
आशुतोष
हालांकि इन टेपों में पैसे के लेन-देन का जिक्र नहीं है। इसमें किसी को मंत्री बनाने के लिये लॉबिंग की जा रही है। पूरी बातचीत इशारा करती है- एक, किस तरह से बड़े-बड़े कॉर्पोरेट घराने सरकार की नीतियों को प्रभावित करते हैं? दो, किस तरह से नेता इन कॉर्पोरेट घरानों का इस्तेमाल मंत्री बनने के लिये करते हैं? तीन, किस तरह से पत्रकार कॉर्पोरेट घराने और नेता के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाते हैं? चार, किस तरह से इन तीनों का कॉकटेल सत्ता में फैले भ्रष्टाचार को आगे बढा़ता है? पत्रकार ये कह सकते हैं कि उसे खबरें पाने के लिये नेताओं और बिजनेस घरानों से बात करनी होती है। उन्हें अपना सोर्स बनाने के लिये नेताओं और विजनेस घरानों से उनके मन लायक बात भी करनी होती है। ये बात सही है लेकिन ये कहां तक जायज है कि पत्रकार बिजनेस हाउस से डिक्टेशन ले और जैसा बिजनेस हाउस कहे वैसा लिखे? या नेता को मंत्री बनाने के लिये उसकी तरफदारी करे?
हाई प्रोफाइल पंच-संस्कृति अंग्रेजी की पत्रकारिता में इसे भले ही लॉबिंग कहा जाता हो या फिर खबर के लिये नेटवर्किंग लेकिन खाटी हिंदी मे इसे ‘दल्लागिरी’ कहते हैं और ऐसा करने वालों को ‘दल्ला’। और मुझे ये कहने में जरा भी संकोच नहीं है कि हम पत्रकारों को ये पता है कि हमारे बीच कौन पत्रकार ‘दल्ला’ है और कौन ‘दल्लागिरी’ कर रहा है। इसी दिल्ली में क्या हम नहीं जानते कि जो लोग पैदल टहला करते थे कैसे रातोंरात उनकी कोठियां हो गईं और बड़ी बड़ी गाडियों में घूमने लगे? टीवी की बदौलत पत्रकारिता में पैसा तो पिछले दस सालों से आया है। उसके पहले पत्रकार बेचारे की हैसियत ही क्या थी? झोलाछाप, टूटी चप्पल में घूमने वाला एक जंतु जो ऑफिस से घर जाने के लिये डीटीसी बस का इंतजार करता था। उस जमाने में भी कुछ लोग ऐसे थे जो चमचमाती गाड़ियों में सैर करते थे और हफ्ते में कई दिन हवाई जहाज का मजा लूटते थे। इनमें से कुछ तो खालिस रिपोर्टर थे और कुछ एडीटर। इनकी भी उतनी ही तनख्वाह हुआ करती थी जितनी की ड़ीटीसी की सवारी करने वाले की।
इनमे से कई ऐसे भी थे जिनकी सैलरी बस नौकरी का बहाना था। जब पत्रकारिता में आया तब दिल्ली में एक खास बिजनेस घराने के नुमाइंदे से मिलना राजधानी के सोशल सर्किट में स्टेटस सिम्बल हुआ करता था। और जिनकी पहुंच इन ‘महाशय’ तक नहीं होती थी वो अपने को हीन महसूस किया करते थे। ऐसा नहीं था कि पाप सिर्फ बिजनेस घराने तक ही सिमटा हुआ था। राजनीति में भी पत्रकारों की एक जमात दो खांचों मे बंटी हुई थी। कुछ वो थे जो कांग्रेस से जुड़े थे और कुछ वो जो बीजेपी के करीबी थे। और दोनों ही जमकर सत्ता की मलाई काटा करते थे। जो लोग सीधे मंत्रियों तक नहीं पंहुच पाते थे उनके लिये ये पत्रकार पुल का काम किया करते थे। ट्रासफर पोस्टिंग के बहाने इनका भी काम चल जाया करता था। और जेब भी गरम हो जाती थी। सत्ता के इस जाल में ज्यादा पेच नहीं थे। बस पत्रकार को ये तय करना होता था कि वो सत्ता के इस खेल में किस हद तक मोहरा बनना चाहता था।
क्षेत्रीय पत्रकारिता में सत्ता का ये खेल और भी गहरा था। मुझे याद है भोपाल के कुछ पत्रकार जिन्हें इस बात का अफसोस था कि वो अर्जुन सिंह के जमाने में क्यों नहीं रिपोर्टर बने। लखनऊ में भी ढेरों ऐसे पत्रकार थे जो कई जमीन के टुकड़ों के मालिक थे। किसी को मुलायम ने उपकृत किया तो किसी को वीर बहादुर सिंह ने। और जब लखनऊ विकास प्राधिकरण के मामले में मुलायम पर छींटे पड़े तो पत्रकारों की पूरी लिस्ट बाहर आ गई। इसमें कुछ नाम तो बेहद चौंकाने वाले थे। हालात आज भी नहीं बदले हैं। आज भी उत्तर प्रदेश की राजधानी में किसी रिपोर्टर या एडीटर के लिये राज्य सरकार के खिलाफ लिखने के लिये बड़ा जिगरा चाहिये। अब इस श्रेणी में नीतीश के बिहार का पटना भी शामिल हो गया है। फर्क सिर्फ इतना आया है अब मलाई सिर्फ रिपोर्टर और एडीटर ही नहीं काट रहे हैं। अखबार के मालिक भी इस फेहरिश्त में शामिल हो गये हैं। अखबार मालिकों को लगने लगा है कि वो क्यों रिपोर्टर या एडीटर पर निर्भर रहें। अखबार उनका है तो सत्ता के खेल में उनकी भी हिस्सेदारी होनी चाहिये। तब नया रास्ता खुला। और फिर धीरे धीरे पेड न्यूज भी आ गया।
कुछ लोग ये कह सकते हैं कि आर्थिक उदारीकरण ने इस परंपरा को और पुख्ता किया है या यो कहें कि बाजार के दबाव और प्रॉफिट के लालच ने मीडिया मालिकों को सत्ता के और करीब ला दिया है। दोनों के बीच एक अघोषित समझौता है। और अब कोई भी गोयनका किसी भी बिजनेस हाउस और सत्ता संस्थान से दो-दो हाथ कर घर फूंक तमाशा देखने को तैयार नहीं है। क्योंकि ये घाटे का सौदा है। और इससे खबरों के बिजनेस को नुकसान होता है। क्योंकि खबरें अब समाज से सरोकार से नहीं तय होतीं बल्कि अखबार का सर्कुलेशन और न्यूज चैनल की टीआरपी ये तय करती है कि खबर क्या है? ये बात पूरी तरह से गलत भी नहीं है।
ऐसे में सवाल ये है कि वो क्या करे जो ईमानदार है और जो सत्ता के किसी भी खेल में अपनी भूमिका नहीं देखते, जो खालिस खबर करना चाहते हैं? तो क्या ये मान लें कि ईमानदारी से पत्रकारिता नहीं की जा सकती? मैं निराश नही हूं। एक, पिछले दिनों जिस तरह से मीडिया ने एक के बाद एक घोटालों को खुलासा किया है वो हिम्मत देता है। और हमें ये नहीं भूलना चाहिये कि पत्रकारों की पोल खोलने वाले राडिया के टेप का खुलासा भी तो पत्रकारों ने ही किया है? दो, इसमे संदेह नहीं है कि बाजार ने पत्रकारिता को बदला है लेकिन बाजार का एक सच ये भी है कि प्रतिस्पर्धा और प्रोडक्ट की गुणवत्ता बाजार के नियम को तय करते हैं। और लोकतंत्र बाजारवादी आबादी को इतना समझदार तो बना ही देता है कि वो क्वॉलिटी को आसानी से पहचान सके। बाजार का यही चरित्र आखिरकार मीडिया की गंदी मछलियों को पानी से बाहर करने मे मदद करेगा। और जीतेगी अंत में ईमानदार पत्रकारिता ही, सत्ता की दलाली नहीं।
लेखक आशुतोष आईबीएन7 के मैनेजिंग एडिटर हैं. आईबीएन7 से जुड़ने से पहले आशुतोष खबरिया चैनल आजतक की टीम का हिस्सा थे. वह प्राइमटाइम के कुछ खास ऐंकर्स में से एक थे. ऐंकरिंग के अलावा फील्ड और डेस्क पर खबरों का प्रबंधन उनकी प्रमुख क्षमता रही है. वह भारत के एक छोर से दूसरे छोर तक खबरों की कवरेज से जुड़े रहे हैं. उनका यह लिखा उनके ब्लाग ब्रेक के बाद से साभार लिया गया है.












Dheeraj Prasad
December 8, 2010 at 1:54 am
आपका कथन एक दम सत्य है । इसमें गलती को अंकित करना या अपने बिना अर्थ पडे विचारों को दिखाना सच मे मर्खता होगी……
धीरज प्रसाद
CNEB News
डब्बू मिश्रा
December 8, 2010 at 2:35 am
आशुतोष जी का कथन गंभीर है लेकिन सच भी है । हम कई खबरों को आपस में बांट लेते हैं और सच्चाई यह है कि हमें खुद पता नही होता कि उन खबरों का कौन किस तरह से इश्तेमाल कर रहा है ।
0m prakash gaur
December 8, 2010 at 2:53 am
जो बात आशुतोष जी से ब्यूरोक्रेट ने अहि थी वाही बात तहसील मुख्यालय में रहने वाले मेरे पिताजी ने भी कही थी जिनकी औपचारिक शिक्षा नाम मात्र की है. मैं भी चुप रह गया था. आज मई तीस साल की पत्रकारिता के बाद सोच ता हूँ काश उस दिन मैंने उनकी बात को गंभीरता से लिया होता.
ओम प्रकाश गौड़ भोपाल मो 09926453700
rohitash sain
December 8, 2010 at 3:29 am
thanks. Ashutosh ji aapane acha likha.
mahandra singh rathore
December 8, 2010 at 5:33 am
Shri Asutosh ji aapne thik hi likha hai. per dalla shabad maryadit nahi nahi. aapki jankari ke leye bata deta hun. Dalla or bharva eek hi hai. to kya patrkar esse kaam ker rehe hain? dallagiri or dalla se to thik hota aap unehe proclamed medieater keh dete. aapne Goynaka ka name leker iss baat ko pakka ker diya hai ki aaj bhi yeh group kuch alag hai. paid news ko sabse utnewala yahi group hai.
krishankant
December 8, 2010 at 5:48 am
sir jab tak yese chnnels par lagam nahi lagti jo paissa lekar id dete hai tab tak nichle lable par imandari se journlism badi muskil hai han upar baithkar badi badi baten karna bada aasan hai
K.P.Malik
December 8, 2010 at 6:33 am
.Yes…kam se kam kisi ne to es mamale par bolne likhane ki himmat ki . me Ashutoshji se sahmat hoon.hame pata hai DALLA koun hai…………
pardeep mahajan
December 8, 2010 at 6:44 am
ashutosh bhai dalle journalist nahi hote dalle to media house chlane wale vayapari hote he jo apne patarkaro ko suvidha ke naam par kuch nahi dete par apni kaali kamai ko bachane ke liye media house kholte he vo to ” HT;NBT;SAHARA;S-1………….jese.jaane kitne media house khule he or khulenge journalist ko agar paise milte he to vo kalam bechne ke nahi balki kalam ki taakat ke mil rahe he or journalist koi gunah nahi kar raha he or na hi vo bhikari bana he balki usne halak me se dalalo se apne paise nikale he kyoki media house ka malik to advertisement ke naam se moti rakam vasool chuka he -pardeep mahajan [ INS MEDIA ] 09810310927
neeraj mehra
December 8, 2010 at 8:25 am
sir apne bilkul teek kha ptrkaron ke dlal to har chote bade shr mei ghum rhe hai imandar ptrkar ko log bevkuf smjte hai. lekin jab akbar or channelon ke malik hi dalla giri kare to imandar ptrkaron ka marna ho jata hai. log esese ptrkaron ko bacword class ka mante hai. unhe lagta hai iski ydi srkar se sating nahi hai to ye khbre kaise krega kai bar to seting ke abhav mei kam tak nahi milta.
Abhishek Saxena
December 8, 2010 at 8:28 am
Apna bhi toh batao Ashutosh Babu. BB Singh yaad hain ya fir yahin sabko bata dun..??
बिल्लू
December 8, 2010 at 8:54 am
आपने अर्जुन सिंह और मुलायम सिंह की खूब लिखी। लेकिन यह नहीं लिखा कि एक जमाने में मायावती के गुरु कांशीराम ने किस पत्रकार को थप्पड़ मारा था जिसके बाद कांशीराम ने फ्लैट दिलवा दिया तो थप्पड़ का दर्द खत्म हो गया। दिल्ली में सब जानते हैं कि थप्पड़ के बदले फ्लैट किसे मिला था। सच्चाई लिखें लेकिन अधूरी नहीं।
Umesh Mishra
December 8, 2010 at 11:40 am
sir aapki baat laakh take sahi hai. lekin agar socho to chote chote zile me patrkaaro ko dalla banne par majboor kon karta hai. ab baat dholpur ki hi le lo yahan kai ese news chenal vaale hai jo apne office vaalo kaa pet bharne ke liye dalaali karte hai jinhe tankhvaah tak nahi milti vo patrkar kyaa karenge.
मनोज सिंह
December 8, 2010 at 11:45 am
सर आपका रहना एक दम सही है क्या कोई भी अपनी कमी को उजागर करना चाहेगा…जिस तरह एक चोर चोरी करते हुए पकड़ाने पर भी अपने आप को बेकसूर बताता है वैसे ही ये लोग अपने आप को कसूरवार कैसे मान सकते है:)
manoj
December 8, 2010 at 11:48 am
सर आपका कहना एक दम सही है लोकिन क्या कोई अपनी कमी को उजागर करना चाहेगा जैसे एक चोर चोरी करते हुए पकड़ाने पर अपने आप को बेकसूर बताता है वैसे ही ये लोग है जो अपने को कसूरवार कैसे मान सकते हैं
RAMESH SARRAF
December 8, 2010 at 12:33 pm
Aasutos ji
Aap aise patarkar ho jo sach bolne ki himmat kar sakte ho.aap ke saahas ko salaam.
ramesh sarraf
dhamora
jhunjhunu (rajasthan)
om
December 8, 2010 at 12:37 pm
आपके चैनल के एक महान पत्रकार शिमला की खूबसूरत वादियों में होटल मालिक बन बैठे हैं, वो भी हिमाचल सरकार से अच्छी खासी रियायत लेकर। आपको उनकी जानकारी है कि नहीं। खास बात यह भी है कि उन्होंने हिमाचल के मुख्यमंत्री के गुमनाम से बेटे को एक नहीं दो दो बार प्राइम टाइम के स्लॉट पर आधे आधे घंटे का इंटरव्यू भी किया जिसमें दोनो ही बार ये दिखाया गया कि हिमाचल के मुख्यमंत्री के बेटे के जीवन में कितने कीर्ति अध्याय जुड़े हुए हैं। क्या सर आप भी, सामने के उदाहरण को अनदेखा कर रहे हैं और देश दुनिया में ईमानदारी की बाते कर रहे हैं। मैं जानता हूं कि आप व्यक्तिगत तौर पर बेहद ही ईमानदार हैं मगर अपने इर्द गिर्द के जमावड़े पर भी नजर डालिए सर। आपकी तमाम मेहनत के बावजूद आपका चैनल तरक्की अगर करे भी तो आखिर कैसे।
Rohan Sharma
December 8, 2010 at 12:43 pm
I am totally agree with you. At least journalist are the fourth pillar of our constituation. So should not tolerate these things. thanks for your straight vision.
nihal uruj
December 8, 2010 at 1:32 pm
ashutosh ji,welcome,sach me such likhne ki himmat aaj bahut kam logo me he,kunki yug ab pese ka he isi liye sub bharuagiri me lage he,kya afsar kya neta or kya press.
कुमार सौवीर
December 8, 2010 at 2:23 pm
आप आशुतोष है। बडे पत्रकार हैं, कुछ भी लिख सकते हैं।
बात लिखी भी ठीक ही है।
लेकिन शुरूआत बहुत भद़दी कर बैठे।
कोई भी शख्स इस तरह की बात सुनने के बाद चुप नहीं रहेगा।
ऐसे मौके पर और ऐसे कमेंट पर किसी को खींच कर एक थप्पड भले ही ना मार पाये, लेकिन तीखा जवाब तो एक सामान्य शख्स दे ही सकता था कि पत्रकारों में कुछ लोग तो बेइमान अब जाकर हुए हैं, अफसरों की पूरी की पूरी जमात तो बहुत पहले से ही बेइमान थी और हैं भी। उनमें ईमानदारों को खोजना भूसे के ढेर में में सूई तलाशने जैसा होगा। और जो ईमानदार मिल भी गये, वे पूरी तरह कायर होंगे, या मौकापरस्त। इतना ही नहीं, यह जमात बेइमानी के लिए तलवे तक चाटती रहती है। और हां आशुतोष जी, आपके उस दोस्त का वह रिश्तेदार तो यकीनन बेइमान था जो इतनी बात कह गया और आप यकीनन कायर थे जो आज इतने साल बाद भी उसे जवाब नहीं दे पा रहे हैं।
मैं जानता हूं कि शायद आप जैसी काबिलियत मुझमें नहीं है। मगर मैं होता तो उस अफसर को वहीं जवाब देता, भले ही फिर बेरोजगार हो जाता।
madhup
December 8, 2010 at 4:07 pm
आशुतोष जी,विनम्रता से आप से क्षमा मांगते हुए कहता हु की में आप के इस आंकलन से सहमत नहीं हु…क्षेत्रीय पत्रकारिता का मूल स्वरुप बहुत ही दयनीय है..जहाँ एक तरफ महीनो हो जाते है चैनल से पैसे आये हुए वही दूसरी तरफ उन्हें कितना प्रताड़ना सहनी पड़ती है जब उनका चैनल केबल वाला नहीं दिखा रहा होता है…इस स्थिति में सम्बंधित पत्रकार को कोई अपने लिए “दल्लागिरी” में भी नहीं उतारता..ये मलाई तो देश की राजधानी के ही चमत्कार है.मुझे पता है की में गत सात सालों से अलग अलग चैनल के लिए काम कर चुका हु और अभी भी कर रहा हु..लेकिन मुझे पता है की मेरे क्षेत्र के इलेक्ट्रानिक या प्रिंट मीडिया के किसी भी पत्रकार का कोई मकान भी नहीं बन पाया है.कहने को रास्ट्रीय समाचार चैनल के लिए काम करते है लेकिन समाचार बनाने के अलावा किसी भी तरह का कोई पंगा लेते हुए भी दर लगता है की कही हमारे नोयडा के लोग हमारी मुसीबत के वक्त हाथ ना खींच ले…ऐसे दर्जनों मामले में आपको बता सकता हु जब उन्हें अकेले पटक दिया गया.सच तो ये है की क्षेत्रीय स्टार पर जनता की आवाज उठाने वाले की आवाज कोई उठाने या सहियोग देने में भी कोई नहीं है…महोदय जी निश्चित रूप से मेरी इस गुस्ताखी को माफ़ करेंगे…
धन्यवाद
Fahim
December 8, 2010 at 4:53 pm
आशुतोष सर जी में आप की बात से सहमत हू ऐसे पत्रकारों की संखिया बढ़ रही है पत्रकार का मतलब है (पवित्र कार्य ) इस कार्य को कुछ लोग अ पवित्र कर रहे है
Fahim-Mahuaa News
ashish soni
December 8, 2010 at 6:40 pm
me aap ki har baat se shmat nahi ho .me bhi eci se judh hu .aap 50 sch ka rahe he
sameer
December 8, 2010 at 7:02 pm
Aashutosh ji, main aap ki bat se sahamat hoo ki patrakarita mein kuch log dalal hain. lekin yah kam dilchasp bat nahi hai ki kaun se vo karan hain jisake chalate patrakar dalal hai. bade patrakaro ko chhod kis patrakar kya mil raha hai kisi se chipa nahi haiAase mein patrakaro ko doshi thaharana uchit nahi hai.
फ्रीलांस टीवी रिपोर्टर
December 9, 2010 at 3:10 am
आशुतोष जी आपकी लेख के लिए शुक्रिया,
लेकिन इस लेख में पहले ही आपने जिला पत्रकारों को इसका जिम्मेदार ठहरा दिया. आपकी सोच और समझदारी के साथ जानकारी कितनी कम है यह समझ में आ गया. हो सकता है आप बात को समझना या जानना भी नहीं चाहते हों. लेकिन मैं बताना चाहूँगा भड़ास के पाठकों को की जिला के टीवी पत्रकार इन्हीं जैसे बड़े पत्रकारों को देखकर पत्रकारिता करने के लिए मैदान में उतरते हैं. लेकिन इन बड़े पत्रकारों को मालूम भी नहीं होता की इनके नीचे जिले में स्ट्रिंगर के रूप में काम करने वाले पत्रकार कैसे मर-मर कर जी रहे हैं. उनके बदहाली पर किसी की आवाज़ बुलंद नहीं होती. लेकिन आरोप का दौर शुरू होता है तो पहले नीचे वालों को ही दोषी करार दिया जाता है. कचरा ऊपर से साफ करोगे तो गंदगी की सफाई अच्छी होगी, नीचे से साफ करोगे तो ऊपर की गंदगी नीचे वालों पर पड़ेगी. आप नोयडा वालों ने देश के कोने-कोने में दर्जनों स्ट्रिंगरों को खबर संकलन के लिए छोड़ रखा है. उनको सब कुछ करना है. वो आपके चैनेल के लिए कैमरामेन भी है, रिपोर्टर भी है, स्क्रिप्ट राईटर भी है, फीड भी उसी को भेजना है और खबर का फोलो अप भी एक ही प्राणी को सुविधा के आभाव में मर-मर कर करना है. लेकिन जब खबर के एवज में राशी भुगतान की बात आती है तो महीनों बाद काट-पीट कर एक चेक भेज दिया जाता है. मसलन खबर भेजने वाले स्ट्रिंगर का खर्चा 2000 हुआ हो तो उसे 1000 रुपये का भुगतान किया जाता है. अब आप बताईये ऐसे हालत में क्या कोई जिला पत्रकार का घर चल सकता है??? जिला पत्रकार 50 रुपये बिकते जरुर हैं लेकिन उसे बिकने पर आप जैसे शिष्ट मंडल लोग मजबूर करते हैं. मेरा तात्पर्य यह है की मिडिया में भ्रष्टाचार का जन्म ऊपर से हुआ है. पहले खुद के शीशे के घरौंदे को सुरक्षित कर लें बाद में दुसरे के घर पर पत्थर फेंकिये. यहाँ जिला पत्रकार भूखों मर रहे हैं. और आप नीरा टेप प्रकरण पर एसी कमरे में बैठकर उद्योगपति और बड़े अधिकारियों के पीकदान में हाथ डुबोंकर इस तरह की प्रतिक्रिया दे रहे हैं जिसमें आप जैसे बड़े पत्रकारों पर गंभीर आरोप लगे हैं. हमें इस बात का अफ़सोस है………अफ़सोस है…………अफ़सोस है……
Sujit Thamke
December 9, 2010 at 7:39 am
ASHUTOSHJI AAP KE BAAT KUCH 20-30% SACH HO SAKTI HAI…LEKIN YE SACH NAHI MAINE BHI EK TAHASIL SE PATRAKARITAA KI HAI….BAHUT MUSHKIL HOTAA HAI SAHAB PATRAKARITAA KARKE ZINDAKI KO LIVE KARNAA…..
Niranjan Verma, Sadhna News Indore
December 10, 2010 at 1:34 pm
ashotosh ji …….. aap gandi machliyo ko bahar karne ki bat kar rahe he ……. ye bataye ki malik ko ushi k sansthan se bahar kaise kiya jaye
laxman
December 11, 2010 at 11:01 am
bikkul sahi kaha ashutosh ji