Connect with us

Hi, what are you looking for?

Local News Community

हलचल

कानपुर के प्रेसक्लबिया पत्रकारों और उनकी राजनीति के बारे में मैं क्या कहूं

: अभी काम पूरा नहीं हुआ है : लगभग 9 बरस बाद कानपुर प्रेस क्लब नीयतखोर कार्य समिति के चंगुल से मुक्त हुआ। परिवर्तन के पक्षधर कुछ पत्रकारों ने हिम्मत दिखाई और खुद को अजेय समझने वाले मठाधीशों को पलक झपकते औंधा कर दिया। एक जुलाई को नये चुनाव घोषित हुये हैं। प्रेस क्लब से मेरा सीधा नाता रहा है। मेरे ही महामंत्रित्व काल में इस मंच ने प्रेस क्लब का पुनरुद्धार कराया और ‘पत्रकारपुरम’ आवासीय योजना को मूर्त रूप दिया।

: अभी काम पूरा नहीं हुआ है : लगभग 9 बरस बाद कानपुर प्रेस क्लब नीयतखोर कार्य समिति के चंगुल से मुक्त हुआ। परिवर्तन के पक्षधर कुछ पत्रकारों ने हिम्मत दिखाई और खुद को अजेय समझने वाले मठाधीशों को पलक झपकते औंधा कर दिया। एक जुलाई को नये चुनाव घोषित हुये हैं। प्रेस क्लब से मेरा सीधा नाता रहा है। मेरे ही महामंत्रित्व काल में इस मंच ने प्रेस क्लब का पुनरुद्धार कराया और ‘पत्रकारपुरम’ आवासीय योजना को मूर्त रूप दिया।

मैं जब महामंत्री बना इसके पहले की समिति भी वर्षों से हमारे बुजुर्ग पत्रकारों के नेतृत्व में काम कर रही थी। चुनाव तब भी अटके हुये थे। समय पर नहीं हो रहे थे। उन दिनों मैं जागरण का मुख्य संवाददाता हुआ करता था और चुनाव कराने में मैंने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया था। शैलेन्द्र दीक्षित ‘आज’ के सम्पादक थे और पूर्णत: मेरे साथ थे। इतना गहरा सम्बन्ध होने के बावजूद आज मेरा प्रेस क्लब से नाता इसलिये नहीं है क्योंकि जो समिति अभी तक काबिज थी उसने मुझे प्रेस क्लब का सदस्य होना भी स्वीकार नहीं किया था। यह वह समिति थी जिसके अध्यक्ष से लेकर कार्यकारिणी के कई सदस्य तक मेरे साथ, मेरे नेतृत्व में मेरे विश्वासपात्र बनकर वर्षों से पत्रकारिता कर रहे थे। कुछ तो इनमें ऐसे थे ( थे क्या…, हैं…) जब सामने पड़ते हैं तो आज भी कहते हैं कि उनकी कुल पत्रकारिता की हैसियत मेरी ही वजह से है। ये वे लोग हैं जो शायद मुझे इस धरती का सबसे मूर्ख व्यक्ति समझते हैं।

मैं कानपुर के प्रेसक्लबिया पत्रकारों और उनकी राजनीति के बारे में क्या कहूं। खुद सोचिये जिस महामंत्री से हिसाब लेना था, चार्ज लेना था उसे सदस्य तक नहीं बनाया। मुझे सदस्य न बनाने का आधार बनाया गया मेरी तत्कालीन बेरोजगारी। मैं उन दिनों किसी अखबार में नौकरी नहीं कर रहा था। कितना बचकाना और षडय़ंत्री ‘क्लाज’ बनाया था इन लोगों ने जबकि दिलीप शुक्ला, कमलेश त्रिपाठी, अम्बरीष, विष्णु त्रिपाठी सरीखे कितने ही गैर नौकरी वाले पत्रकार उक्त चुनाव प्रक्रिया में निर्णायक भूमिका अदा कर रहे थे। सच कहूं… दो हजार दो से पहले जो भी पत्रकार मेरे दोस्त भाई या हितैषी बने फिरते थे, प्रेस क्लब के गत चुनाव के बाद मैंने उनकी दिली रिश्तों की फाइल बंद कर दी है। अब चूंकि यहीं रहना है इसलिए व्यवहार में सभी से मिलना जुलना रहता है… बस। हां, इधर जो नये युवा पत्रकार मैदान में आये हैं, मेरा सरोकार उन्हीं से है। और यह परिवर्तन किन्हीं पुराने, वरिष्ठों या क्रान्तिकारियों की वजह से नहीं हुआ है। नये युवा पत्रकारों की अकुलाहट से हुआ है।

तो नये मित्रों तुम्हारे लिये मेरा एक खुला सन्देश है- तुम्हें सजग रहना है। क्योंकि भ्रष्ट, अकर्मण्य और डरे हुये वरिष्ठ अभी भी अपना जाल बुनना बन्द नहीं करेंगे। वे फिर से नये मुखौटों से प्रेस क्लब पर अपना कब्जा रखने का षडय़ंत्र रचेंगे। क्योंकि प्रेस क्लब आर्थिक भ्रष्टाचार का पुराना व स्थापित अड्डा रहा है और आज भी है। कोशिश होगी, बोतल बदले, शराब नहीं। तभी तो आम सभा के डर से कार्यसमिति ने अपने घुटने टेक कर नये चुनाव की घोषणा की। इसका सीधा सा अर्थ है कि नये चुनाव की प्रक्रिया का निर्धारण आम पत्रकारों से नहीं होगा।

इसे वही लोग अंजाम देंगे जो या तो इस समिति में काबिज थे या फिर इतने डरपोक और उदासीन कि ९ बरस तक चुपचाप ‘प्रेस क्लब’ का भ्रष्ट आचार सहते रहे। अगर प्रेस क्लब को वाकई अनीतियों व पुरानी कब्जे की बीमारी से उबारना है तो आम पत्रकारों को चुनाव की नकेल अपने हाथ में लेनी होगी। जो लोग कल तक चुनाव न कराने की गोटें बिछा रहे थे अब आप अगर उन्हें नये चुनाव की गोटें सजाने का अवसर देंगे तो यह बदलाव भी एक छद्म क्रांति से आगे नहीं बढ़ेगा। इसलिये भंग चुनाव समिति का एक भी सदस्य चुनाव प्रक्रिया में शामिल नहीं होना चाहिये। अगर ऐसा हुआ तो समझो चेहरे बदलकर नयी षडय़ंत्री समिति अंगड़ाई ले रही है।

लेखक प्रमोद तिवारी कानपुर के जाने-माने पत्रकार हैं. अपनी बेबाकबयानी और धारधार लेखन के लिए चर्चित हैं. प्रमोद इन दिनों ‘हैलो कानपुर’ का प्रकाशन कर रहे हैं. इसके पूर्व वह दैनिक जागरण सहित कई बड़े समाचार पत्रों को अपनी सेवायें दे चुके हैं.  उन्होंने दर्जनों पत्रकारों को कलम पकड़ना सिखाया और कलम को धारधार बनाना सिखाया है. प्रमोद ने कानपुर प्रेस क्लब को लेकर अपना दर्द फेसबुक पर उतारा है.

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

0 Comments

  1. Arun Kanpuri

    May 28, 2011 at 8:20 am

    अभी काम पूर नहीं हुआ है. कौन से काम करने का बीडा उठाया था आपने, इस बात का कहीं कोई जिक्र तो किया होता? तो फिर कुछ बात आपकी वजनदार लगती. सिफॅ और सिफॅ अपने को दूसरे पत्रकारों से अपने को बेहतर मान लेना और अभी तक इस उम्र की दहलीज पर पहुंच कर भी उसी गफलत को पाले रखना, बौदिकता का दिवालिया ही कहा जाएगा, सबको मालुम है कि जागरण कानपुर में आप अपनी प्रतिभा नहीं बलिक अपने पिता के नरेनद्र मोहन का सहपाठी होने की बदौलत पहुंचे थे और फिर आपने जो पत्रकारिता की आड में जनेऊवादी सियासत की, वह सबको मालुम है. आपकी इसी सियासी चालों और इसके तमाम नाकाबिले बदाँशात हरकतों के चलते ही आपको हटाकर मुझे मुख्य संवाददाता बनाया गया था जबकि इसके पहले मैं आगरा, लखनऊ में इसी पद पर उसके बाद गोरखपुर ऩोएडा, गाजियाबाद, पानीपत और लुधियाना तक जागरण में मुख्य संवाददाता ही प्रमुख संवादवाददाता- विधान परिषद लखनऊ और गोरखपुर में समाचार संपादक तक रहा. जबकि पत्रकारिता में मेरा कोई गाँड फादर नहीं रहा.बकौल दुषयंत कुमार- हमनें तमाम उम्र अकेले सफर किया, हम पर किसी खुदा की इनायत नहीं रही. आज कानपुर में जब मै संवाददाता तब आप अखबार और अखबारनवीसी किस बला नाम होती है, यह जानते भी नहीं थे. कानपुर प्रेस क्लब कोई सुधार घर नहीं है जहां आपको -काम अभी पूरा नहीं हुआ. करना बाकी है, अपने भीतर के अधूरे कामों पूरा करो तो बेहतर होगा, कानपुर प्रेस क्लबिया पत्रकारों और जुलाई में वाले इसके चुनाव के संदॅभ में जारी आपका यह घोषणा पत्र को यहां नयी पीढी कितना हजम कर पाएगी, यह चुनाव परिणाम ही बताऎगे. वैसे मेरी शुभकामनाँए आपको…

  2. singh manoj

    May 29, 2011 at 12:02 pm

    वाह सन्तु दादा !
    इसे कहते हैं धारदार लेखनी और बेबाकबयानी…..केवल अपना “महिमा मंडन” करना ही बेबाकी और धारदारिता नहीं होता यह बात प्रमोद जी को तो समझनी चाहिए…आखिर बहुतों को धारदार कलम पकड़ना और चलाना सिखाया है..फिर प्रमोद जी से यह चूक कैसे हो गयी ? खैर…! कम से कम प्रमोद जी से यह भी तो पूछना चाहिए था कि कानपुर प्रेस क्लब को आखिर नीयतखोर बनाया किसने…. प्रेसक्लब को भ्रष्ट्राचार का दलदल बनाने के लिए “तालाब का गड्ढा” तो प्रमोद जी और उनके सहयोगी जनेऊधारियों ने ही खोदा था…. और रही बात “अभी काम पूरा नहीं हुआ” की, तो शायद प्रमोद जी और उनके सरीखे जैसे लोगों के दिलो दिमाग में प्रेस क्लब के जमींदोज होने की उम्मीदें अभी बाक़ी हैं इसलिए ऐसे शब्द निकल रहे हैं लेकिन लगता है “कविताओं के चक्कर में” प्रमोद जी अपना आधा अतीत भूल गये….आने वाले चुनावों के लिए शुभकामना, और प्रमोद जी की याददाश्त के लिए ईश्वर से प्रार्थना……

    [b][/b]

  3. Rakesh

    May 31, 2011 at 5:58 am

    अरुण कानपुरी जी कलम को तो एक खुला तमंचा बना दिया आपने.. बहुत बढ़िया. … मै व्यक्तिगत रूप से 1992 से दैनिक जागरण कानपूर का नियमित पाठक हूँ. लगभग सभी संवाददाताओं को रोज पढ़ते-पढ़ते नाम याद से हो गए हैं… कुछ एक फेसबुक पर मिले तो पहचानने में दिक्कत नहीं हुई. आप कानपूर से ही हैं और इतने दिनों बाद लेख पर आपके कमेन्ट से आपका नाम पता चल रहा है. कानपूर प्रेस क्लब से मेरा कोई खास जुडाव नहीं रहा है. लेकिन बाहर भोला की चाय की दुकान पर बैठते रहने से थोडा बहुत अंदाज़ा है. वहां पर भी आपका कोई जानकार नहीं मिला.
    मै कोई पत्रकार नहीं हूँ लेकिन “कोयले की दुकान के आस पास गुजरने” की मानिंद थोडा बहुत सुना है कि कानपूर प्रेस क्लब में ज़माने से चुनाव नहीं हुए. क्या कानपूर प्रेस क्लब एक लोकतान्त्रिक व्यवस्था है? फिर बुजुर्ग पत्रकारों को दर-दर कि ठोकरें खाते देख के भी अगर प्रेस क्लब इन घटनाओं को संज्ञान में भी लेना पसंद न करे तो क्या मानना चाहिए कि प्रेस क्लब संवेदनहीन हो चला है..?
    जहाँ तक प्रमोद जी की बात है तो एक शेर याद आ रहा है एक कनपुरिया शायर का … फूल के साथ साथ गुलशन में सोचता हूँ बबूल भी होंगे., क्या हुआ जो उसने बेवफाई की, उसके अपने उसूल भी होंगे.
    अब ऐसे में बदलाव की चाहत तो सैकड़ों पत्रकार रखते हैं प्रमोद जी ने लिख दिया तो आप तो तमंचा उन्ही पर चला दिए . कहीं ऐसा तो नहीं की बन्दुक किसी और की कन्धा किसी और का और गोली किसी और की हो… क्योंकि आजकल क्या मीडिया में क्या राजनीति में “कौन किसकी गुलेल बना” ये बता पाना बहुत मुश्किल है. प्रेस क्लब का चुनाव एक जायज मुद्दा लगता है. कृपया इसे व्यक्तिगत जंग का मैदान न बनायें.

  4. ankit gupta

    May 31, 2011 at 7:41 am

    badlaw bahut karuri hai . kanpur press club ko maine bahar se dekha hai aur suna bhi hai . waha bahut bhrasta aatankiyo ka bolbaala hai . diwaali tyohaar me press klub ke pass itni mithai aa jati hai ki pure saal mithai brchkar apna kharcha chala sakte hai sab bookaal pidit log hai . bhikaal chahiye in logo ko . 1 july ko sab ko pata jayega bas koi sajish na honi chahiyeee.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

भड़ास तक खबर सूचनाएं जानकारियां मेल करें : [email protected]

भड़ास के वाट्सअप चैनल से जुड़ें और नवीनतम खबरें पाएं : Bhadas Whatsapp

भड़ास लीगल टीम : किसी किस्म की लीगल हेल्प के लिए संपर्क करें- Bhadas Legal Team

You May Also Like

Uncategorized

भड़ास4मीडिया डॉट कॉम तक अगर मीडिया जगत की कोई हलचल, सूचना, जानकारी पहुंचाना चाहते हैं तो आपका स्वागत है. इस पोर्टल के लिए भेजी...

Uncategorized

भड़ास4मीडिया का मकसद किसी भी मीडियाकर्मी या मीडिया संस्थान को नुकसान पहुंचाना कतई नहीं है। हम मीडिया के अंदर की गतिविधियों और हलचल-हालचाल को...

हलचल

[caption id="attachment_15260" align="alignleft"]बी4एम की मोबाइल सेवा की शुरुआत करते पत्रकार जरनैल सिंह.[/caption]मीडिया की खबरों का पर्याय बन चुका भड़ास4मीडिया (बी4एम) अब नए चरण में...

Uncategorized

मीडिया से जुड़ी सूचनाओं, खबरों, विश्लेषण, बहस के लिए मीडिया जगत में सबसे विश्वसनीय और चर्चित नाम है भड़ास4मीडिया. कम अवधि में इस पोर्टल...