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वो उपजा गलत है, फर्जी है…. मेरी बात सुनें

कोई पार्टी, कोई संगठन ऐसा नहीं जिसमें मचमच या किचकिच न हो. पत्रकारों के ही संगठन को ले लीजिए. एक एक नाम से कई कई दुकानें चल रही हैं. आंदोलन के नाम पर शून्य और पत्रकारों व पत्रकारिता के हितों के लिए कार्य करने के नाम पर जीरो इन संगठनों में सारी रस्साकस्सी मलाईदार पद पाने और मलाई खाने के लिए होती है. उपजा के चुनाव की खबर आपने पढ़ी ही होगी. अब लीजिए पढ़िए ये प्रेस रिलीज जिसमें बताया गया है कि वो उपजा तो फर्जी है. जाने क्या सच है और जाने क्या झूठ, ये तो भगवान जानें लेकिन फिलहाल इस प्रेस रिलीज को बांचिए.

कोई पार्टी, कोई संगठन ऐसा नहीं जिसमें मचमच या किचकिच न हो. पत्रकारों के ही संगठन को ले लीजिए. एक एक नाम से कई कई दुकानें चल रही हैं. आंदोलन के नाम पर शून्य और पत्रकारों व पत्रकारिता के हितों के लिए कार्य करने के नाम पर जीरो इन संगठनों में सारी रस्साकस्सी मलाईदार पद पाने और मलाई खाने के लिए होती है. उपजा के चुनाव की खबर आपने पढ़ी ही होगी. अब लीजिए पढ़िए ये प्रेस रिलीज जिसमें बताया गया है कि वो उपजा तो फर्जी है. जाने क्या सच है और जाने क्या झूठ, ये तो भगवान जानें लेकिन फिलहाल इस प्रेस रिलीज को बांचिए.

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0 Comments

  1. RAJENDRA S

    February 28, 2011 at 3:12 pm

    उपजा ही क्यों ? दादा पी.के.राय ने सारी एनयूजे का ही फर्जीवाड़ा कर दिया है। नियमानुसार यह श्रमजीवी पत्रकारों की ट्रेड यूनियन है मगर उसमें राय साहब ने ज्यादातर फर्जी पत्रकार भरवा दिये। उत्तराखण्ड में उन्होंने श्रमजीवी पत्रकारों को बाहर कराया और ब्रह्मदत्त शर्मा से मिलीभगत कर उसमें सारे साप्ताहिक अखबार वाले भर दिये। साप्ताहिक अखबार भी नियमित छपते हों तो भी कोई बात होती लेकिन शर्मा जी ने दादा पी.के राय के आर्शिवाद से सारे फर्जी सदस्य बना दिये। ब्रह्मदत्त के साथ केवल एक गन्दा से कभी न नहाने वाला तन और मन से मैला कुचैला श्रमजीवी पत्रकार है। उसका नाम कौशिक बताया जाता है।ब्रह्मदत्त जी ने अपनी कुर्सी पक्की करने के लिये इसी तरह प्रेस क्लब में मीट की दुकान और प्रचून चलाने वालों के साथ ही कम्पोजिटरों को पत्रकार बना कर क्लब का सदस्य बना दिया था। अन्ततः असली पत्रकारों को उन ब्रह्मदत्त जी के साथ ही उन सभी फर्जी पत्रकारों को बाहर फेंक दिया था। लखनउ के सभी पत्रकार जानते हैं कि पी.के.राय काफी रंगीन मिजाज हैं। मयखाने के वह मुरीद हैं। उनकी इसी कमजोरी का फायदा उठा कर ब्रह्मदत्त जी अब एनयूजे के नेता बन कर विज्ञापन हासिल कर रहे हैं। उनकी एनयूजे का श्रमजीवियों से कोई लेना देना नहीं है। इसलिये राज्य सरकार से उनकी एकमात्र मांग विज्ञापन की ही रहती है। संगठन के नाम पर यह देश के श्रमजीवी पत्रकारों के साथ धोखा नही ंतो और क्या है। पी के राय के चेले सर्वेश और रतन भी ब्रह्मदत्त जी की असलियत जानते हैं। मगर दादा के चहेते को कोई क्या कह सकता है।

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