इसी साल के जनवरी माह में हिंदुस्तान के ग्रामीण (अपकंट्री) इलाकों में काम करने वाले संवाददाताओं से तीन-तीन बार विज्ञापन मांगे जाने और पिछले कूपन आदि का पुरस्कार न बांटे जाने से मामला गरम होने की खबर है। शनिवार को संपादकीय प्रभारी और यूनिट हेड के साथ मीटिंग में ग्रामीण संवाददाताओं के साथ दोनों की गरमागरम बहस भी हुई। पहले तो दोनों पदाधिकारियों ने ग्रामीण संवाददाताओं को निकाल बाहर करने का अल्टीमेटम दिया पर बाद में उनके तेवर इस बात पर बेहद ढीले पड़ गए कि संवाददाताओं ने साफ कह दिया कि जो करना हो करें। हम किसी और अखबार में भी अपनी सेवा देकर भुगतान पा लेंगे।
ग्रामीण संवाददाताओं के इस कड़े तेवर के बाद तो उनकी खबरें भी छप रही हैं और मनुहार के प्रयास भी तेज हो गए हैं। हिंदुस्तान के सूत्रों का कहना है कि यहां हिंदुस्तान 24 हजार सर्कुलेशन के साथ तीसरे स्थान पर होने की वजह से विज्ञापन जुटाना बेहद टेढ़ी खीर है और मैनेजमेंट है कि कोई बात सुनने को राजी ही नहीं है। ग्रामीण पत्रकारों ने साफ कह दिया है कि अब चाहे निकाल दें वे और विज्ञापन नहीं जुटा सकते। जनवरी में विज्ञापन एक बार छप गया है। अब 26 जनवरी का विज्ञापन जुटाना है। फिर 30 जनवरी को अखबार की दूसरी वर्षगांठ है। उसके लिए भी विज्ञापन जुटाना है। इतना विज्ञापन इलाहाबाद के इलाकों से कौन देने वाला है?
यही सवाल ग्रामीण संवाददाता पूछ रहे हैं और यूनिट हेड और संपादकीय प्रभारी हैं कि दबाव पर दबाव बनाते जा रहे हैं। अनेक लोग इसी वजह से अखबार छोड़ गए हैं और आशंका है कि आगामी दिनों सर्कुलेशन, पेज मेकिंग, संपादकीय, विज्ञापन आदि मिलाकर 17-18 लोग इस अखबार को बॉय बोल देंगे। संवाददाताओं का तो यहां तक कहना है कि पिछले साल का बकाया तक उन्हें नहीं चुकाया गया है। उनके विज्ञापन मद के लाखों रुपये बकाया हैं। रोज-रोज के दबाव से वे उब गए हैं। उनके पास अन्य अखबारों के एक से एक आफर हैं। फिर वे क्यों हिंदुस्तान की ही गुलामी करते रहें।
सूरज सिन्हा जो 12 सालों से शिड्यूलिंग स्ट्रिंगर के रूप में काम देख रहे थे जागरण, इलाहाबाद में शिड्यूलिंग हेड के रूप में ज्वाइन कर गए हैं। इसका भी व्यापक असर इस अखबार पर दिख रहा है। वैसे अगर देखा जाए तो बीते कुछ सालों में 40 के आसपास लोग इस अखबार को बॉय बोलकर अन्यत्र पनाह लेने को मजबूर हुए हैं। हिंदुस्तान की मार्केट साख घटने का असर इसकी वित्त व्यवस्था पर काफी अधिक पड़ने की खबर है। साभार : पूर्वांचलदीप












rajiv
January 25, 2011 at 9:02 am
babua, advt nahi laoge to akhabar kaise chalega. utho, douro, advt lao.
pramod
January 25, 2011 at 9:59 am
umid hai ki aanewale dino me hindustan ke visthapit patrkar Bakwas4media ke liye kaam karte nazar aayenge aur Yashwant ji ke baaju mazboot karenge,,,,
mukesh pandey
January 25, 2011 at 10:39 am
Hindustan Kya Sabhi akhbaar aisa hi krte hai……..
Sab chor hai………….
sageer khaksar
January 25, 2011 at 1:31 pm
sabhi akhbar wale patrkaron ka shoshan karte hain. such yah ki ab patrkaron ki zarurat hi akhbar ko nahein rahi vigyapan data ya gunda ya fir unhein shooter ki zarurat hai. abhi hal hi main devoriya zile mein hindustan aur dainik jagran walon ke beech hindustan launching ko lekar goli bari bhi hui,seedhe sadhe log ab patrkarite karne ki halat mein nahein hai.
pankaj dubey
January 25, 2011 at 5:11 pm
kya kare bhai ham bhi vigyapan ke karn naukari se hat gye hai per kya kar skte her jgh yhi hai to kab tak bagige bhai
sumeet
January 26, 2011 at 5:40 am
This is a universal truth you can’t imaging a media house because today every reporter or support staff should heavy money through salary. All noble reporters & Editor are demanding Rs. in million Per year. Then Management has a presser policy extra revenue. They have no option without it.
([b]Mere Bhai Patrakarita Karni Hai To Apni Compony Ke Sehat Ka Bhi Khayal Rakho Ge)[/b]