लोकपाल बिल पर अन्ना हजारे के आमरण अनशन में कई चीजों की खास पहचान हुई. खासकर मीडिया में यह देखा गया कि तकनीक हावी होगई है और पत्रकारिता गायब हो गई. पर इनसे अलग सबसे बड़ी बात यह देखी गई कि जब आज के समय में लोग भ्रष्टाचार या किसी भी जनसामान्य के मुद्दे पर आंदोलन करने की नहीं सोचते उस समय ऐसा लगा जैसे पूरे देश में कई शहर जंतर-मंतर बनने को तैयार है.
बनारस, लखनऊ से लेकर जयपुर, भोपाल, पटना सहित जम्मू कश्मीर तक इस विषय पर लोग सड़क पर आए. हालांकि इस आंदोलन में कई विरोधाभास भी नजर आए. यह भी देखा गया कि आज के दौर में कोई संपादकीय नीति नहीं है. महज दृश्यों पर ही कमेंट्री हो रही थी और उसे ही रिपोर्टिंग कहा गया. धरने के समय एक बात और देखा गया कि तीन दिनों तक जो रिपोर्टिंग हुई उसमें कोई विविधता नहीं थी, एक ही तरह की चीजें बार-बार आई.
हां, एक चीज जो लम्बे समय बाद देखा गया वह यह कि इस देश में ईमानदारी का सपना अभी भी ज्यादातर लोगों में बचा हुआ है और इस विषय पर बड़े आंदोलन की रूपरेखा बनाई जा सकती है. यह बात पत्रकार पुण्य प्रसून वाजपेयी ने ‘लोकपाल अभियान और मीडिया की भूमिका’ विषय पर आयोजित गोष्ठी में बतौर मुख्य वक्ता कही. गोष्ठी प्रज्ञा संस्थान में था और इसका आयोजन ‘प्रभाष परंपरा न्यास’ ने किया था.
इससे पहले पत्रकार राम बहादुर राय ने विषय की चर्चा करते हुए कहा कि अन्ना हजारे जब अनशन पर बैठे थे तो यह लगा कि मीडिया में अज्ञानता छाया हुआ है. अखबारों में जो लिखा गया उससे शब्दों की मर्यादा टूटी. कोई इस अनिश्चितकालीन अनशन को देश की दूसरी आजादी का आंदोलन तो कोई जनक्रांति और कोई इसकी तुलना जेपी और गांधी के आंदोलन से कर रहा था. और इसका उस आंदोलन से तुलना करना सरासर अन्याय है.
गोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए जवाहरलाल कौल ने कहा कि कोई भी आंदोलन ऐसे ही चलता है और उसमें सौ फीसद लोग पाक-साफ नहीं रहते हैं. अगर इसके पहले होने वाले कोई आंदोलन पर निगाह डाली जाए तो किसी भी आंदोलन से जुड़े हुए सारे लोग पाक-साफ नहीं रहे हैं. आंदोलन बढ़ने के साथ ही ऐसे तत्वों की पहचान और उन्हें बाहर करने की प्रक्रिया चलती है.
गांधी शांति प्रतिष्ठान के सचिव सुरेंद्र कुमार, पत्रकार अच्छे लाल प्रजापति, देवदत्त, अवधेश कुमार, संदीप जोशी, सोपान जोशी, संत समीर आदि ने इस मौके पर सवाल पूछे. साभार : जनसत्ता












vivek bajpai
May 2, 2011 at 4:40 am
हां सही कहा आपने शायद आज का मीडिया दिशाहीन हो चला है। या यूं कहें कि मीडिया और पत्रकारों को कठपुतली की तरह नचाया जा रहा है तो गलत नहीं होगा। क्योंकि कुछ वरिष्ठ पत्रकारों को ना चाहते हुए भी टीवी पर तमाशा दिखाना पड़ता है। आज की पत्रकारिता देसी और आमलोगों के हितों से दूर होती जा रही है। जैसा कि अभी हालही में सभी ने देखा फिरंगियों की शादी में कैसा मीडिया ने बिना निमंत्रण के जमकर भांगड़ा किया…विवेक वाजपेयी टीवी पत्रकार..
SUJIT THAMKE
May 2, 2011 at 7:09 am
Prasun ji aap ne bahut sahi likha….Es aandolaan ko kai aspect se coverage karnaa chahiye tha media ko lekin aisaa nahi huaa…jaise Anaa ke Aandolan ki ahamiyaat kya hai ?Jantaa kaa aakrosh ?kyaa vaakai desh ki jantaa Corruption ke grast aur trast hai ?kya vaakai Jan Kalyan ki yojana comman men tak nahi pahuchti iskaa kaaran Corruption hai..etc
sanjeev kumar, sahara samay
May 2, 2011 at 2:06 pm
भाई साहेब, अगर कोई मालिक की नौकरी बजाने वाला संपादक ये दावा करे कि उसकी पत्रकारिता दबाव में है, या मजबूरी में उसने बेच दी है, तो समझ में आता है। लेकिन प्रसून बाजपेई जब ऐसा कहते हैं, तो सरासर दोगलापन लगता है। न तो आप नौकरी करते हैं लाला के यहां। हफ्ते में 5 अखबार में लेख लिखते हैं, तीन गोष्ठियों में भाषण देते हैं, चार बार ब्ल़ॉग पर अवतरित हो जाते हैं – फिर आपको कहां प्लैटफॉर्म की कमी पड़ गई पत्रकारिता करने के लिए ? तीन दिन अन्ना के आंदोलन के दौरान जितना भाषण आपने जंतर मंतर से ज़ी टीवी पर दिया, उतना तो बेचारे अन्ना हज़ारे या अरविंद केजरीवाल भी न दे पाए। अगर वो आपको पत्रकारिता नहीं लगती, तो किस लिए वहां तीन दिन गलाए ? सर, आप बड़े पत्रकार हैं। लेकिन आपसे इलतजा है कि ये आदत बदलिए। अब ये फैशन चला गया है कि जिस थाली में खाईए, उसी को गलियाइए तो आपकी इज्ज़त बढ़ेगी। टेलीविज़न ने वक्त वक्त पर , अपने तरीके से पत्रकारिता का मान बढ़ाया है -और छिटपुट गोष्ठियों में आपके झूठ, इस सच को झुठला नहीं सकते।