: हिंदी विवि में डॉ. अम्बेडकर जयंती पर वैचारिक विमर्श आयोजित : भारतीय संविधान के निर्माता, भारत रत्न बाबासाहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर की जयन्ती के अवसर पर महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा द्वारा आयोजित कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए कुलपति विभूति नारायण राय ने कहा कि बाबा साहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर रचित संविधान बीसवीं शताब्दी का सबसे बड़ा ग्रंथ है। यह ग्रंथ उत्पीडि़त अस्मिताओं की मुक्ति का महाख्यान है।
विश्वविद्यालय के हबीब तनवीर सभागार में डॉ. अम्बेडकर अध्ययन केंद्र, डॉ.भदन्त आनंद कौसल्यायन बौद्ध अध्ययन केंद्र, डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर दलित एवं जनजाति अध्ययन केंद्र के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित समारोह के दौरान वरिष्ठ पत्रकार राजकिशोर ने एक एसएमएस- समूचा शहर नीला पड़ गया है, एक नागिन मुसलसल डंस रही है, के हवाले से कहा कि शहरी संस्कृति को कोई नागिन डंस रही है और विष पैदा कर रही है। शहरों में संवेदनाएं नष्ट हो गई हैं। सामंतवाद शहर को डंस रहा है और शहर नीला पड़ गया है। जाति व्यवस्था पर विमर्श करते हुए उन्होंने कहा कि सवर्णों ने जाति व्यवस्था पैदा की है और वे ही संकल्प लें कि जाति व्यवस्था को तोड़ेंगे। आज दलितों के लिए आत्मनिरीक्षण का भी क्षण है। उन्हें यह सोचना होगा कि आंबेडकर और भगवान बुद्ध के जीवनादर्शों में जीनेवाले दलित समाज की पहचान क्या है। दलित को पहचान सवर्णों से नहीं अपितु उनके स्वयं के कर्मों के परिष्कार से मिलेगी।
उन्होंने गांधीजी के शब्दों को उदघृत करते हुए कहा कि मेरा जीवन ही मेरा संदेश है, दलित बुद्धिजीवियों, विचारकों से प्रार्थना है कि वे कह सकें कि मेरा जीवन ही मेरा संदेश है। डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर दलित एवं जनजाति अध्ययन केंद्र के निदेशक प्रो. एल कारूण्यकरा ने एक विज्ञापन में शाहरूख खान द्वारा सम्प्रेषित संदेश स्कोर क्या है कि तर्ज पर आप कौन हैं का सवाल सदियों से हमसे पूछा जाता रहा है, आखिर क्यों सवाल यह है कि क्या जाति ही हमारी पहचान हो सकती है। डॉ. भदन्त आनंद कौसल्यायन बौद्ध अध्ययन केंद्र के कार्यकारी निदेशक डॉ. एमएल कासारे ने कहा कि डॉ. बाबासाहेब ने इस देश के बारे में सोचा, लिखा और कार्य किया, बड़ा ही महत्वपूर्ण है। उनके सोच में मनुष्य केंद्र बिंदु में हैं। उनका मानना था कि मनुष्य का सर्वांगीण विकास होना चाहिए।
साहित्य विद्यापीठ के प्रोफेसर केके सिंह ने कहा कि डॉ. अम्बेडकर के चिंतन का दायरा व्यापक है। उन्होंने बाबासाहेब के वक्तव्यों के हवाले से कहा कि 26 जनवरी 1950 ई. को संविधान लागू होने से हम अंतविर्रोधों के नए युग में प्रवेश करने जा रहे हैं। राजनीति के क्षेत्र में हमें समानता के दर्शन होंगे पर उन्होंने चेतावनी दी कि आर्थिक व सामाजिक क्षेत्र में असमानता की खाई बहुत गहरी होगी। आज यह गैर-बराबरी इतनी तेजी से बढ़ रही है कि एक सर्वेक्षण के मुताबिक एक मजदूर व बहुराष्ट्रीय कंपनी के सीईओ की आय में 43 हजार गुणा का अंतर है। बाबासाहेब के विचार हमारे पथ को आलोकित करते रहेंगे। सुप्रसिद्ध कवि आलोकधन्वा ने कहा कि पूंजीवादी/साम्राज्यवादी ताकतें चाहती हैं कि आप बंट जाएं। बाबासाहेब ने इस देश के निर्माण में अपना अमूल्य योगदान दिया है।
महात्मा गांधी दूरस्थ शिक्षा के प्रो. संतोष भदौरिया ने कहा कि हम अम्बेडकर पर बातचीत करने के लिए तभी हकदार हैं जब उनके लेखन और जीवनी की जानकारी हमें हो। फौरी तौर पर उनके बारे में कुछ भी कहना खतरनाक साबित होता है। आंबेडकर जिस भारतीय समाज के निर्माण की बात करते हैं वो समतामूलक और गैर-बराबरी का समाज है और इस समाज के निर्माण के लिए हमें वर्ण व्यवस्था और जाति के जड़मूलक समाज से बाहर आकर ईमानदार कोशिश करनी होगी। घोर जातिवादी और वर्णव्यवस्था के पोषक बनकर आंबेडकरजी के जीवन और विचार पर बात करना मैं बेमानी मानता हूं। संस्कृति विद्यापीठ के असिसटेंट प्रोफेसर राकेश मिश्र ने कहा कि समाज में विकास की चकाचौंध की पीछे एक स्याह अंधेरा भी बहुत तेजी से पसरा है। हम जितना आधुनिक होने का दावा करते हैं हमारे भीतर असहिष्णुता भी उतनी ही तेजी से उभरी है वैश्वीकरण और बाजार की एक उभरती ताकत के बतौर और किक्रेट के विश्वकप में चैंपियन की चकाचौंध के पीछे हम दलित, उत्पीडि़त, आदिवसी विस्थापन और गुजरात के नरसंहार को नज़रअंदाज नहीं कर सकते हैं। बाबासाहेब के जन्मदिवस के अवसर पर हम बौद्धिक ईमानदारी से इतिहास के उन पड़ावों पर बात करें जहां से यह विसंगतियां जन्म ली हैं।
जनसंचार विभाग के रीडर व वरिष्ठ पत्रकार डॉ. कृपा शंकर चौबे ने त्रिपुरा के उच्च शिक्षा मंत्री व मार्क्सवादी चिंतक अनिल सरकार की बहुचर्चित बांग्ला कविता दलित केनो जन्माय का पाठ किया। डॉ. प्रतिभा तांकसांडे ने हिंदु कोड बिल पर चर्चा की। डॉ. सुरजीत कुमार सिंह ने स्वागत भाषण दिया। डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर की प्रतिमा पर माल्यार्पण कर कार्यक्रम की शुरुआत की गई। मंचस्थ अतिथियों का स्वागत पुष्पगुच्छ प्रदान कर किया गया। डॉ. अम्बेडकर अध्ययन केंद्र के रिसर्च एसोसिएट ज्योतिष पायेन ने मंच का संचालन किया तथा बौद्ध अध्ययन केंद्र के रिसर्च एसोसिएट लक्ष्मण प्रसाद ने धन्यवाद ज्ञापन किया। इस अवसर पर विश्वविद्यालय के शैक्षणिक, गैर-शैक्षणिक कर्मी, शोधार्थी व विद्यार्थी बड़ी संख्या में उपस्थित थे। प्रेस विज्ञप्ति












Manik
April 15, 2011 at 3:35 pm
very good reporting.
मदन कुमार तिवारी
April 15, 2011 at 5:02 pm
श्रीमान आप नव बु्द्धिस्ट लोग स्माज को जोडना भी जानते है या सिर्फ़ भडास निकालना ? अगर आपने अंबेडकर को पढा होगा तो मालूम होना चाहिये की उन्होने कहा था की हर धर्म , यहां तक की पारसी धर्म में भी जातिवाद है । दलित भी जातियों में बटे हैं। दुसरी बात भीमराव राम जी सकपाल को सरनेम अंबेदकर उनके हीं स्कुल के एक ब्राह्मण शिक्षक ने दिया था । गायकवाड ने पढने के लिये वजीफ़ा दिया । तथा शाहु जी महाराज ने अपने साथ डाईनिंग टेबल पर बैठाकर साथ में खाना खाया जिससे समाज को यह संदेश मिला की जातिवाद खत्म करो। अंबेदकर की छवि को सबसे ज्यादा क्षति नव बुद्धिस्टो ने पहूचाई है । जरुरत है अंबेडकर के विचारो को आत्मसात करने की न की दुर्भावना फ़ैलानेकी । दलित में भी एक सामंती वर्ग पैदा हो चुका aै , वही सबसे ज्याा अंबेदकर को भंजा aहा aै ।