रिटायर्ड आईपीएस शैलेन्द्र सागर और उनके कथाकार मित्रों को सराहा जाना चाहिए कि अठारह साल पहले उनके द्वारा शुरू किया गया साहित्यिक आयोजन कथाक्रम लखनऊ की तहजीब का हिस्सा बन चुका है। लेकिन इत्ते से सफर में उसकी देह कांतिहीन और आत्मा जर्जर हो चली है। एक रस्म रह गई है जिसे निभाने के लिए एक बार फिर हिंदी पट्टी के कथाकार, आलोचक और दांतों के बीच जीभ की तरह इक्का दुक्का विनम्र कवि जुटे हैं। यह लिक्खाड़ों के खापों की पंचायत है। वे हर साल इसी तरह जुटते हैं, मंच पर मकई के दानों की तरह फूटते हैं और फिर लौट कर लिखने में जुत जाते हैं। वे साहित्य की बारीकियों यथा कलावाद, यथार्थवाद, दलितवाद, नारीवाद, शिल्प, बाजार, उत्तराधुनिकता वगैरा पर घनघोर बहस करते हैं।
बौद्धिक मुर्गों की लड़ाई में तालियां बजाते वे हमेशा सुधबुध भूल जाते हैं और इस बुनियादी प्रश्न पर कभी बात नहीं करते कि उनका लिखा कोई पढ़ता क्यों नहीं है। जिन किताबों को हिन्दी साहित्य का बेस्टसेलर बता कर इतराया जाता है, उनकी कुल पांच सौ कापियां छपती हैं और वे भी बिक नहीं पाती, ऐसे समय में हिन्दी साहित्य के नाम पर होने वाली इस सालाना वाद-विवाद प्रतियोगिता क्या अर्थ है।
ऐसा नहीं है कि हिन्दी पट्टी के समाज ने अपनी भाषा में पढ़ना, सोचना और जीना बंद कर दिया है। इसी समय हिंदी के अखबारों, टेलीविजन सीरियलों, समाचार चैनलों और बाबाओं को नए पाठक, दर्शक और श्रोता मिल रहे हैं। बीड़ी जलाइले, मंहगाई डायन और मुन्नी बदनाम हुई जैसे भदेस हिन्दी गाने एशिया में धमाल मचा रहे हैं। अमेरिका के राष्ट्रपति को अपने जबड़े की यूरोपीय ऐंठन ढीली कर थैंक्यू की जगह धन्यवाद और जै हिन्द कहना पड़ रहा है। हिंदी का बाजार इतना बड़ा और संपन्न हो चला है कि मल्टीनेशनल कंपनियों के उत्पादों के विज्ञापन अब अनूदित नहीं होते मूल रुप से हिन्दी वाले की जरूरतों, रूचियों और परिवेश को ध्यान में रखकर डिजाइन किए जाने लगे हैं। ऐसे में हिन्दी के लेखक को लोग क्यों नहीं पूछ रहे उसी के साहित्य को निरंतर नकारा क्यों जा रहा है। मत भूलिए कि यह उलटबांसी उस समाज में घटित हो रही है जहां देवकीनंदन खत्री की चंद्रकांता संतति पढ़ने के लिए गैर हिन्दी भाषी हिन्दी सीखते थे और प्रेमचंद के उपन्यास लड़कियों को दहेज मे दिए जाते थे।
हिंदी साहित्य की वास्तविक चिन्ताएं इन औपचारिक गोष्ठियों में कभी प्रकट नहीं होती है। वे यदा-कदा अपनी नकारात्मक ताकत से उछल कर अखबारों के पन्नों और टीवी स्क्रीन पर चली आती हैं तब बीमारी का पता चलता है। यह नाटकीय लग सकता है लेकिन पूरी तरह सच है कि हाल में एक संपादक ने कहानियों का सुपर वेवफाई विशेषांक निकाला जिसमें एक पूर्व पुलिस अधिकारी, एक विश्वविद्यालय के वर्तमान कुलपति और लेखक का इंटरव्यू छपा। इन्टरव्यू में लेखक कम कुलपति ने हिन्दी की लेखिकाओं का छिनाल कहा और यह भी उनका लिखा पढ़कर पता चलता है कि वे किनके साथ सो चुकी हैं और किनके साथ सोना बाकी है। पूरा हिन्दी साहित्य दो खेमों में बंटकर एक महीने तक छिनाल आख्यान में डूबता उतराता रहा। कुलपति का कहा छप गया था इसलिए वे फंस गए वरना इन साहित्यिक मंचों के नेपथ्य में जो तरल सत्र चलता है उसमें यही विमर्श छलछलाता रहता है कि इतनी राशि का अमुक पुरस्कार किसे मिलने वाला है, किसके गिरोह में कौन-कौन है, लेखिकाओं के प्रति सबसे कुत्सित और मनोहारी जुमले किसके हैं। विश्विद्यालयों में हिन्दी के विभाग, अकादमियां, संस्थान, साहित्यिक पत्रिकाओं के दफ्तर ठीक राजनीतिक पार्टियों के मुख्यालयों की तरह हो गए हैं।
हिंदी का लेखक इस बुनियादी सवाल से भागता है और हिन्दी का समाज उसकी तरफ पीठ फेर लेता है।
लेखक अनिल यादव उत्तर प्रदेश के जाने-माने पत्रकार हैं. फिलवक्त दी पायनियर, लखनऊ में वरिष्ठ पद पर कार्यरत हैं. अमर उजाला, हिंदुस्तान, जागरण समेत कई अखबारों-मैग्जीनों में काम कर चुके हैं. संगठन कर चुके हैं, देशाटन कर चुके हैं. अब इनका ज्यादातर वक्त आफिस और घर में बीतता है. अनिल से संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है.












अनिल यादव
November 16, 2010 at 8:05 am
मित्रों, यह आखिरी राइटअप है। मैं भड़ास को अपने लेख भेजना बन्द कर रहा हूं।
अनिल यादव
November 16, 2010 at 8:06 am
आखिरी राइटअप। इसके बाद से भड़ास को लेख भेजना बंद हुआ।
dhanish sharma
November 19, 2010 at 3:55 am
it is a very dificult work.