दूसरे आपातकाल का पूर्वाभ्यास बता रहे हैं। अगर यह आंशिक सच भी है तो सरकार ऐसे दुस्साहस को अंजाम न दे। ऐसी सलाह कोई कुटिल और शातिर दिमाग ही दे सकता है। वह सत्तापक्ष अथवा सरकार का असली शुभचिंतक नहीं हो सकता। जनता के धैर्य को उसकी कमजोरी अथवा अक्षमता मानने की भूल कोई न करे।
जाने अनजाने केंद्र सरकार और उसका नेतृत्व कर रही कांग्रेस पार्टी ने देश की जनता को इतिहास के पन्नों को पलटने के लिए विवश कर दिया है। इस प्रक्रिया में जनता इस निष्कर्ष पर पहुंच रही है कि देश की वर्तमान दशा-दिशा 1974 के दिनों से कई लाख गुणा बदतर हैं। पूरे विश्व में भारत को भ्रष्टतम देश की नई पहचान मिली है। चारों ओर लूट और अव्यवस्था का आलम है। सत्ता से जुड़े राजनेता, व्यवस्था से जुड़े अधिकारी और व्यवसाय से जुड़े बड़े औद्योगिक-व्यवसायिक घरानों को छोड़ दें तो आम जनता कुशासन, भ्रष्टाचार की चक्की में पीस दम तोडऩे की अवस्था में पहुंच गई है। लोकतंत्र में ‘लोक’ की ऐसी दुरावस्था को अनिश्चितकाल तक बर्दाश्त किया ही नहीं जा सकता। रोटी-कपड़ा और मकान वाली सरकार की जगह जहां लाठी-गोली की सरकार ले ले, वहां जनाक्रोश तो भड़केगा ही। और यही हो रहा है। अण्णा हजारे और बाबा रामदेव अगर परिवर्तन का माध्यम बन रहे हैं तो एक सामान्य स्वाभाविक प्रक्रिया के अंतर्गत ही। और, अगर इसके लिए दोषी को चिह्नित करना है तो सत्तारूढ़ दल और सरकार को चिह्नित कर दें। ‘विनाशकाले विपरीत बुद्धि’।
लेखक एसएन विनोद देश के जाने-माने पत्रकार हैं. वे नागपुर से प्रकाशित हिंदी दैनिक ‘1857’ के प्रधान संपादक हैं. उनका यह विशेष संपादकीय दैनिक 1857 में प्रकाशित हो चुका है.












sudhir awasthi
June 8, 2011 at 5:57 am
aapke vichar bare sar garbhit hain.
sudhir awasthi
June 8, 2011 at 6:03 am
vkids fopkjksa dk iSukiu gesa cgqr ilUn vk;kA vkids ys[k dks i
Dinesh Anand
June 8, 2011 at 8:54 am
Sir, aapki kalam mein kuch to aisa jaroor hai ki mere jaise is desh ke kai patrakar aapki kadra karte hain.
ajay bajpai
June 8, 2011 at 10:31 am
aapke vichar bahut hi sahi h in haraamkhoro se pucho
ajay bajpai
June 8, 2011 at 10:32 am
aapke vichar bare sar garbhit hain
kanhaiya khandelwal
June 8, 2011 at 6:15 pm
sir,
puri tarah sahi kaha aapne
धीरेन्द्र
June 8, 2011 at 7:01 pm
बहुत खतरनाक स्थिति है… बहुत अच्छा लेख