मशहूर लेखिका मैत्रेयी पुष्पा का कहना है कि साहित्य जगत में ईमानदारी से लिखने के लिए हिम्मत और हौसला चाहिए क्योंकि सच लिखना ख़तरे से खाली नहीं है. समाचार चैनल न्यूज एक्सप्रेस के मंथन कार्यक्रम में पत्रकारों से बातचीत करते हुए मैत्रेयी पुष्पा ने बेबाक अंदाज में कहा कि साहित्य जगत में भी सियासत हावी है. मसलन किस पुस्तक को पुरस्कार मिलना चाहिए.
यह भी कि साहित्य कैसा लिखा जाए. किस लेखक को साहित्यकार माना जाए और किसको नहीं. ये सब साहित्य संसार में फैली राजनीति से तय होता है। उन्होंने समाज और साहित्य की राजनीति का सबसे बड़ा शिकार महिलाओं को बताया और कहा कि जिस प्रकार महिला को घर से लेकर पूरे समाज में पुरुष के बताये रास्ते पर चलना पड़ता है उसी तरह साहित्य में भी पुरुष लेखक खुद को साहित्य का सबसे बड़ा झंडाबरदार समझते हैं.
वो कहती हैं कि साहित्य में महिलाओं का चरित्र किस तरह दर्शाया जाए, साहित्य के सिपहसलारों ने इसके भी नियम-कायदे तय किए हुए हैं. साहित्य संसार में महिलाओं की हालत दलितों जैसी है. साहित्य जगत में सक्रिय जो लोग तरक्कीपसंद होने का दम भरते हैं दरअसल व्यवहार में वो वैसे होते नहीं हैं. बातचीत के दौरान उन्होंने लोकाचार जैसी परंपराओं को भी महिलाओं के खिलाफ साजिश करार देते हुए कहा कि इन लोकाचारों के जरिए महिलाओं को घरों की चहारदीवारी के अंदर कैद रखने की राजनीति की जाती रही है.

मैत्रेयी ने कहा कि टीवी चैनलों पर महिला कैरेक्टर को जिस तरह पेश किया जा रहा है वो ठीक नहीं है, लिहाजा अगर महिलाओं के हितों के लिए कुछ करना है तो इस परिपाटी को बदलना होगा. राजनीति में महिलाओं के प्रवेश के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने इस बात की हिमायत की और कहा कि ये इसलिए भी ज़रूरी है कि एक महिला ही महिला के दर्द को अच्छी तरीके से समझ सकती है, लेकिन अफसोस कि जो महिलाएं सत्ता की राजनीति में हैं वो या तो परिवारवाद के सहारे आगे बढ़ी हैं या फिर किसी राजनीतिक आका की मदद से. प्रेस विज्ञप्ति












rajj kumaar
March 10, 2011 at 7:20 am
aap purushon ko daliton jaisa kar do, koi rok rha hai, faaltoo ki baat karti ho