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विकिलीक्स और असांजे का साथ दें

जो लोग पत्रकारिता या अभिव्यक्ति के किसी भी किस्म के धंधे में हैं और उन्हें विकिलीक्स के जूलियन असांजे की दुर्गति से कोई फर्क नहीं पड़ रहा है उन्हें बहुत जल्दी शर्मिंदा होना पड़ेगा। या तो बाराक ओबामा का माफिया गिरोह असांजे को मार डालेगा या ओसामा बिन लादेन की तरह हम खोजते ही रह जाएंगे कि वे जिंदा हैं भी या नहीं। आखिर जूलियन असांजे ने गुनाह क्या किया है? वे नुक्कड़ छाप नेताओं की तरह हवा में आरोप नहीं उछाल रहे हैं। उनके हाथ में वे दस्तावेज हैं जिनसे अमेरिका का असली चेहरा उजागर होता है और जिन पर बराक ओबामा को शर्म आनी चाहिए। पूरी दुनिया में अमेरिका के राजदूत अपनी जानकारी के हिसाब से जो सच लिख कर भेजते रहे और मानवाधिकारों की खुल कर बात करते रहे, उसे भी छिपा लिया गया।

जो लोग पत्रकारिता या अभिव्यक्ति के किसी भी किस्म के धंधे में हैं और उन्हें विकिलीक्स के जूलियन असांजे की दुर्गति से कोई फर्क नहीं पड़ रहा है उन्हें बहुत जल्दी शर्मिंदा होना पड़ेगा। या तो बाराक ओबामा का माफिया गिरोह असांजे को मार डालेगा या ओसामा बिन लादेन की तरह हम खोजते ही रह जाएंगे कि वे जिंदा हैं भी या नहीं। आखिर जूलियन असांजे ने गुनाह क्या किया है? वे नुक्कड़ छाप नेताओं की तरह हवा में आरोप नहीं उछाल रहे हैं। उनके हाथ में वे दस्तावेज हैं जिनसे अमेरिका का असली चेहरा उजागर होता है और जिन पर बराक ओबामा को शर्म आनी चाहिए। पूरी दुनिया में अमेरिका के राजदूत अपनी जानकारी के हिसाब से जो सच लिख कर भेजते रहे और मानवाधिकारों की खुल कर बात करते रहे, उसे भी छिपा लिया गया।

ओबामा तो अभी कुछ दिन पहले भारत का नमक खा कर गए हैं मगर उन्होंने भी नहीं बताया कि अमेरिकी सरकार के पास डेढ़ साल से यह जानकारी उपलब्ध है कि गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की हत्या की साजिश पाकिस्तान का लश्कर ए तैयबा रच रहा है और उसकी तारीख तक तय हो चुकी है। ओबामा अपने देश में जितने लोकप्रिय हैं, नरेंद्र मोदी गुजरात में उससे कम लोकप्रिय नहीं है। प्रवासी गुजरातियों के भरोसे अमेरिका की अर्थव्यवस्था चलती है।

हाफिज सईद वाले मामले में भी विकिलीक्स ने ही उजागर किया कि हाफिज सईद और उसके साथियों को पहले से एफबीआई और आईएसआई के जरिए आगाह कर दिया गया था कि उसके तत्कालीन संगठन लश्कर ए तैयबा पर अमेरिकी प्रतिबंध लगने वाला है इसलिए बैंकों से एक एक पैसा निकाल लो। आपका सहज सवाल हो सकता है कि अमेरिका ऐसा क्यों करेगा? अमेरिका ने ऐसा इसलिए किया क्योंकि यह पैसा इलेक्ट्रॉनिक ट्रांसफर पद्वति से अमेरिकी स्रोतों से ही आया था और अगर पकड़ा जाता तो एक पल में अमेरिकी की पोल खुल जाती।

कमाल तो यह हो रहा है कि स्वीडन के बाद अब ब्रिटिश पुलिस भी जूलियन असांजे पर इल्जाम लगा रही है कि वह अपराधी हैं और उसके खिलाफ वारंट निकाल दिया गया है। स्वीडन में तो खैर बलात्कार का आरोप भी दर्ज कर दिया है। स्विटजरलैंड के जेनेवा शहर में जहां डाक विभाग की बैंक में जूलियन असांजे का खाता था और उसमें चंदे से मिली अच्छी खासी रकम जमा की गई थी, अचानक इसलिए बंद कर दिया गया कि क्योंकि डाक खाने वालों को अचानक याद आया कि असांजे ने अपना जेनेवा के स्थायी निवासी होने का कोई प्रमाण नहीं दिया है। यह प्रमाण राशन कार्ड से ले कर कुछ भी हो सकता था।

अब आप भी जानते हैं स्विटजरलैंड में पूरी दुनिया की काली कमाई जमा होती है जिसका कोई हिसाब नहीं मांगा जाता है। घाटियो, पहाड़ियों और झरनों के इस देश को सिर्फ ब्याज से मतलब होता है। सिर्फ भारत के थोड़े बहुत नहीं, 84 हजार करोड़ रुपए स्विस बैंकों में जमा है और उन्हें वापस लाने की कोशिश और मांग स्वामी रामदेव से ले कर गोविंदाचार्य तक लगातार कर रहे हैं मगर जिसे करनी चाहिए यानी हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह नहीं कर रहे। उनकी श्रद्धा।

लेकिन अपन लोग बात जूलियन असांजे की कर रहे हैं और इस बात का सार यह है कि अपनी दुनिया में सच बोलने का कितना अधिकार किसके पास है? असांजे ने उन्हें मिली जानकारियां संबंधित देशों के जासूसों को बेची नहीं। उन जानकारियों को सार्वजनिक कर दिया ताकि एक तो अमेरिका का दोगला स्वरूप सामने आ सके और दूसरे जो सच हमारे और आपके काम का हैं वह भी दिख सके। विकिलीक्स ने ही सबसे पहले दुनिया और खास तौर पर भारत के लोगों को बताया था कि डेविड कोलमन हेडली के पाकिस्तानी आतंकवादी होने की खबर अमेरिका को बहुत पहले ही लग गई थी मगर भारत को बताने की जरूरत नहीं समझी गई। हेडली तो वैसे भी अमेरिका और पाकिस्तान दोनों का जासूस था।

अब अगर ऐसे भेद सार्वजनिक होने लगेंगे तो बराक ओबामा की भुवन मोहिनी हंसी और इन सब अदाओं का क्या होगा जिनके भरोसे बगैर कुछ किए ओबामा को शांति के लिए नोबेल पुरस्कार मिल गया जबकि बेचारे ओबामा शांति तो छोड़िए, अभी तक ठीक से अशांति तक नहीं कर पाए हैं। यही उनका डर है और वे जानते हैं कि हाल के ही गर्वनर चुनावों और दूसरे फुटकर जनादेशों में उनकी जो दुर्दशा हुई है उसमें विकिलीक्स के खुलासे और ज्यादा नाश कर रहे हैं।

अमेरिका को छोड़िए। उसके साथ भड़ैती कर रहे बहुत सारे देशों को छोड़िए जो जूलियन असांजे की शक्ल भले ही नहीं जानते हो मगर उनके खिलाफ वारंट जरूर जारी करते जा रहे हैं। किसी की लड़की को असांजे छेड़ गए हैं, किसी कंपनी में असांजे ने आधा डॉलर लगा दिया है जो अवैध है, असांजे का पता कहीं पुष्ट नहीं हो पा रहा तो वारंट निकल गए और पूरी कहानी यह है कि यह असांजे को निपटाने की और समानांतर मीडिया को नष्ट करने की एक विश्वव्यापी कोशिश है और इसमें ओबामा, टोनी ब्लेयर और उनके गिरोह के सारे लोग अभियुक्त करार दिए जा सकते हैं।

रही बात हमारे फर्ज की तो हमारे यहां विकिलीक्स नहीं हैं और तहलका जरा सा हंगामा मचा देता है तो सरकार उसे लगभग इसी अदा में निपटा देती है। भले ही वह सरकार अटल बिहारी वाजपेयी की थी। समानांतर मीडिया यानी इंटरनेट की ताकत हम और आप देख ही रहे हैं और इसमें कोई खास खर्चा लगता नहीं है। अगर आप वेबसाइट नहीं खोल सकते तो ब्लॉग तो मुफ्त में हाजिर है। रही बात विकिलीक्स का समर्थन करने की तो ऐसा कर के आजाद अभिव्यक्ति का कोई भी समर्थक दुनिया पर एहसान नहीं करेगा बल्कि अपने अस्तित्व को एक अर्थ देगा।

जूलियन असांजे को लगी एक चोट, उन पर हुआ एक हमला, उनके खिलाफ निकला एक वारंट उस समाज की सामूहिक हत्या हैं जो पृथ्वी के आकार लेने के लाखों साल बाद अब इस आकार में आया हैं जहां हक मांगना गुनाह नहीं माना जाता। विकिलीक्स हो सकता है कि अमेरिका को मुसीबत में डाल रहा है मगर जवाब तो अमेरिका को भी देना पड़ेगा कि जब वह अपने दस्तावेजों को खुद सुरक्षित नहीं रख सकता तो जूलियन असांजे अगर उन्हें सार्वजनिक कर रहे हैं तो इसमें असली गुनाह तो अमेरिका का ही है जो अपने दस्तावेज को संभाल कर नहीं रख सकता। दरअसल जब वहम महाबली होने का हो जाता है तो हम अपने घर पर ताला लगाना भूल जाते और जब चोरी हो जाती है बहुत प्रचंड विधवा विलाप करते हैं कि हमारे अस्तित्व को चुनौती दी गई है। 1971 में जन्मा एक आदमी दुनिया की सबसे बड़ी ताकत का घमंड अगर अकेले तोड़ सकता है तो भाई साहब, हम तो डेढ़ अरब ताकत और कमजोरियों वाले देश हैं।

विकिलीक्स के दायरे में नेपाल के सुराग भी : प्रख्यात वेबसाइट विकिलीक्स द्वारा एक सप्ताह से अधिक समय से किए जा रहे अमेरिकी दूतावास के गोपनीयतथ्यों के खुलासे की तपन नेपाल ने भी सोमवार को महसूस की, क्योंकि मीडिया में आई खबर ने संकेत दिया है कि इस्लामी आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा ने हिमालयी गणराज्य में भी घुसपैठ शुरू कर दी है। पाकिस्तान में तत्कालीन अमेरिकी राजदूत एनी पैटरसन ने 2009 में वाशिंगटन को लश्कर की गतिविधियों से सम्बंधित संदेश भेजा था। रिपोर्ट हालांकि भारत की वित्तीय राजधानी मुम्बई पर 2008 में हुए आतंकी हमले पर केंद्रित है, पर इसमें यह भी कहा गया है कि इस हमले का असर भारत के उत्तारी पडोसी देश नेपाल पर भी पडा है। पैटरसन ने अपने संदेश में कहा कि लश्कर-ए-तैयबा के आतंकी मुम्बई पर हमले के लिए जिम्मेदार हैं। वे अब भी भारत, बांग्लादेश, पाकिस्तान और नेपाल में सक्रिय हैं। भारत की खुफिया एजेंसियां इस पर चिंता जताती रही हैं कि लश्कर-ए-तैयबा दक्षिणी नेपाल में अपना ठिकाना बना रहा है।

भारत और नेपाल की सीमा खुली होने के कारण दोनों देशों में नकली भारतीय मुद्रा की तस्करी बढ़ रही है और इससे भारत को लक्ष्य बनाकर आतंकी हमले की साजिश रचने वाले समूहों को नैतिक समर्थन मिल रहा है। नेपाल की सरकार लगातार आरोपों का खंडन करती रही है। भारत ने हाल ही में नेपाल के विदेश एवं गृह मंत्रालय में यह कहते हुए शिकायत दर्ज कराई है कि नेपाल का विपक्षी दल माओवादी पार्टी भारत में प्रतिबंधित माओवादियों  को शस्त्रों और विस्फोटकों के संचालन का प्रशिक्षण मुहैया कराती है। वह नेपाल में यह सब लश्कर-ए-तैयबा की मदद से कराती है।

विकिलीक्स पर कुछ हुआ तो होंगे धमाके : अमरीका से जुड़ी लाखों विवादित जानकारियाँ इंटरनेट पर सार्वजनिक करने वाली वेबसाइट विकीलीक्स के सांस्थापक जूलियन असांज के वकील ने बताया है कि असांज ने कुछ ऐसी सामग्री को बचाकर रखा है जो उन्हें या उनकी वेबसाइट को कुछ होने पर सार्वजनिक की जाएगी।  विकीलीक्स ने हाल में अमरीकी कूटनीतिक दफ्तरों से भेजे गए अनेक केबल सार्वजनिक किए हैं। भारत-पाकिस्तान के बीच हुआ था गुप्त समझौता इनसे अमरीकी सरकार के प्रतिनिधियों की सऊदी अरब, अफगानिस्तान, पाकिस्तान, भारत, चीन, दक्षिण कोरिया के साथ हुई बातचीत और उनके अनेक देशों के बारे में समय-समय पर बनी सोच और विचारों की झलक मिलती है।

अमरीकी सरकार इससे काफी विचलित है और उसने जोर देकर कहा है कि ऐसा अंतरराष्ट्रीय समुदाय के हित में नहीं है। परमाणु हथियार के समान सामग्री वेबसाइट विकीलीक्स के सांस्थापक जूलियन असांज के वकील मार्क स्टीफंस ने बीबीसी को बताया कि जो जानकारियों असांज ने बचाकर रखी हैं वो इंटरनेट के युग के लिए परमाणु हथियार के समान हैं।  पाकिस्तान जो जानकारियों असांज ने बचाकर रखी हैं वो इंटरनेट के युग के लिए श्परमाणु हथियार के समान है।

विकीलीक्स के ताजा खुलासे में यह बात सामने आई है कि नवंबर 2008 में मुंबई हमलों में कथित भूमिका के लिए गिरफ्तार किए गए लश्कर-ए-तैयबा के नेता हाफिज मोहम्मद सईद और लश्कर के सैन्य कमांडर जकी-उर-रहमान लखवी अपने संगठन का संचालन करते रहे हैं। 10 दिसंबर, 2009 के इस कूटनीतिक संदेश में इस विषय का विस्तृत वर्णन है।  लश्कर के सैन्य कमांडर जकी-उर-रहमान लखवी को दिसंबर 2008 को पाकिस्तान में गिरिफ्तार किया गया था और वह मुंबई हमलों के सिलसिले में पाकिस्तान में चल रहे मुकदमे में अभियुक्त है। अमरीकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन के एक गुप्त दस्तावेज के हवाले से बताया गया है कि विश्व में सुन्नी आतंकी संगठनों को सऊदी अरब से सबसे अधिक पैसा मिलता है और इनमें अल-कायदा, तालिबान, लश्कर-ए-तैयबा और हमास शामिल हैं।

इस गुप्त संदेश में कहा गया है कि जुलाई 2009 के मध्य तक लखवी लश्कर के सैन्य ऑपरेशन्स के हर साल के 36.5 करोड पाकिस्तानी रूपयों के बजट के मुखिया थे। रिपोर्टो में एक सूत्र जिसका इन नेताओं से सीधा संपर्क है, उसके हवाले से कहा गया है कि उन्होंने इस पैसे से हथियार और असले को छोड सभी जरूरत की चीजें खरीदी। अमरीकी अधिकारियों का मानना है कि इन दोनों नेताओं ने मुंबई हमलों समेत दक्षिण एशिया में लश्कर के कई हमलों की योजना बनाई और उनकी संचालन किया।

जमात-उद-दावा के नाम पर राहत कार्यो के लिए पैसे में से कुछ पैसे तो जरूरी लश्कर के आतंकवादी अभियानों के लिए इस्तेमाल किए गए। चीनी आपत्तिा पर जमात व सईद को प्रतिबंधित नहीं किया अमरीकी राजनयिकों के कूटनीतिक दस्तावेज में कहा गया है कि मुंबई हमलों से पहले अमरीका के जमात-उद-दावा और सईद को प्रतिबंधित संगठन-व्यक्तियों की सूची में डालने का अनुरोध चीन की आपत्ति के कारण टाल दिया गया था, जो उसने पाकिस्तान का पक्ष लेते हुए किया था। हिलेरी ने दिया पाक पहुंच रहे पैसे को रोकने के निर्देश दिसंबर 2009 में अमरीकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन के एक गुप्त दस्तावेज में अमरीकी राजनयिकों को निर्देश दिया गया है कि वे खाडी से पाकिस्तान और अफगानिस्तान में उग्रवादियों को पहुंच रहे पैसे को रोकने के प्रयासों को बढ़ाएं।

इस गुप्त दस्तावेज में अमरीकी अधिकारियों के हवाले से कहा गया है कि लश्कर-ए-तैयबा और जमात-उद-दावा एक ही संगठन मरकज-उद-दबावल इर्शाद से पनपे हैं। मगर 2002 में जब लश्कर को आतंकवादी संगठन घोषित किया गया तो मरकज ने उससे सार्वजनिक तौर पर नाता तोड लिया और खुद को जमात-उद-दावा का नाम दिया। इसके बाद लश्कर से अधिकतर फंड और संपत्ति जमात-उद-दावा के नियंत्रण में चली गई। लश्कर के पुराने दफ्तरों के दरवाजों पर केवल नाम को बदल दिया गया।दस्तावेज में कहा गया है- हम जानते हैं कि दोनों संगठनों में हाफिज सईद समेत कई वरिष्ठ नेता वही हैं- लश्कर जिनके कब्जे में है और जो उसके सदस्यों को निर्देश देते हैं।

हाल में जूलियन असांज के खिलाफ स्वीडन में एक कथित बलात्कार और छेड़छाड़ का मामला दर्ज किया गया है और उनके खिलाफ अंतरराष्ट्रीय पुलिस इंटरपोल ने एक नोटिस भी जारी किया है। असांज स्वीडन में खुद पर लगाए गए आरोपों को खारिज करते हैं। उनके वकील मार्क स्टीफंस ने बीबीसी के साथ बातचीत में आरोप लगाया कि असांज के खिलाफ तैयार किया जा रहा बलात्कार का मामला राजनीति से प्रेरित है और यदि उन्हें स्वीडन प्रत्यर्पित किया गया तो उन्हें अंत में अमरीका भेज दिया जाएगा।

विकीलीक्स की ओर से जारी की गई ताजा जानकारियों में ऐसे संकेत दिए गए हैं कि एक साल पहले सर्च इंडन गूगल पर हुए साइबर हमलों के पीछे वरिष्ठ चीनी अधिकारियों का हाथ हो सकता है। कुछ ही दिन पहले विकीलीक्स वेबसाइट कुछ घंटे तक बंद रहने के बाद फिर शुरु हुई। जो कंपनी विकीलीक्स को डोमेन सेवाएं दे रही थीं उसने अपने ढाँचे को खतरे का हवाला देते हुए विकीलीक्स की साइट को बंद कर दिया था।

इसके बाद विकीलीक्स ने स्विट्जरलैंड में एक नई डोमेन कंपनी के साथ अपनी वेबसाइट शुरू कर दी। इससे पहले विकीलीक्स की सेवाएं खत्म करने वाली कंपनी एवरीडीएनएस डॉट नेट ने कहा था कि वेबसाइट को इसलिए बंद करना पड़ा क्योंकि उस पर व्यापक रुप से साइबर हमले हो रहे थे। कंपनी का तर्क था कि इन हमलों की वजह से उनके पूरे इंफ्रास्ट्रक्चर या ढाँचे को खतरा पैदा हो गया और इसकी वहज से उन हजारों वेबसाइटों को खतरा पैदा हो गया था जिनका डोमेन इस कंपनी के पास था।

भारत के खिलाफ था चीन : अमेरिका की नाक में दम करने वाली वेबसाईट विकिलीक्स लगातर खुलासे पे खुलासा किया जा रहा है. और सिर्फ अमेरिका ही नहीं, पुरे देश को संशय में डाल दिया है। इस बार चीन की भारत विरोधी एक और गतिविधि दुनिया के सामने आई है।  इस वेबसाइट के मुताबिक चीन पाकिस्‍तान स्थित तीन आतंकवादी संगठनों पर पाबंदी लगाने के खिलाफ था। मध्‍य दिसम्‍बर में चीनी प्रधानमंत्री वेन जियाबाओ की भारत यात्रा से पहले इस खुलासे से दोनों देशों के बीच विश्‍वास और सहयोग बढ़ाने की मुहिम को धक्‍का लग सकता है।

गोपनीय दस्‍तावेज सार्वजनिक करने वाली इस वेबसाइट  ने यह  भी खुलासा किया है कि दिसम्बर 2009 में जारी अमेरिकी विदेश मंत्रालय के एक गोपनीय संदेश के मुताबिक भारत की ओर से संयुक्‍त राष्‍ट्र सुरक्षा परिषद  से पाकिस्‍तान के तीन आतंकी संगठनों पर बैन लगाने के अनुरोध पर चीन ने अड़ंगा डाला था। चूंकि चीन सुरक्षा परिषद का स्‍थायी सदस्‍य है ऐसे में उसकी सहमति के बिना परिषद के किसी फैसले को अंतिम नहीं माना जा सकता है।

अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन के हस्‍ताक्षर वाले इस गोपनीय संदेश के अनुसार- ‘अंतरराष्‍ट्रीय मंच पर पाकिस्‍तान ने पाकिस्‍तान स्थित आतंकवादियों और इनसे जुड़े आतंकियों की संयुक्‍त राष्‍ट्र की सूची एनएससीआर 1267 को खत्‍म करने की मांग की थी। पाकिस्‍तान का कहना है कि आतंकवादी संगठनों के नामों को इस सूची में डाले  जाने पर चीन का वीटो है। चीन ने हाल में भारत की ओर से नामित पाकिस्‍तान स्थित और इससे जुड़े तीन आतंकी संगठनों  को यूएन की सूची में डालने पर रोक लगा दी है जबकि अमेरिका की ओर से नामित संगठनों को सूची में डाले जाने के लिए हरी झंडी दे दी।’

अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने अपने अधिकारियों को कहा था कि वे पाकिस्‍तानी हुक्‍मरानों के साथ बैठक में आतंकवादियों खासकर भारत के खिलाफ गतिविधियां संचालित करने वाले और मुंबई पर हमला करने वाले आतंकियों पर यूएन की पाबंदी का मुद्दा जरूर उठाएंगे। अमेरिकी प्रशासन तालिबान, लश्‍कर ए तैयबा प्रमुख हाफिज सईद के अलावा आतंकवादियों द्वारा संचालित अल राशिद ट्रस्ट, अल अख्‍तर ट्रस्‍ट और अन्‍य लोगों को प्रतिबंधित संगठनों की यूएन की सूची में डालने के लिए प्रतिबद्ध है।’

अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक गोपनीय संदेशों पर अमेरिकी विदेश मंत्री के दस्‍तखत एक नियमित प्रक्रिया है और इसे क्लिंटन के निजी बयान के तौर पर नहीं लिया जाना चाहिए। हालांकि यह पहली बार है जब पाकिस्‍तान स्थित आतंकी संगठनों पर पाबंदी लगाए जाने की भारत की कोशिशों पर पानी फेरने की बात जगजाहिर हुई है। अधिकारियों के मुताबिक भारत और अमेरिका इस मुद्दे को चीन के सामने हमेशा रखते आए हैं। इसी संदेश में आगे कहा गया है कि पाकिस्‍तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई के आतंकी संगठनों से संबंध बने हुए हैं।

भारत सहित कई देशों का मानना है कि अपने ‘आक्रामक’ रवैये के चलते चीन अपने दोस्‍तों से दूर होता जा रहा है। विकीलीक्‍स द्वारा जगजाहिर किए गए अमेरिकी दूतावास के गोपनीय संदेशों के मुताबिक भारत, जापान, यूरोपीय यूनियन और कुछ अफ्रीकी देशों ने अमेरिका से चीन के इस रवैये की शिकायत की थी। लंदन के अखबार ‘ऑब्‍जर्वर’ में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक बीजिंग में अमेरिकी राजदूत जॉन हंट्समैन ने चीन के ‘झगड़ालू’ रवैये के बारे में विदेश मंत्रालय को सूचित करते हुए कहा कि इसके दोस्‍त इससे दूर होते जा रहे हैं।

लेखक आलोक तोमर जाने-माने पत्रकार हैं.

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0 Comments

  1. 0m prakash gaur

    December 8, 2010 at 2:54 am

    हम सब समर्थन करते है.

  2. shishu sharma

    December 8, 2010 at 8:47 am

    wikileaks means pol khol.hum julian osanjae kae saath hein.

  3. rajkumar sirohi

    December 8, 2010 at 3:58 pm

    सारी दुनिया के आज़ाद सोच रखने वाले लोग असांजे के साथ हैं. सल्यूट करने को दिल करता है इस शख्स को जिसने अकेले वो काम कर दिया जो सोवियत संघ नहीं कर सका. अकेले आदमी ने अमेरिका को हिला कर रख दिया. और अमेरिका ने भी वही कदम उठाया जो एक हताशा में उठाया जाता है. जबकि अमेरिका को भी अच्छी तरह पता है कि सैकड़ों मिरर साइटों वाली विकीलीक्स की आवाज को दबाना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन है. अमेरिका असांजे को बेशक गायब करवा दे, या सलाखों के पीछे डाल दे लेकिन जो शुरुआत उसने कर दी है उसे कोई नहीं रोक सकता.
    अभिव्यक्ति की आज़ादी की इस जंग को हमारा समर्थन है.

  4. sanjay

    December 9, 2010 at 7:16 pm

    [b]जूलियन असांजे[/b] को लगी एक चोट, उन पर हुआ एक हमला, उनके खिलाफ निकला एक वारंट उस समाज की सामूहिक हत्या हैं जो पृथ्वी के आकार लेने के लाखों साल बाद अब इस आकार में आया हैं जहां हक मांगना गुनाह नहीं माना जाता। सारी दुनिया के आज़ाद सोच रखने वाले लोग असांजे के साथ हैं. [b]इस शख्स ने जिसने अकेले अमेरिका को हिला कर रख दिया[/b]. और अमेरिका ने भी वही कदम उठाया जो एक हताशा में उठाया जाता है,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,.
    विकिलीक्स हो सकता है कि अमेरिका को मुसीबत में डाल रहा है मगर जवाब तो अमेरिका को भी देना पड़ेगा कि, वह अपने दस्तावेजों को खुद क्यों सुरक्षित नहीं रख सका ? जूलियन असांजे अगर उन्हें सार्वजनिक कर रहे हैं तो इसमें असली गुनाह तो अमेरिका का ही है दरअसल वहम महाबली होने का हो जाता है । [b]1971 में जन्मा एक आदमी दुनिया की सबसे बड़ी ताकत का घमंड अगर अकेले तोड़ सकता है[/b] तो भाई साहब, हम तो डेढ़ अरब ताकत वाले देश हैं।

  5. jivendra singh

    December 12, 2010 at 10:34 am

    ham ansaje k sath hain!hiimat e mardan,madad e khuda!god bless u.tc ansaje.

  6. jivendra singh

    December 12, 2010 at 10:36 am

    himmat e mardan,madad e khuda.ansaje hum aapke saath hain

  7. hariom dwivedi

    December 14, 2010 at 11:38 am

    we all with asanje

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