
राजेंद्र हाड़ा
राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत जादूगर कहे जाते हैं। उनके पिता जादू दिखाया करते थे। राजनीति में आने के बाद कुछ समय तक अशोक गहलोत भी जादू के करतब दिखा चुके हैं। वे बहुत अच्छे मैनेजर कहे जाते हैं। मीडिया मैनेजमेंट में उन्हें महारत हासिल है। इतनी कि राजस्थान के पत्रकारों का एक बड़ा तबका ‘भाई साहब’ की सेवा में तत्पर रहता है। और अशोक गहलोत ने फिर साबित कर दिखाया कि वे वास्तव में एक महान मीडिया मैनेजर हैं।
तो खबर चल रही थी अशोक गहलोत की बिटिया सोनिया के बारे में। सोनिया मुंबई के गौतम अनखड़ से ब्याही है। खबर के अनुसार कल्पतरू ग्रुप ने सोनिया को मुंबई के परेल में आठ करोड रूपए का एक फ्लैट दिया है सिर्फ 97 लाख रूपए में। इससे पहले सोनिया को कल्पतरू ग्रुप ने अपनी एक कंपनी शौरी कन्स्ट्रक्शन की डायरेक्टर बनाया। बाद में उनके पति गौतम को भी डायरेक्टर बना दिया। कंपनी की कैपिटल नाम मात्र की है। कल्पतरू ग्रुप आदर्श सोसायटी जैसे मामलों में लिप्त बताया जाता है। आईबीएन7 के मुताबिक इसके बदले में गहलोत ने कल्पतरू ग्रुप को जयपुर का ऐतिहासिक जल महल और उसकी 432 एकड़ बेशकीमती जमीन मात्र दो करोड़ सालाना में 99 साल की लीज पर दे दी। लाखों मीट्रिक टन की क्षमता वाले राजस्थान वेयर हाउस का ठेका मात्र एक एमओयू के आधार पर दे दिया और बायोगैस तथा पावर प्लांट प्रोजेक्ट्स भी देने की तैयारियां चल रही है।
यह खबर ऐसे समय में आई है जब पूरे देश में भ्रष्टाचार को लेकर एक बहस और जन आंदोलन की लहर चल रही है। अखबार और चैनल बढ़-चढ़कर इन खबरों और भ्रष्टाचार को जड़ से मिटाने जैसी मुहिम में जुटे हुए हैं। संपादक बड़े-बड़े अग्रलेख लिख रहे हैं। अखबार तरह-तरह के आयोजन कर रहे हैं। अखबारों और न्यूज चैनलों के लिए भ्रष्टाचार एक ब्रांड बन गया है, जिसके नाम का इस्तेमाल कर वे इसे भुनाने में लगे हैं और जब एक मुख्यमंत्री से जुड़ी भ्रष्टाचार संबंधी कोई खबर आती है तो सब ऐसे मुंह फेर लेते हैं, जैसे वह कोई खबर ही ना हो। हो सकता है राजस्थान के अखबारों की जानकारी में यह एक झूठी खबर हो, अगर ऐसा है तो सच क्या है, यह बताना क्या उनका धर्म नहीं है?
राजस्थान से कभी भ्रष्टाचार या घोटालों की बड़ी खबर देश के पटल पर नजर नहीं आती है तो इसका अर्थ यह नहीं लगाया जाना चाहिए कि राजस्थान में भ्रष्टाचार नहीं है। अगर ऐसा होता तो फिर राजस्थान ईमानदारी में सबसे उपर होना चाहिए था। असलियत कुछ और है। यहां जितने अखबार हुए हैं उनके मालिक ही उनके संपादक थे। अखबार में क्या छपना है, यह वे अकेले तय करते रहे हैं। संपादक रूपी स्वतंत्र संस्था यहां कभी पनप ही नहीं पाई। मुख्यमंत्रियों के लिए अखबार मालिक रूपी संपादक को मैनेज करना बड़ा आसान रहा है। जिसे आम बोलचाल की भाषा में मित्रता का नाम दे दिया गया। और दैनिक भास्कर आने के बाद जब अलग से स्थानीय संपादक नियुक्त किए जाने लगे तब तक ये स्थानीय संपादक ‘संपादकीय प्रबंधक’ का नया अवतार ग्रहण कर चुके थे।
वैसे यह एक शोध का विषय है जिस पर विस्तृत चर्चा फिर कभी, फिलहाल तो इतना ही कि रणबांकुरों की इस धरती पर ऐसी खोजी पत्रकारिता की काफी कमी रही है, जिसके जरिए सार्वजनिक हित और सार्वजनिक धन से जुड़े मामलों को उठाया गया हो। पत्रकार ज्यादातर वही मामले उठाते आए हैं जो किसी नेता ने आरोप के रूप में किसी दूसरे नेता पर लगाए हों। और ऐसे मामले छापने में भी हमेशा यह मानसिकता रही कि अगर सामने वाले अखबार ने आरोप छाप दिया तो अपन कहीं पिट ना जाएं। बड़े बचते-बचाते नेता जी के आरोप छाप दो, लो उजागर हो गया घोटाला।
यही कारण है कि नई दिल्ली में जिसे अभी तक हिन्दी पत्रकारिता के लिहाज से राष्ट्रीय प्रेस कहा जाता है, वहां राजस्थान से निकले पत्रकार अंगुलियों पर गिने जा सकते हैं। जबकि बिहार, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के हिन्दी पत्रकारों की संख्या का अनुमान ही नहीं लगाया जा सकता। तो राजस्थान के हमारे पत्रकार बंधुओं को शायद इंतजार है, इस बात का कि पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे कब इस मुद्दे को उठाती हैं, उठाएंगी तब उनके आरोप बनाकर छाप दिए जाएंगे।
आपकी जानकारी के लिए अशोक गहलोत पर इससे पहले भी आरोप लग चुका है। उनके वकील बेटे वैभव गहलोत का नाम अजमेर की दीप दर्शन गृह निर्माण समिति में हुई प्लाटों की बंदरबांट में सामने आ चुका है। नगर सुधार न्यास, अजमेर द्वारा दीप दर्शन सोसायटी को कौड़ियों के दाम में आवंटित बेशकीमती सरकारी जमीन के प्लाटों की बंदरबांट में वैभव गहलोत के लिए कुछ प्लाट रखे गए तब सरकार ने इस आवंटन को हरी झंडी दिखाई। अजमेर के आधा दर्जन से ज्यादा सम्मानीय पत्रकार भी इन प्लाट आवंटनधारियों में शामिल हैं। मामले की शिकायत हुई। बेटे का नाम सामने आते ही मुख्यमंत्री कार्यालय के आदेश पर योजना रद्द हुई। कानपुर के मूल निवासी नगर सुधार न्यास के पदेन अध्यक्ष अजमेर के जिला कलेक्टर राजेश यादव, जो कई आरोपों से घिरे रहे हैं, पर भी अंगुली उठी और उनका तबादला कर दिया गया। पता है कहां मुख्यमंत्री कार्यालय में? बाद में जयपुर नगर निगम आयुक्त बना दिए गए। दीप दर्शन सोसायटी का यह मामला भी अखबारों ने तब छापा जब किसी ने शिकायत की और आरोप लगाए।
चलिए इंतजार करते हैं। कब, कौन नेता आरोप लगाता है और मुख्यमंत्री गहलोत की आईबीएन7 पर चल रही खबर या उसका खंडन अखबारों में खबर के रूप में नजर आता है।
राजेंद्र हाड़ा करीब दो दशक तक पत्रकारिता करने के बाद अब पूर्णकालिक वकील के रूप में अजमेर में कार्यरत हैं. 1980 में बीए अध्ययन के दौरान ही पत्रकारिता से जुड़े. दैनिक लोकमत, दैनिक नवज्योति, दैनिक भास्कर आदि अखबारों में विभिन्न पदों पर कार्य किया. साप्ताहिक हिंदुस्तान, आकाशवाणी, जनसत्ता, नवभारत टाइम्स, राष्ट्रदूत आदि में भी रचनाएं, खबरें, लेख प्रकाशित-प्रसारित. 1986 से वकालत भी शुरू कर दी और 2008 तक वकालत – प़त्रकारिता दोनों काम करते रहे. अब सिर्फ वकालत और यदा-कदा लेखन. पिछले सोलह साल से एलएलबी और पत्रकारिता के विद्यार्थियों को पढ़ा भी रहे हैं.












raj
April 17, 2011 at 4:09 pm
साहब आप बेकार में परेशान हो…जयपुर बनियों का शहर है…मतलब जहां सिर्फ पैसा लुटाना और बनाना ही खेल है…वरना यहां का निगम, जेडीए और मुख्यमंत्री भांडगिरी पर उतारु है..वो दुनिया को पता है…अशोक गहलोत तो चेहरे से ही धूर्त लगता है…इसकी औकात यही है कि सोनिया की कृपा से इस बार मुख्यमंत्री बन गया…और जयपुर के अखबार वालों और टीवी वालों की ना पूछो यहां के सम्पादक मौका मिले तो मुख्यमंत्री के घर की झा़ड़ू लगाए और बर्तन धुले…ज्यादातर राजस्थान के ही हैं इसलिए अपना ईमान बेच दिया है…हर सम्पादक यहां अपनी ज़रुरत के हिसाब से काम निकलवाना है इसलिए पत्रकारिता की ऐसी तैसी किए है..और जहां तक बात यूपी और बिहार से राजस्थान की तुलना पत्रकारिता में की जाए तो माफ करिएगा मैं ये मानता हूं राजस्थान के दूध के दांत भी नहीं निकले हैं अभी.
Indian citizen
April 17, 2011 at 5:52 pm
क्या पत्रकार और सम्पादकों को धन नहीं चाहिये. वे क्यों न इस दरिया में गोते लगायें
Indian citizen
April 17, 2011 at 6:14 pm
क्या पत्रकार और सम्पादकों को धन नहीं चाहिये. वे क्यों न इस दरिया में गोते लगायें
Shyam hardaha
April 18, 2011 at 1:06 pm
Bihar Aour Uttar predesh me Bhari ajnitic pratidwandita ke karan iska asar Patrakarita me bhi dikhai deta nai.
Chandra Shekhar
April 20, 2011 at 3:03 pm
राजस्थान में पत्रकारिता है कहां?
ले देकर पत्रिका, भास्कर। बाकी बचे नवज्योति, डेली न्यूज, महका भारत, राष्ट्रदूत, लोकदशा और कुछ और पेपर। इनमें कौनसी खबरें छपनी चाहियें और कौनसी नहीं, इसका निर्धारण कैसे होता है, सब जानते हैं। यहां तक कि कोई पत्रकार अपने जोखिम पर कोई सरकार के खिलाफ कोई स्टोरी कर भी लाए, तो या तो वो खबर नहीं लगती और अगर लग भी जाए तो ऐसे में कई ऐसे उदाहरण (उदाहरण नहीं मिसाल कह सकते हैं) हैं कि पत्रकार को बर्फ में लगा दिया गया हो। दरअसल यहां सरकार और पत्रकारों के बीच ऐसा दोस्ताना है जो मिल बांट कर काम करने में यकीन करता है।
अगर मेरी लिखी बातों में कुछ असत्यता नजर आए तो बता दीजिए कि राजस्थान से प्रकाशित होने वाले मुख्य समाचार पत्रों (पत्रिका, भास्कर से लेकर सभी समाचार पत्र) में पिछले कई सालों में सरकार के खिलाफ कोई इन्वैस्टिगेटिव स्टोरी चली हो।
Kapil Gupta
April 21, 2011 at 5:20 am
these line are very ture and I like this lines