आज मुझे अमेरिका आये सात दिन हो गए हैं. यहाँ परिवार से दूर हूँ, इस लिहाज से बहुत मन तो नहीं लग रहा है पर यह भी है कि जिस प्रकार का मौका मिला है, उसका पूरा और वाजिब उपयोग जरूर करना चाहती हूँ. अभी तक हमारा समूह कई प्रकार के लोगों और संगठनों से मिल चुका है और इसके जरिये हम लोगों ने कई तरह की नयी बातें सीखी और जानी हैं. हम अमेरिका के बारे में जान रहे हैं और अमेरिका के वे सम्बंधित लोग हम लोगों को जान-समझ रहे हैं.
कल मैं और हमारा समूह ओएमबी वाचग्रुप नामक एक संस्था के दफ्तर में गए थे. यह संस्था मुख्य रूप से शासन की पारदर्शिता के क्षेत्र में कार्य करती है. हमारे देश में जिस तरह राईट टू इन्फोर्मेशन एक्ट है उसी तरह से अमेरिका में फ्रीडम ऑफ इन्फोर्मेशन एक्ट तथा सनशाइन एक्ट हैं. वहाँ हमें अमेरिका में सूचना के अधिकार को लेकर काफी सारी जानकारियाँ दी गयीं. साफ़ दिख रहा था कि कई मामलों में अमेरिका के लोग अपने अधिकारों को लेकर हमारी तुलना में काफी अधिक जागरूक हैं. साथ ही वहाँ की सरकारी संस्थाएं भी अपेक्षाकृत अधिक सक्रिय रहती हैं कि वे इस

सद्दाम हुसैन के फिंगर प्रिंट वाली आरटीआई को दिखातीं नूतन ठाकुर
पर साथ ही वहाँ हमें कुछ बड़ी मजेदार बातें भी बतायी गयीं, जिनसे यह भी लगा कि चाहे भारत हो या अमेरिका, लोग एक जैसे ही होते हैं. तभी तो वहाँ उपस्थित अधिकारी विलियम फेरोजिआरो, जो अब एक स्वतंत्र लेखक और परामर्शदाता हैं, जो पहले नेशनल सेक्युरिटी अभिलेखागार में फ्रीडम ऑफ इन्फोर्मेशन प्रोजेक्ट के प्रमुख थे, ने हम लोगों को यह बताया कि अमेरिका में लोग सूचना अधिकार के तहत एक पर एक मजेदार सूचनाएं भी मांगते रहते हैं. बल्कि उनका तो कहना था कि ज्यादा तादात में ऐसे ही लोग होते हैं जो ऐसी सूचनाएं मानते हैं जो बहुत गंभीर किस्म की नहीं कही जायेंगी. उन्होंने उदाहरण के तौर बताया कि यह पाया गया है कि सबसे अधिक अमेरिकन लोगों ने सूचना के अधिकार के तहत सद्दाम हुसैन के उँगलियों और अंगूठों के निशान के बारे में सूचनाएं मांगी हैं. विलियम साहब ने हमें इसका एक प्रतिरूप भी दिखाया.
एक दूसरे उदाहरण के रूप में उन्होंने बताया कि लोग कई बार ऐसे सवाल भी पूछते रहते हैं कि पूर्व राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन मशहूर रोक सिंगर एल्विस प्रिस्ले से कब मिले, कितनी देर के लिए मिले, उनसे क्या-क्या बातचीत हुई आदि. मिस्टर विलियम ने इस सम्बन्ध में भी एक फोटो हमें दिया. इसके अलावा यह बात भी जानकारी में आई कि अमेरिका के इतिहास में सूचना अधिकार अधिनियम में एक ऐसा मामला भी आया था जहां पूरे अट्ठारह साल की प्रक्रिया के बाद सूचना मांगने वाले व्यक्ति को सम्बंधित सूचना मिल सकी थी. इसके विपरीत सबसे कम समय में सूचना हासिल करने का रिकॉर्ड अट्ठारह दिनों का बताया गया.
अमेरिका में सूचना का अधिकार के अंतर्गत सूचना पाना उतना सस्ता भी नहीं है. वहाँ सौ पृष्ठों तक की सूचना पाने के लिए पांच सेंट प्रति पेज का शुल्क लगता है जबकि इससे अधिक पृष्ठों पर शुल्क कुछ कम होता जाता है. यह दर भी अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग हैं. अंतिम बात जो हमें वहाँ मालूम हुआ वह यह कि इन तमाम बातों के रहते हुए भी अमेरिका की लगभग सारी सरकारी एजेंसियां यह अनवरत प्रयास करती रहती हैं कि उनके स्तर से सूचना देने में कोई विलम्ब नहीं हो सके क्योंकि इसे वे अपनी बदनामी या नाकामयाबी मानते हैं.
अमेरिका से डॉ नूतन ठाकुर की रिपोर्ट












कुमार मयंक
April 9, 2011 at 1:21 pm
अमेरिका दुनिया का बादशाह है और विकसित भी..तो ईसके पीछे आम अमरीकियों की सजगता और अधिकारियों की सतत मिहनत भी है…रही बात सद्दाम के अंगूठे और उंगलियों के निशान की जानकारी तो..यह बात साबित करती है कि,…आम अमेरिकी भी खोजी विचार रखता है…जहां तक आम भारतीय नहीं सोच पाते…ये बातें छोटी लगती हैं…पर वस्तुत्: यही चीजें वहां की सरकार और राजनीतिक पार्टियों के कार्यों की समीक्षा के समय …आम जनता की सूक्ष्म सोच को बयान करती हैं…
जानकारी के लिये आपका धन्यवाद …
shiva
October 15, 2011 at 4:05 am
achi jaankari di hai aapne…bharat sarkar to rti ko hi kund karne ka prayaas kar rahi hai…yeh bhi pata lagaiyega ki wahan soochna maangne waalo ko suraksha or soochna diye jaane ki kya sthiti hai
shiva agarwal