पत्रकारिता की पढ़ाई पूरी करने के बाद नौकरी की समस्या आन पड़ी थी। संपर्क और संबंध इतने अच्छे नहीं थे कि इसके आसानी से हासिल होने की कोई गुंजाईश रहती। सो, फक्कड़ की तरह भटकते रहने के दौरान डेटलाइन इंडिया का नाम सुना। उसके संचालक आलोक तोमर हैं, यह भी पहली बार जाना। मुलाकात से पहले मन में कई तरह के सवाल थे। पहला सवाल तो यह था कि जिस व्यक्ति के बारे में इतना सब कुछ जानता हूं उससे कितनी विनम्र बातचीत हो पाएगी और अगर गड़बड़ी हुई तो यह संभावना भी जाती रहेगी।
मुलाकात हुई। बात जब शुरू हुई तो कितने देर तक हुई पता ही नहीं चला। काम की बात सिर्फ इतनी हुई कि आप आइए। काम शुरू कीजिए। देखता हूं किसमें कितना है दम। बिना किसी लाग लपेट के बात करने के अंदाज को देख हिम्मत नहीं हुई कि बदले में दाम क्या मिलेगा? काम शुरू किया तो पहली बार किसी तरह की कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली। काम कैसा कर रहा हूं यह पूछने की हिम्मत ही नहीं जुटा पाया। लेकिन काम बेहतर कर सकता हूं, इस बात का भरोसा दिलाया गया।
एक बार कुछ लिख रहा था। थोड़ी सी गड़बड़ उन्हें नजर आई। बोले-ऐसे लिखेंगे तो काम नहीं चलेगा। मैं खामोश हो गया। मुझे लगा कि मेरी तो नौकरी गई। लेकिन जैसे ही उन्हें इस बात का अहसास हुआ कि उनके शब्दों से मेरा मनोवल टूट गया, उन्होंने तपाक से कहा-भई मैं कह रहा हूं कि ऐसा लिखिए जो पढ़ने वालों को लगे कि उनके शब्द आपने गढ़ दिए हों। और बेहतरी आप में है। बस उसे बाहर निकालने की जरूरत है और इस काम में मैं आपकी मदद करूंगा।
आज मैं बेहतर मुकाम हासिल कर चुका हूं और जो कुछ भी हूं उसमें बहुत बड़ा अंश आलोक सर का है। लिखता मैं हूं लेकिन शब्द उनके होते हैं। सोचता मैं हूं लेकिन दृष्टिकोण उनका ही होता है। कौन कहता है कि उनका देहावसान हो गया है। उनके लिखे शब्द हमारे साथ हैं। उनके कहे संदेश को हम हर दिन दोहराते हैं और उनके लिखे को कल भी पढ़ा जाएगा। एक शरीर के चिता में जल जाने से उससे जुड़े संस्कार और सरोकार का अंत नहीं हो जाता।
विभूति रस्तोगी पत्रकार हैं तथा आलोक तोमर के वेबसाइट डेटलाइन से जुड़े रहे हैं.












BIJAY SINGH, JAMSHEDPUR
March 22, 2011 at 5:26 pm
BIbhuti ji ALOK ji jaise patrakar virke hi hote hain.aise jivat ka vyaktitva kabhi nahi mar sakta,wo hamesha hamare dilo me jeevit rahenge.