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साइबर वार : ना चलेगी गोली, ना बहेगा खून, फिर भी लड़ेगी दुनिया

अब नाम तो याद नहीं है, शायद शंकर दादा था उस पुरानी फ़िल्म का नाम। इसमें एक गाना है – इशारों को अगर समझो, राज़ को राज़ रहने दो, लेकिन पर्दाफ़ाश करने वालों के हाथ कहीं राज़ की पोटली लग जाए तो उनके पेट में अजब-सी गुदगुदी होने लगती है। यूं तो, ऐसे लोग अक्सर अमानत में खयानत की तर्ज पर ढके-छुपे राज़ की धज्जियां उड़ाते हुए उन्हें सार्वजनिक करके आपके लिए मुश्किलें ही खड़ी करते हैं, हैक्टिविस्ट (हैकर+ एक्टिविस्ट) जूलियन असांजे ने भी कमोबेश अमेरिका के लिए वही किया। बावज़ूद इसके असांजे ऐसे शख्स नहीं, जिन्हें अहसान फ़रामोश कहा जाए। बेशक, ये कहने के पीछे धारणा है कि उन्होंने सच की लड़ाई लड़ी है।

अब नाम तो याद नहीं है, शायद शंकर दादा था उस पुरानी फ़िल्म का नाम। इसमें एक गाना है – इशारों को अगर समझो, राज़ को राज़ रहने दो, लेकिन पर्दाफ़ाश करने वालों के हाथ कहीं राज़ की पोटली लग जाए तो उनके पेट में अजब-सी गुदगुदी होने लगती है। यूं तो, ऐसे लोग अक्सर अमानत में खयानत की तर्ज पर ढके-छुपे राज़ की धज्जियां उड़ाते हुए उन्हें सार्वजनिक करके आपके लिए मुश्किलें ही खड़ी करते हैं, हैक्टिविस्ट (हैकर+ एक्टिविस्ट) जूलियन असांजे ने भी कमोबेश अमेरिका के लिए वही किया। बावज़ूद इसके असांजे ऐसे शख्स नहीं, जिन्हें अहसान फ़रामोश कहा जाए। बेशक, ये कहने के पीछे धारणा है कि उन्होंने सच की लड़ाई लड़ी है।

असांजे ने अमेरिकी दूतावासों से जुड़े ढाई लाख गोपनीय संदेश विकीलीक्स वेबसाइट पर लीक कर दिए। खुफिया जानकारियों के सबसे बड़े खुलासे ने गोपनीयता और तकनीक को लेकर नए सिरे से बहसों का स्थान पैदा किया। यही नहीं, कूटनीतिक मोर्चे पर दुनिया के दादा कहलाने वाले अमेरिका की सोच कितनी ख़राब, भटकी हुई है- ये बात भी विश्व के सामने आई।

असांजे अमेरिका के लिए काफी पुराने सिरदर्द हैं। उन्होंने इराक युद्ध के सिलसिले में चार लाख दस्तावेज़ पहले भी जारी किए थे। असांजे के जेल जाने और ज़मानत मिलने की कहानी से तो सब वाकिफ़ हैं, लेकिन बहुत कम लोग जानते होंगे कि जूलियन को गिरफ्तार किए जाने से आहत लोगों की फौज साइबर वार छेड़ चुकी है।

साइबर वार, यानी इंटरनेट के सहारे लड़ा जाने वाला वैश्विक युद्ध। ये लड़ाई अमेरिका के ख़िलाफ़ लड़ी जा रही है। देखते ही देखते विकीलीक्स की डुप्लीकेट 507 साइट इंटरनेट पर आ गईं और हज़ारों लोग अमेरिका के विरुद्ध साइबर वार में सक्रिय हो गए। आज से कुछ दिन पहले 18 दिसंबर को नेट यूजर्स ने अंसाजे के समर्थन में ‘ऑपरेशन ब्लैकफेस’ चलाया, वहीं हैकर्स ने ‘ऑपरेशन लीकस्पिन’ लॉन्च किया। इसके तहत अब तक जो केबल्स जारी नहीं की गई हैं, उन्हें भी लीक किया जाएगा। सबसे मज़ेदार रहा-ऑपरेशन ब्लैकफेस। इसके तहत नेट यूजर्स ने इंटरनेट पर प्रोफाइल पिक्चर की जगह ब्लैक रखी। प्रोफाइल चाहे फेसबुक पर थी या फिर आरकुट पर। शुरुआती दौर में आकलन है कि इस मुहिम में पचास हज़ार से ज्यादा नेट यूजर शामिल हुए।

असांजे समर्थकों के इस ज़ोरदार हमले से अमेरिका बुरी तरह परेशान है। ये लोग सच्चाई की लड़ाई में असांजे के साथ हैं और अमेरिका के कारोबार, कंपनियों, सुरक्षा व्यवस्था से लेकर प्रशासन तक साइबर संसार की सरहदों में सेंध लगाने में जुटे हैं। यही वज़ह है कि काफी कम अरसे में अमेरिकी बैंकिंग, बीमा और शेयर बाजार पर इन हमलों का असर पड़ने लगा है।

सौदे या कारोबार की किस्म चाहे जैसी हो, उसमें ई-बैंकिंग, ऑनलाइन मनी ट्रांसफ़र सरीखे तरीक़े ज़रूर अपनाए जाते हैं। अब ये प्रचलन तेज़ी से बढ़ रहा है। असांजे समर्थकों ने कारोबार की इसी धड़कन को थामने की तैयारी कर ली है। उन्होंने मनी ट्रांसफ़र और आंकड़ों से खिलवाड़ करना शुरू कर दिया है, ऐसे में अमेरिका की पेशानी पर बल पड़ने स्वाभाविक हैं। असांजे के हमदर्द हैकरों ने क्रेडिट कार्ड कंपनी वीज़ा की वेबसाइट को भी निशाना बना दिया। वज़ह – एक दिन पहले वीज़ा ने विकीलीक्स को मिलने वाली सहयोग राशि प्रोसेस करने से मना कर दिया था।

हम बात कर रहे थे साइबर युद्ध की, तो इसे समझना काफी रोचक कवायद होगी। सच तो ये है कि अब युद्ध परंपरागत हथियारों से नहीं जीते जाते। देशों के बीच युद्ध की रूप-रंगत भी बदलती जा रही है। प्रत्यक्ष तौर पर इसमें खून नहीं बहता, जानें नहीं जातीं (कम से कम शुरुआती समय में), लेकिन दुश्मन मुल्क की पूरी व्यवस्था छिन्न-भिन्न करने के उपक्रम लगातार किए जाते हैं। विरोधी देश की कंप्यूटर आधारित प्रणाली ध्वस्त कर सूचनाएं चुराने और उनका दुरुपयोग करने का यही काम साइबर वार कहलाता है।

ज्यादा समय  नहीं बीता, जब कनाडा के शोधकर्ताओं ने साइबर वार पर विस्तृत रिपोर्ट जारी कर बताया कि चीन के गुप्त साइबर नेटवर्क ने भारतीय खुफिया तंत्र में सेंध लगाने की कोशिश की। यूं, चीन ने कभी इसकी आधिकारिक हामी नहीं भरी, लेकिन ये अंदाज़ा लगाना भी मुश्किल नहीं है कि ऐसी किसी कोशिश को निजी तौर पर अंजाम नहीं दिया जा सकता। चीन के हैकर्स ने ये कोशिश महज इसलिए की, ताकि शांतिकाल में ज़रूरी जानकारियां इकट्ठी कर लें और लड़ाई के समय में भारत की रणनीति के विरुद्ध काम आने वाली योजना बना पाएं।

साइबर के मैदान में लड़ी जाने वाली ये लड़ाई बहुत पेचीदा है। चीन इस मामले में कुछ ज्यादा ही ख़तरनाक ढंग से सक्रिय भी है। उसके सर्विलांस सिस्टम घोस्टनेट के ज़रिए दूसरे देशों के कंप्यूटर नेटवर्क से छेड़छाड़ और डाटा ट्रांसफ़र का काम धड़ल्ले से हो रहा है।

सेंसरशिप के मोर्चे पर भी चीन की चालाकी देखने लायक है। उसने गूगल की कई सेवाएं अपने यहां बैन कर रखी हैं। इसी तरह अमेरिका जैसे ताकतवर मुल्क ने भी चीन पर आरोप लगाया है कि उसकी ओर से सूचनाओं में सेंध लगाने की कोशिश की गई। फिलहाल, कोई भी देश सामने आकर साइबर वार नहीं छेड़ रहा है, लेकिन ढके-छिपे तौर पर पीछे रहकर तकरीबन सब साइबर युद्ध की भूमिकाएं बना रहे हैं, ताकि समय आने पर दुश्मन देश को चित्त कर सकें।

सच तो ये है कि साइबर युद्ध का चेहरा इतना भर नहीं कि मनी ट्रांसफर अवरुद्ध कर दिया जाए, या फिर उसे किसी और एकाउंट में ट्रांसफ़र करने की प्रक्रिया अपनाई जाए। विकीलीक्स के मामले में भी सबसे बड़ी चेतावनी यही है कि कुछ और जानकारियां लीक कर दी जाएंगी। ज्यादा दिन नहीं गुज़रे, जब असांजे के वकील मार्क स्टीफन ने बीबीसी को बताया था कि उनके मुवक्किल ने कुछ सामग्री रोक रखी है। यदि उसे गिरफ्तार किया गया तो ये सामग्री सार्वजनिक कर दी जाएगी। ये कथित विस्फोटक जानकारी अब तक लीक नहीं हुई है, लेकिन मार्क स्टीफन का ये कथन – रोकी गई सामग्री हाइड्रोजन बम की तरह है, अमेरिका की चिंता में इज़ाफा ज़रूर कर रहा है। असांजे की मुहिम तो सकारात्मक थी, लेकिन ऐसा काम कोई नेगेटिव सोच के साथ करे, तो सोचिए, हालात कितने ख़राब हो सकते हैं?

असांजे की गिरफ्तारी के बाद अमेरिका के खिलाफ़ बढ़े साइबर युद्ध ने इस दिशा में भारत को भी बहुत कुछ सोचने को मज़बूर कर दिया है। दरअसल, इस लड़ाई का हिस्सा बनने से भारत भी बच नहीं सका है। पाकिस्तान ने ‘नकली विकीलीक्स’ को आधार बनाकर हमारे मुल्क को बदनाम करने की कोशिश भी की, लेकिन ये पाखंड ज्यादा देर नहीं टिका। इसके बाद इंडियन साइबर आर्मी ने मुंबई हमले की दूसरी बरसी पर पाकिस्तान की करीब 30 सरकारी साइटों पर हमला कर 26/11 के शहीदों को श्रद्धांजलि दी थी। इंडियन साइबर आर्मी ने पाकिस्तान सरकार, विदेश मंत्रालय, ऑडिटर जनरल ऑफ पाकिस्तान, विज्ञान और तकनीक मंत्रालय और पाकिस्तानी नौसेना की साइट्स हैक कर ली थीं। जवाब में पाकिस्तानी साइबर आर्मी ने सीबीआई की वेबसाइट पर कब्ज़ा जमा लिया…तो ज़ाहिर तौर पर ख़तरा बड़ा है और सिर पर हाज़िर भी है।

कंप्यूटर नहीं, हेलीकॉप्टर पर निशाना

सूचना युग में हर समय दुनिया में किसी ना किसी कंप्यूटर पर हमारी सूचनाएं दर्ज होती हैं। हैकर्स इन्हीं सूचनाओं के सहारे किसी भी सिस्टम को हैक कर लेते हैं, लेकिन इन साइबर क्रिमिनल्स, यानी हैकर से निपटना कभी आसान नहीं रहा। अब वो हाइजैकर भी बनते जा रहे हैं। वो बंदूक की जगह कंप्यूटर का इस्तेमाल करने लगे हैं। बाइनरी सिस्टम के ज़रिए काम करने वाले कंप्यूटर को हैकरों ने साध लिया है। ये ख़तरा आतंकी संगठनों के ई-मेल भेजने तक नहीं सिमटता। कुछ अरसा पहले तक हम हैकरों की क़रतूत से कभी-कभार ही रूबरू होते थे, जब पता चलता था कि फलां वेबसाइट को किसी ने हैक कर लिया है या फिर ऑनलाइन धोखाधड़ी की है, लेकिन महज पंद्रह दिन पुरानी ख़बर याद कीजिए, आप चौंक जाएंगे। पाकिस्तान साइबर आर्मी ने सीबीआई की वेबसाइट हैक की तो दावा ये भी किया कि एनआईसी के सिस्टम को बाधित किया जा चुका है।

इग्लैंड के अख़बार डेली मेल की एक ख़बर और ब्रिटेन के प्रधानमंत्री डेविड कैमरून की नेशनल सिक्योरिटी स्ट्रेटजी रिपोर्ट से भी पता चलता है कि कई आतंकी संगठनों ने उस तकनीक का विकास कर लिया है, जिसकी मदद से एयरोप्लेन के ऑनबोर्ड कंप्यूटर सिस्टम को नियंत्रित किया जा सकता है। ये ख़तरनाक संकेत है, क्योंकि इस तरह तो कोई भी आतंकी हैकर हवाई जहाज में बैठे बिना किसी भी प्लेन को ध्वस्त कर सकते हैं। ऐसे में ये समझना मुश्किल नहीं है कि हैकरों का शिकंजा सबकी गर्दन पर कसता जा रहा है।

इनसे बचना आसान नहीं है। हमारी सरकार को खास आईटी स्पेशलिस्ट्स की टीम तैयार करनी होगी। यही नहीं, आईटी कानूनों में भी बदलाव करने होंगे। यूं तो, भारत में हैकिंग के दोषी को तीन साल तक की कैद होती है या फिर दो लाख रुपये तक जुर्माना भरना होता है, लेकिन इस सबको तभी लागू किया जा सकता है, जब पता चल पाए कि हैकर आखिर था कौन? सवाल चिंता बढ़ाते हैं, लेकिन इनके जवाब तो तलाशने ही होंगे। भारत को अमेरिका की तैयारियों से भी सबक लेना होगा। हाल में ही अमेरिका में राष्ट्रपति बराक ओबामा ने माइक्रोसॉफ्ट के सुरक्षा प्रमुख रह चुके हॉवर्ड श्मी को साइबर सुरक्षा प्रमुख तैनात किया, ताकि रूस और चीन की तरफ से आने वाले ख़तरे का मुकाबला किया जा सके, तो भारत क्या सोच रहा है?

लेखक चण्डीदत्त शुक्ल युवा पत्रकार हैं तथा स्‍वाभिमान टाइम्‍स में वरिष्‍ठ पद पर कार्यरत हैं.

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0 Comments

  1. sanjay choudhary

    January 4, 2011 at 5:47 pm

    sochne ki bat to hiy, chhandidatt ji ki…………..

  2. madan kumar tiwary

    December 28, 2010 at 5:52 pm

    चण्डीदत जी बिहार और उडिसा में ईवीएम हैक हो चुका है। नही तो क्या कारण था की भारत कि सरकार ने जे हेल्डरमैन को भारत मे घुसने की अनुमति नही दी और उन्हें दिल्ली ऐयरपोर्ट से लौटा दिया गया। वह मिशिगन विश्वविद्यालय में कंप्यूटर साइंस के प्रोफ़ेसर हैं। उन्होनें शोध करके यह साबित किया था की भारत के ईवीएम में छेडछाड आसान है। आप देखते चलें। तकनीक का कमाल । लेकिन चाहे कुच भी हो, कमसे कम गुंडे और अपराधी किस्म के जाहिल नेताओं से छुटकारा मिलेगा। बाकी साइबर वार को हम लोग रोक लेंगें। बहुत आसान है। हैम्किंग रोकना और पकडना भी।

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