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सुनिए, बनारस के इन हिन्‍दुस्‍तानियों का रद्दी घोटाला!

वाराणसी। हिंदुस्तान में नववर्ष को बढ़िया तरीके से मनाने के लिए कुछ लोग कमर कसे हुए हैं। कारण कि उनके हाथ में हजारों की रकम जो लगने वाली है। सुना जा रहा है कि हिंदुस्तान में फ्री कापी के वितरण के नाम पर जो घपले-घोटाले का खेल चल रहा है, दरअसल नववर्ष उसी से मनाया जाने वाला है। दारू-मुर्गा की दावत का निमंत्रण बंट भी चुका है। इसकी कहानी वाराणसी के विभिन्न अखबार वितरण सेंटरों पर हर रोज वितरकों के मुंह से सुनी जा सकती हैं।

वाराणसी। हिंदुस्तान में नववर्ष को बढ़िया तरीके से मनाने के लिए कुछ लोग कमर कसे हुए हैं। कारण कि उनके हाथ में हजारों की रकम जो लगने वाली है। सुना जा रहा है कि हिंदुस्तान में फ्री कापी के वितरण के नाम पर जो घपले-घोटाले का खेल चल रहा है, दरअसल नववर्ष उसी से मनाया जाने वाला है। दारू-मुर्गा की दावत का निमंत्रण बंट भी चुका है। इसकी कहानी वाराणसी के विभिन्न अखबार वितरण सेंटरों पर हर रोज वितरकों के मुंह से सुनी जा सकती हैं।

हिंदुस्तान का शीर्ष प्रबंधन यह सब देखकर भी आखें मूंदे हुए है। अगर वितरकों की माने तो इस पूरे खेल में दिल्ली से लेकर वाराणसी तक का स्टाफ शामिल है। कहानी बेहद दिलचस्प है। जब कहानी चल ही रही है तब सुनी सुनाई जाने वाली कहानी आप भी सुनिए-‘‘विगत 13 दिसंबर, 2010 से हिंदुस्तान ने एक स्कीम चलाई हुई है। इसका नाम दिया गया एक पर एक फ्री अखबार। कुछ दिन तक एक पर एक फ्री का मामला चला। बाद में वाराणसी के हिंदुस्तान प्रबंधन को लगा कि इसके बावजूद अखबार उठ नहीं रहा है। कापियां डंप हो रही हैं और ‘किसी के गोदाम की शोभा बढ़ा रही हैं’। सो, उसने महज दस हजार कापियों को ही मार्केट में फ्री छोड़ने का निश्चय किया।

अब सारा का सारा खेल इसी दस हजार कापियों को लेकर खेला गया। हिंदुस्तान के प्रसार विभाग ने सभी वितरकों को कुछ कापियां फ्री देने का मन बनाया और किसे ये कापियां फ्री दी जाएं यह प्रसार के कुछ आकाओं पर छोड़ दिया। परिणाम यह हुआ जो दबंग था, उसे तो पूरा का पूरा अखबार ही फ्री दिया जाता रहा। कुछ को एक कापी फ्री नहीं दी गयी। जो पचास अखबार उठाते थे उन्हें दो, तीन या पांच कापियां फ्री देकर टरकाया जाता रहा। वैसे एक सौ कापियों पर दस कापियां फ्री देने की बात सुनी गयी। मगर, जैसा कि ऊपर कहा गया है, इस मामले में भेदभाव बरता गया। चहेते वितरकों को मनमुताबिक कापियां फोकट की दी गयीं। इसे लेकर रोष फैला। बाकी जो कापियां बचती थीं वह किसी एक एजेंट के गोदाम की शोभा बढ़ा रही हैं।

यह नयी फ्री स्कीम 31 दिसंबर, 2010 तक ही चलेगी यानी शुक्रवार तक। इस शुक्रवार तक कोई डेढ़ लाख कापियां गोदाम में जा चुकी होंगी। अब खेल रद्दी का शुरु होने वाला है और यही खेल हिंदुस्तान वाराणसी के कुछ लोगों का नववर्ष शानदार बनाने को आया है। जिन वितरको को फ्री अखबार दिया गया उन्होंने भी यही अखबार रद्दी बनाया क्योंकि वाराणसी में हिंदुस्तान को लोगों ने अब भी पसंद नहीं किया है। मगर जो अखबार गोदाम में पहुंचा उसकी संख्या 31 दिसंबर तक डेढ़ लाख पहुंच जानी चाहिए। रद्दी में वाराणसी में एक अखबार एक रुपये में बिकता है। इस तरह जो डेढ़ लाख अखबार अधिकृत गोदाम में प्रसार विभाग के मूर्धन्यों की मदद से डंप किया गया है, उससे डेढ़ लाख रुपये रद्दी बेचकर आ जाएंगे।

हिंदुस्तान से जुड़े तीन लोगों को इस डेढ़ लाख में से 50-50 हजार रुपये तो मिल ही जाएंगे। इस तरह हिंदुस्तान के दो कलमाडी टाइप लोग और एक अधिकृत गोदाम धारक के हिस्से में नववर्ष पर अच्छी खासी रकम आ जाएगी। आदर्श घोटाला, कामनवेल्थ घोटाला, 2जी स्पेक्ट्रम घोटाला की खबर यह अखबार शिद्दत से छापता है पर माननीया शोभना भरतीया के अखबार में यह जो आदर्श घोटाले का खेल चल रहा है इसे कौन रोकेगा, यह समय ही बताएगा। हिंदुस्तान के इस फ्री अखबार के खेल ने वाराणसी के सभी मीडिया संस्थानों की नींद उड़ा रखी है।’’

मजेदार बात यह कि एक दूसरी कहानी जो गोरखपुर में सुनाई पड़ रही है उसे भी लगे हाथ सुन लीजिए-‘‘हिंदुस्तान के गोरखपुर में तो और भी बड़ा घोटाला चल रहा है। वहां बुकिंग में महज तीस हजार ही कापियां हैं। मगर हिंदुस्तान पूरे 61 हजार कापियां छाप रहा है। यह 31 हजार कापियां गोदाम में रद्दी के रुप में जमा हो रही हैं। आगामी नववर्ष में इस रद्दी के खेल में भी लाखों का खेल होगा। यही हाल देवरिया का भी है। वहां भी पांच हजार से ऊपर कापियां रद्दी हो रही हैं, कारण कि अपनी मांगों को लेकर अधिकांश वितरक अखबार नहीं उठा रहे हैं और इन्हीं मांगों के चलते वहां गोलीबारी की घटना तक हो चुकी है।’’

नया साल दरअसल हिंदुस्तान के कुछ लोगों को लखपती बनाने के लिए ही आ रहा है। समूह संपादक पंडित शशिशेखर चतुर्वेदी के संपादकत्व वाले इस अखबार में संपादक और संपादन कार्मिक रूपी जीव सुबह की मीटिंग में डांट खाकर, गालियां सुनकर और दिनभर कलम घिसकर तीन साला कांट्रैक्ट को बचाने में ब्लड प्रेशर बढ़ाते रहेंगे और उनके कलम के बल पर चलने वाले अखबार में कुछ कलमाडी टाइप लोग लखपती बनते रहेंगे। है न, आनेवाला मजेदार नया साल, 2011। ‘जय हो हिंदुस्तान के तथाकथित कलमाडियों!’ साभार : पूर्वांचल दीप

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0 Comments

  1. ranjeet

    January 4, 2011 at 8:21 am

    well done……………keep it up.

  2. Madan Singh Kushwaha Ghazipur

    December 31, 2010 at 1:18 pm

    khabar amar ujala kee prtikria hai

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