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विकीलीक्स : सेंधमारों-हैकरों को हीरो न बनाएं

[caption id="attachment_18965" align="alignleft" width="102"]डा. अभिज्ञात डा. अभिज्ञात [/caption]विकीलीक्स के कारनामों ने मीडिया को एक गहरी दुविधा में ढकेल दिया है। उसके खुलासों के आगे दुनिया की सारी खबरें फीकी और लगभग सारहीन नज़र आ रही हैं। सनसनी परोसने वालों की विकीलीक्स ने हवा निकाल दी है। सबसे पहले, सबसे आगे, सिर्फ़ हमारे पास जैसे नारों का रंग उतर गया है। एकाएक दुनियाभर का मीडिया संसार जूलियन असांजे द्वारा विकीलीक्स डाट ओआरजी वेबसाइट पर परोसी हुई जूठन पर आश्रित हो गया है। इसे सूचनाओं का विस्फोट माना जा रहा है।

डा. अभिज्ञात

डा. अभिज्ञात

विकीलीक्स के कारनामों ने मीडिया को एक गहरी दुविधा में ढकेल दिया है। उसके खुलासों के आगे दुनिया की सारी खबरें फीकी और लगभग सारहीन नज़र आ रही हैं। सनसनी परोसने वालों की विकीलीक्स ने हवा निकाल दी है। सबसे पहले, सबसे आगे, सिर्फ़ हमारे पास जैसे नारों का रंग उतर गया है। एकाएक दुनियाभर का मीडिया संसार जूलियन असांजे द्वारा विकीलीक्स डाट ओआरजी वेबसाइट पर परोसी हुई जूठन पर आश्रित हो गया है। इसे सूचनाओं का विस्फोट माना जा रहा है।

कई पत्रकार असांजे को अपना अगुवा मानने से नहीं हिचक रहे हैं तो कुछ ने उसे नायक मान लिया है। कुछ और उसी की राह पर चलने के लिए बेचैन हैं। कुछ फर्जी विकीलीक्स के खुलासे भी इस बीच सामने आये हैं। इस तरह विकीलीक्स मार्का खुलासों का एक बूम आ गया है। इंटरनेट पर सूचनाओं का अबाध प्रवाह की दुनिया में यह पहली बड़ी दुर्घटना है। ऐसी दुर्घटना तो होनी ही थी। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मतलब अनसेंसर्ड सूचना परोसना नहीं है। मीडिया का काम केवल खुलासा करना नहीं है। मीडिया यदि व्यक्ति की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की हिमायत करता है तो उसका आशय अबाध अभिव्यक्ति से नहीं है। लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्बंध नैतिकता से भी है। हम किसी हैकर को मीडिया का नायक नहीं मान सकते। गुप्त सूचनाओं को खुलासा भर कर देना पत्रकारिता का धर्म कदापि नहीं है और ना ही यह कोई ऐसा गुण है जिस पर कोई वारी-वारी जाये। कूटनीति की बहुत सी मजबूरियां होती हैं और हर देश में बहुत सी बातें होती हैं जो न सिर्फ दूसरे देश से बल्कि स्वयं अपने भी देश के लोगों से गोपनीय रखनी होती हैं। आवश्यकता पड़ने पर कई गोपनीय बातों को उजागर करने के पूर्व उसके सार्वजनिक होने के प्रभावों पर भी विचार किया जाता है।

विसीलीक्स ने जो गुप्त सूचनाओं पर सेंधमारी की है वह अमरीकी को पूरी दुनिया की निगाह में गिराने के लिए काफी है। यही नहीं इससे उसके अपने मित्र राष्ट्रों से सम्बंध खराब होने का खतरा अंसाजेमंडरा रहा है। आर्थिक मंदी का शिकार इस देश की हालत इन खुलासों से और खराब हो सकती है। कोई ऐसा देश नहीं होगा जो अपने अपने स्तर और अपनी औकात के अनुसार किन्हीं कारगुजारियों को अंजाम देने की कोशिश न करता होगा। कमजोर से कमजोर देश भी शक्तिशाली बनने की कोशिश करता है और जिनसे वह संधि करता है अपने फायदे की पहले चिन्ता करता है। हर देश का अपना खुफिया तंत्र होता है और उसकी एजेंसियां देश की कूटनीतिक कार्रवाइयों को अंजाम देती रहती है। अमरीका के गोपनीय केबल संदेशों का खुलासा करके विकीलीक्स ने उसकी पोल खोल दी। और एक हैकर दुनिया का नायक बन गया। ऐसे लोगों का नायक जो अमरीकी की शक्ति के आगे नत हैं, उनसे आगे निकलना चाहते हैं, उसके सताये हुए हैं।

अब अमरीका इंटरनेट की अबाध स्वतंत्रता पर अंकुश लगाने की कोशिश कर रहा है तो यह स्वाभाविक है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के हिमायती राष्ट्र का अंकुश के पक्ष में रवैया चिन्ता का विषय नहीं होना चाहिए, क्योंकि वह नैतिकता से स्खलित वैचारिक स्वतंत्रता के खिलाफ जो सही है। हमारे देश भारत को भी ऐसी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है, क्योंकि हम भी मानते हैं कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्बंध नैतिकता से है और उसकी प्रभावोत्पादता से भी। किन्हीं गोपनीय सूचनाओं को उजागर करना कोई बड़ी सूचना क्रांति नहीं है। हमारे यहां सूचना प्राप्त करने का कानून है और कई गोपनीय दस्तावेजों से सम्बंध में एक सुनिश्चित प्रक्रिया से जानकारी प्राप्त की जा सकती है, लेकिन उन जानकारियों में हर तरह की जानकारियों तक पहुंच नहीं बनती क्योंकि सरकार ने कुछ मामलों को जनहित और देशहित में उपलब्ध नहीं कराने का निर्णय लिया है।

असांजे की खुफियागिरी के तर्ज पर यदि आज की पत्रकारिता चली तो जासूसों की तो निकल पड़ेगी। मुझे यह जानकारी नहीं है कि कितने अखबार अपने यहां जासूसों की नियुक्ति किये हुए हैं। हाल में मीडिया द्वारा स्ट्रिंग आपरेशनों की जानकारी तो है किन्तु उसमें भी किसी ने किसी रूप में जनहित और नैतिकता के प्रश्न जुड़े होते हैं। अमरीका के खिलाफ खड़ी शक्तियों को लाभ पहुंचाने की गरज से गोपनीय दस्तावेजों के खुलासे के कारण जल्द ही उन लोगों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता भी बाधित होगी जो किन्हीं नैतिक मूल्यों की लड़ाई इंटरनेट के जरिए लड़ रहे थे। यह भय है कि सस्ता, सुलभ और कारगर हथियार आम लोगों के हाथ से न निकल जाये। स्वाभाविक है कि जो देश इंटरनेट पर आ रही खबरों और विचारों के खुलेपन से अपने देश को बचाना चाहते थे वे लाभान्वित होंगे। ऐसे भी मुल्क हैं जहां अपने ही देश की विसंगतियों को, अपने ही देश में, अपने ही लोगों द्वारा अभिव्यक्ति करने पर जेल में डाल दिया जाता है, वहां इंटरनेट जैसे शक्तिशाली माध्यम सिरदर्द बना हुआ है। उन्हें इंटरनेट पर भावी पाबंदियों का लाभ मिलेगा।

दरअसल इंटरनेट मीडिया के विस्तार के साथ ही उस पर सीमित अंकुश का तंत्र विकसित किया जाना चाहिए था तथा सूचनाओं के प्रसार की नैतिकता का विकास भी होना चाहिए था। इंटरनेट के दुरुपयोग के खिलाफ कारगर कानून भी बनने चाहिए थे, जो नहीं हुआ और उसका नतीजा सामने है। विकीलीक्स को आज भले मीडिया तरजीह दे रहा हो किन्तु यह मीडिया के विनाश का कारण बन जायेगा। एक हैकर के कारनामों से भले ही किसी को लाभ हो मीडिया को चाहिए कि वह उसकी निन्दा करे और उसे नायक न बनने दे। कल को किसी देश के आम नागरिकों के बैंक खातों से लेकर तमाम गोपनीय जानकारियों को रातोंरात लीक कर कोई दुनिया को चौंका कर नायक बनने की कोशिश करेगा तो आप क्या करेंगे।

वर्तमान घटना को अमरीका के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हुए आतंकी हमले को रूप में देखा जाना चाहिए। यह किसी राष्ट्र की निजता पर आतंकी हमला है। और इससे जश्न मनाने वाले यह न भूलें कि उनकी निजता भी महफूज नहीं रह जायेगी। कोई भी उपलब्धि तभी उपलब्धि है जो उसे प्राप्त करने के साधन नैतिक हों। यदि गोपनीय सूचनाएं सेंधमारी या हैकिंग करके हासिल की गयी हैं किन्हीं मान्य तरीकों से नहीं, तो उन सूचनाओं से चाहे जितने बेहतर नतीजे निकाल लें वह किसी भी प्रकार से मनुष्य जाति के लिए हितकारी नहीं होंगे।

असांजे का जीवन कोई आदर्श जीवन नहीं रहा है। कंप्यूर हैक करने की अपनी एक कोशिश के दौरान वह पकड़ा गया था। फिर भी उसने अपना काम और कंप्यूटर के क्षेत्र में अनुसंधान जारी रखा। उसका दावा है कि अपने स्रोतों को सुरक्षित रखने के लिए उसने अलग-अलग देशों से काम किया। अपने संसाधनों और टीमों को भी हम अलग-अलग जगह ले गया ताकि कानूनी रुप से सुरक्षित रह सके। वह आज तक न कोई केस हारा है न ही अपने किसी स्रोत को खोया है।

उल्लेखनीय है कि विकीलीक्स की शुरुआत 2006 में हुई। असांजे ने कंप्यूटर कोडिंग के कुछ सिद्धहस्त लोगों को अपने साथ जोड़ा। उनका मक़सद था एक ऐसी वेबसाइट बनाना जो उन दस्तावेज़ों को जारी करे जो कंप्यूटर हैक कर पाए गए हैं। भले यह कहा जा रहा है कि यह असांजे के व्यक्तिगत प्रयासों को परिणाम हैं, लेकिन इसमें किन्हीं देशों की बड़ी शक्तियों का हाथ होने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।

विकीलीक्स खुलासों के आधार पर राजनीतिक और सामाजिक अध्ययन के लिए पर्याप्त सामग्री उपलब्ध हुई है इसमें कोई दो राय नहीं। उसके खुलासों से किसी देश की नीति और कूटनीति में कितना अन्तर है यह अध्ययन का विषय हो सकता है। नैतिकता की कितनी परतें होती हैं, उसके रेशे रेशे को इन खुलासों ने जगजाहिर कर दिया है। लेकिन कोई भी उपलब्धि किस कीमत पर मिली है बिना इसका मूल्यांकन किये बिना हम नहीं रह सकते। दूसरे किसी भी बात के खुलासे के उद्देश्यों को जब तक सामने न रखा जाये हम यह नहीं कह सकते कि भला हुआ या बुरा। उद्देश्य की स्पष्टता के अभाव में केवल खुलासे का थ्रिल पैदा करना या अपनी हैकर प्रतिभा का प्रदर्शन मेरे खयाल से कोई महान कार्य नहीं है।

लेखक अभिज्ञात इन दिनों सन्मार्ग, कोलकाता में वरिष्ठ उप-सम्पादक के रूप में कार्यरत हैं. इसके पहले वह दैनिक जागरण-जमशेदपुर, वेबदुनिया डाट काम-इंदौर, अमर उजाला-जालंधर / अमृतसर में सीनियर पदों पर काम कर चुके हैं.

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0 Comments

  1. raju

    December 22, 2010 at 12:15 pm

    इतने वरिष्‍ठ पत्रकार की कलम से विकीलिक्‍स के बारे में बचकानी बातें पढ़कर मुझे दुख हुआ। कृपया उन चीजों के बारे में कलम न चलाएं जिनके बारे में आपको कम जानकारी हो। अभिव्‍यक्ति की स्‍वतंत्रता का संबंध किसी भी नैतिकता से नहीं है। नैतिकता भी सापेक्ष होती है, निरपेक्ष नहीं। आपकी नैतिकता, मेरी नैतिकता से बिल्‍कुल अलग हो सकती है। भारत की नैतिकता, बिन लादेन की नैतिकता से बिल्‍कुल अलग हो सकती है। इसका मतलब यह हुआ कि सबकी अभिव्‍यक्ति की स्‍वतंत्रता भी अलग-अलग होनी चाहिए। एक पत्रकार की कलम से यह सब पढ़कर बिल्‍क्‍ुल अच्‍छा नहीं लगा।
    हर सच्‍चाई सनसनीखेज होती है। हर सच्‍चाई किसी काल खंड में अनैतिक मानी जा सकती है, यदि उस सच्‍चाई की अभिव्‍यक्ति को उस वक्‍त के प्रभावशाली सिस्‍टम की नैतिकता से जोड़ दिया जाए तो। एक वक्‍त वह भी था जब दुनिया गोल है बोलना क्रिश्चियन नैतिकता के खिलाफ था। गैलिलियो ने अपनी बात उस नैतिकता के खिलाफ जाकर नहीं कहा होता, तो डाक्‍टर अभिज्ञात साहब अब भी पढ़ रहे होते कि दुनिया चौकोर है। मान्‍यवर, हर सच कुछ लोगों को असुविधाजनक लगता है। कुछ लोगों के लिए अनैतिक होता है। तब तो शायद आप एक शब्‍द भी न लिख पाएं।
    अभिव्‍यक्ति की स्‍वतंत्रता निरंकुश होनी चाहिए, कम से कम इस एक स्‍वतंत्रता पर तो लगाम न लगाओ। गुप्‍त सूचनाओं को गुप्‍त रखना गुप्‍तचर एजेंसियों का काम है। वे करें अपना काम। मीडिया का काम है उन्‍हें उजागर करना। उसे करने दें अपना काम। अगर मुख्‍यधारा के पत्रकारों की बोलती बंद हो जाती है व्‍यवस्‍था के सामने तो हमें हैकर ही चाहिए। असांजे के खिलाफ लिखने के पहले जरा दो मिनट सोच लीजिए, मान्‍यवर।

  2. ARUN SATHI

    December 22, 2010 at 1:53 pm

    bahiyat bat hai,,, bharas hai bas

  3. ..XYZ..

    December 22, 2010 at 3:42 pm

    Lagta hai Dr Abhigyaat ji ka jeevan sachchai se humesha door rah kar hi guzra hai ? Khair ! Paapi pet ka sawaal jo hai !
    Bharsht vyavastha ya niti ke khilaaf suchna , Chaahe sting operation ke zariye ya Hackers ke zariye, Saam ne aaye wo swaagat yogya hai !
    America ki dogli niti duniya ke saam ne aani hi chaaiye ! Yahan tak ki Swiss bank mein humaare netaaon ke chupe paison ka aankada bhi, aam logon ke saam ne kisi tarah se aana hi chaaiye !
    Jahan tak hackers ka sawaal hai to wo CIA se zyaada kuqhyaat nahi hain ! Yaki maaniye ! Bhale hi , Aap CIA ki bajaay hackers ko zyaada KHATARNAAK maane par hai thik iska ulta !
    Ab Dr. Saheb, Aap naitikta ka hawaala dete hue sting operation par rok lagaane ke himaayati mat ban jaaiyega , Warna bhrashtaachar ke jo ekka-dukka maamle bhi saam ne aa rahe hain , unhe bhi aap jaise log NAITIKATA ka hawaala dete hue rukwa denge !

  4. Govind

    December 23, 2010 at 6:48 am

    क्‍या बात कही है !.. डा अभिज्ञात की बातें अच्‍छी है.. लेकिन राजू का यह कमेन्‍ट वाकई भारी पडता है अभिज्ञात जी पर.. जाहिर है, पत्रकारिता और मानवाधिकार के मसलों को किसी भौगिलिक दायरे में समेटने की कोशिश नहीं करना चाहिए.

  5. raju

    December 23, 2010 at 4:17 pm

    dr. abhigyan ji apse ye ummid nahi thi ki aap is tarah ki bachkani bat likhenge. america jaise gunde ki madad karne ka hi man hai to bat alag h

  6. डॉ.अभिज्ञात

    December 23, 2010 at 6:19 pm

    1-अभिव्‍यक्ति की स्‍वतंत्रता का संबंध किसी भी नैतिकता से नहीं है।
    2-हर सच्‍चाई सनसनीखेज होती है।
    3-हर सच्‍चाई किसी काल खंड में अनैतिक मानी जा सकती है, यदि उस सच्‍चाई की अभिव्‍यक्ति को उस वक्‍त के प्रभावशाली सिस्‍टम की नैतिकता से जोड़ दिया जाए तो।
    4-मान्‍यवर, हर सच कुछ लोगों को असुविधाजनक लगता है। कुछ लोगों के लिए अनैतिक होता है। तब तो शायद आप एक शब्‍द भी न लिख पाएं।
    5-अभिव्‍यक्ति की स्‍वतंत्रता निरंकुश होनी चाहिए, कम से कम इस एक स्‍वतंत्रता पर तो लगाम न लगाओ।
    6- गुप्‍त सूचनाओं को गुप्‍त रखना गुप्‍तचर एजेंसियों का काम है। वे करें अपना काम। मीडिया का काम है उन्‍हें उजागर करना।
    7-अगर मुख्‍यधारा के पत्रकारों की बोलती बंद हो जाती है व्‍यवस्‍था के सामने तो हमें हैकर ही चाहिए।

    आपकी प्रतिक्रिया के इन सात मुद्दों पर कुछ कहना चाहूंगा।
    1-अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्बंध नैतिकता से नहीं होता तो फिर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की हिफाजत कौन करेगा? पूरी दुनिया में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जिस देश में भी है हमेशा कुछ शर्तों पर ही मिली हुई है। जरा मुझे जानकारी दें कि दुनिया का वह कौन सा देश है जहां अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर कोई बंदिश नहीं है। एकाध देश तो ऐसे हैं जो अमरीका के बाद सबसे बड़ी शक्ति होने का दावा कर रहें मगर उनके यहां अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता स्वप्न है। काले झंडे दिखाने पर भी कई बरसों की सजा है। पत्रकार व लेखक जेलों में हैं। दुनिया में उसके सम्बंध में जो भी खबरें आती हैं वे सेंसर्ड हैं।
    2-सच्चाई हमेशा सनसनीखेज नहीं होती। जो लोग सनसनी को सच्चाई मानते हैं वे भ्रम में हैं उन्हीं लोगों की वजह से मीडिया में सनसनी का अस्थायी दौर चल रहा है लेकिन सनसनी परोसने वाले टिकते नहीं हैं क्योंकि सनसनी में लफ्फाजियां और झूठ अधिक होगा।
    3-हर सच्चाई किसी काल खंड में अनैतिक नहीं बल्कि उसी कालखंड में भी एक के लिए नैतिक व दूसरे के लिए अनैतिक हो सकती है। लेकिन कुछ सार्वभौम सच्चाइयों को सबको अपनाना पड़ता है। आप सड़क पर नंगे नहीं घूम सकते भले आपको अच्छा लगे।
    4-लिखने वाले को कुछ लोगों को या सबको भला लगे या बुरा लगे पर ध्यान देने के बजाय इस औचित्य पर विचार करना चाहिए कि इसमें लोकहित के तत्व हैं या नहीं। यही लोकहित का चिन्तन ही उसे नैतिक बल देता है। जूलियन असांज के मामले को मैं सिर्फ़ इसलिए नैतिक नहीं मानता क्योंकि उसके एक्सपोजर के कारण क्यां हं यह स्पष्ट नहीं है। अब तक तो हम गूगल अर्थ पर संवेदनशील प्रतिष्ठानों की तस्वीरों के आने पर चिन्तित थे अब तो सारे गोपनीय दस्तावेज ही लीक हो रहे हैं। यदि खुलासे का मकसद यह दिखाना है कि देखो मैं कितना बड़ा हैकर हूं कि मैं हर गोपनीय दस्तावेज तक पहुंच सकता हूं तो यह आधुनिक स्तर का आतंकवाद है। अब सुनते हैं कि विकीलीक्स की हैकिंग सुविधाओं को लोग भाड़े पर लेने की तैयारी कर रहे हैं अपने अपने हितों को साधने के लिए। विकीलीक्स के खुलासे कोई आदर्श प्रस्तुत नहीं करते वे घबराहट में डालते हैं। पता नहीं कब किस देश की कौन सी चीज का खुलासा हो जाये जिससे दो मित्र देश एक दूसरे के शत्रु हो जायें या फिर किसी देश में गृहयुद्ध छिड़ जाये। विध्वंस का सुख लेने वालों को नायकत्व कृपया न दिया जाये यही गुजारिश है।
    5-अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता निरंकुश नहीं होनी चाहिए यदि वह दूसरे की जिन्दगी को कठिन कर दे, और दुनिया को जहन्नुम बना दे। पत्रकार होने के साथ साथ एक लेखक होने के बावजूद मैं मानता हूं कि अभिव्यक्ति हस्तक्षेप करे लेकिन उसके साथ कम से कम यह नैतिकता भी लाए कि वह जिस दुनिया को ध्वस्त कर रहा है उससे बेहतर दुनिया कौन सी वह देना चाहता है। विध्वंस से लिए विध्वंस नहीं होना चाहिए निर्माण के लिए हो।
    6-मीडिया का काम पोलखोल ही रह गया है क्या? तब उसे पत्रकारिता नहीं कोई और नाम दे दें। जिस देश में विपक्ष का काम पोलखोल तक सीमित रह जाये और मीडिया का भी तो फिर सकारात्मक भूमिका कौन निभायेगा? यह पोलखोल का गेम बहुत समझ बूझ कर खेला जाता है और कुछ ताकतें अपने हित में दूसरों की पोलखुलवाती हैं दुर्भाग्यवश मीडिया भी कई बार इसमें शामिल हो जाता है किन्तु मीडिया का इतना ही काम नहीं है।
    7-चोर, डकैत, हैकर, आतंकी, कातिल, तस्कर, बलात्कारी और जो चाहिए सब ले लें भाई कौन रोकता है… आप ही तय करें कि मुख्यधारा के पत्रकारों के बदले आपको क्या पसंद है?

  7. raju

    December 24, 2010 at 11:22 am

    डा. अभिज्ञात जी द्वारा बिंदुवार व्‍यक्‍त की गयी सात प्रतिक्रियाओं पर मुझे कुछ नहीं कहना है। क्‍योंकि मुझे इनमें कोई ऐसा नया तर्क नहीं दिखा जो पहले उनके आलेख और बाद में मेरी टिप्‍पणी में शामिल न हो। मुझे आज तक नहीं मालूम कि न्‍यूटन ने जो तथ्‍य दिये, उसके पीछे क्‍या उद्देश्‍य थे। मीडिया का काम पोलखोल न होकर और क्‍या है यह मीडिया वाले जानें। शायद इंटरनेट पर दो-चार लेख पढ़कर, इधर-उधर से तथ्‍य लेकर, एक आलेख लिख मारना ही होगा। मुझे नहीं पता। यह मीडियावालों का पोर्टल है। तो वे ही इस बहस को आगे बढ़ाएं। मुझे भी अबतक पता नहीं चला कि असांजे के खिलाफ उनके लिखे आलेख का उद्देश्‍य क्‍या है। पर, अपन असांजे के मुरीद हैं। वैसे ही जैसे इस दुनिया में लाखों दूसरे हैं। इसलिए अपने मन की बात कह दी। अगर आप फिर लिखेंगे असांजे के खिलाफ, तो मैं भी फिर लिखूंगा। पर, तभी जब कुछ नये तर्क सामने आयें। फैसला दूसरे करें तो ही अच्‍छा। पर, कुछ भी लिखने से पहले सोच लीजिएगा बंधु। जवाब भी मिलेगा।

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