आदरणीय यशवंतजी, सादर प्रणाम, हालांकि मेरा दिवंगत आलोक तोमर से कोई विशेष व्यक्तिगत संबंध नहीं रहा लेकिन मैं उनकी लौह लेखनी का कायल था। वह हिंदी पत्रकारिता के अजेय सेनानी थे। मैं अपने काव्य श्रद्धा सुमन साहस और निर्भीकता के पर्याय आलोक तोमर जी को आपके भड़ास4मीडिया के माध्यम से प्रस्तुत कर रहा हूं। इस गीत में उनके पत्रकारिता जीवन के विविध आयाम उकेरे गये हैं। इस आलोकजी को समर्पित इस गीत को मैंने गत दिवस ही एक कवि सम्मेलन में पढ़ा था।
हम गीत प्यार के गाते हैं, हम क्रांति बिगुल बजाते हैं।
परिवर्तन के अग्रदूत हम, पानी में आग लगाते हैं।।
जब-जब धरती का मान गिरा, और बेवस का सम्मान गिरा।
मर्यादा का चीर कर दामन, भूखे का ईमान गिरा।।
तभी शब्द का तरकश लेकर हम सत्ता से टकराते हैं।
परिवर्तन के अग्रदूत हम, पानी में आग लगाते हैं।।
धर्म बना मानव का बंधन, स्वार्थ हुआ मस्तक का चंदन।
जहरीली पछुआ बयारों से, होता है बगिया में क्रंदन।।
काले मेघा कजरारे हम, जीवन जल बरसाते हैं।
परिवर्तन के अग्रदूत हम, पानी में आग लगाते हैं।।
हम हरिश्चन्द्र हैं सतयुग के, और घट-घट वासी राम हैं।
गीता का संदेश सुनाते, हमीं स्वयं घनश्याम हैं।।
मानवता हित जहर को पीकर, स्वयं शंकर बन जाते हैं।
परिवर्तन के अग्रदूत हम, पानी में आग लगाते हैं।।
हम कांटों के मीत पुराने, हर आंसू से प्रीत है।
रमते जोगी बहते पानी, यही हमारी रीत है।।
मिटा विषमता के जंगल को, प्यार का फूल खिलाते हैं।
परिवर्तन के अग्रदूत हम, पानी में आग लगाते हैं।।
हम गुरुकुल हैं संदीपनि के, रणकौशल में बलराम हैं।
इस सृष्टि के जीवन दाता, हमीं सुबह औ शाम हैं।।
अंधकार की मिटा कालिमा, सूरज हमीं उगाते हैं।
परिवर्तन के अग्रदूत हम, पानी में आग लगाते हैं।।

डॉ. महाराज सिंह परिहार जनसंदेश टाइम्स, आगरा के ब्यूरोचीफ हैं.












डॉ. राजकुमार रंजन
April 2, 2011 at 9:23 am
बहुत बहुत बधाई डॉ. परिहार साहब, आपने हिंदी पत्रकारिता के दैदीप्यमान सूर्य के लिए इतनी अच्छा गीत लिखा। वास्तव में साहित्य और पत्रकारिता दोनों अलग अलग नहीं हैं। एक अच्छा साहित्यकार ही अच्छा पत्रकार बन सकता है। इस सच्चाई को नकारा नहीं जा सकता।