ग्वालियर में विश्व पर्यावरण दिवस के मौके पर एक पत्रकार संगठन द्वारा ग्वालियर में एक परिसंवाद का आयोजन किया गया. इसमें पर्यावरण पर उल्लेखनीय कार्य करने वाले कुछ रिपोर्टर और फोटो जर्नलिस्टों का सम्मान किया गया. कार्यक्रम के मुख्य वक्ता जाने-माने पत्रकार स्वर्गीय प्रभाष जोशी के बेटे पर्यावरण पत्रकार सोपान जोशी थे. इसमें दैनिक भास्कर के पत्रकार हरे कृष्ण दुबोलिया. इसी अखवार के फोटो जर्नलिस्ट विक्रम प्रजापति, पत्रिका के रिपोर्टर राज देव पांडे को भी सम्मानित किया गया.
राज देव पांडे की अनुपस्थिति में पत्रिका के ही एक सीनियर रिपोर्टर पुष्पेन्द्र सिंह तोमर ने यह सम्मान ग्रहण किया. खास बात यह रही कि दिन रात मेहनत करने वाले इन मीडिया कर्मियों के फोटो दूसरे अखवारों ने इसलिए नहीं छापे क्योंकि वे दूसरे अखबारों में काम करते हैं और उनके अखबारों ने छापे नहीं. दरअसल यह सामान्य बात नहीं है. इन दोनों अखबारों के प्रबंधन ने ऊपर के निर्णायक पदों पर ठीक वैसा ही ढांचा तैयार कर दिया है जैसा अंग्रेजों के राज में था. इन अखबारों ने बाहरी रेजिडेंट रख दिए हैं, जो स्थानीय पत्रकारों की स्वीकरोक्ति और उनके संपर्कों से चिढ़ते हैं और वे ऐसा कोई मौका नहीं गंवाते जब वे अपनी कुंठा को फलीभूत कर सकते हैं.
उन्हें न इलाकों की समझ है और न ही क्षेत्रीय सरोकारों की. पुरानी और घिसी-पिटी खबरें लिखते हैं और उनको यह बाहरी रेजिडेन्ट का यह काकस छापता है. यही वजह है कि अब इन अखबारों से स्थानीयता और चाव्नात्मकता तो गायब ही हो गयी है.ये सब मिलकर स्थानीय पत्रकार और पत्रकारों की गतिविधियों को नज़र अंदाज़ करते हैं. अगर इन बाहरी रेजिडेंट्स में से किसी को कोई फर्जी उपलब्धि भी मिल जाती है तो यह उसे ऐसे छापते हैं, मानो आसमान से तारा तोड़ लाये हों, लेकिन यदि ग्वालियर के किसी स्थानीय पत्रकार को कोई बड़ी भी उपलब्धि मिल जाए तो ये नाक-भौंहें सिकोड़ते हैं और छापने में इनकी नानी मर जाती है.
दूसरों को पुरस्कार देने के लिए दिल्ली में करोड़ों खर्च करने वाले पत्रिका के प्रबंधन को अपने ही एक साथी का सम्मान रास क्यों नहीं आता. दैनिक भास्कर में पांच लोगों की किटी पार्टी और दस बच्चों की फ्रेशर पार्टी पांच-पांच कॉलम में छपती है, लेकिन अपने रिपोर्टर को बीस सेंटीमीटर भी सिर्फ इसलिए नहीं मिलता क्योंकि वह स्थानीय है. बाहर से नहीं आया है. यह गैर स्थानीयवाद किसी दिन अखबार को भी संकट में डालेगा… क्योंकि अब इस बात की चर्चा पूरे शहर में आम जनों के बीच होने लगी है.
एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.












atul saxena
June 8, 2011 at 8:55 am
both r frusted editior.
Raja
June 8, 2011 at 11:15 am
office me baithe Akhbar wale to kutte hai sale reporte ko kuch nahi samjhate
kanha
June 8, 2011 at 12:37 pm
patrika me ya to GULAB chhapta hei ya fir kisi school me sammanit ho jaye to sampadakon ko chhapte hei…Baki karmachaari to jeise Unke Gulam hei…
sahid
June 8, 2011 at 3:24 pm
दूसरों की खबर छापने वाले पत्रकार महोदय को अपने यहां न छप पाना बड़ा नागवार गुजरा है। उनकी खिसियाहट यहां साफ दिख रही है। उनका एक विचार यह भी है कि लोकल संपादक और लोकल रिपोर्टर ही बढिया अखबार निकाल सकते हैं। अगर ये सही है तो ग्वालियर में सिर्फ दो-तीन अखबार ही क्यों चलते हैं, निकलते तो दर्जन भर से ज्यादा हैं। उनके यहां पूरा स्टाफ तो लोकल है। अब भइया अखबार 20 साल पुराने अखबार तो रहे नहीं कि लोकल का संपादक और लोकल के रिपोर्टर हों। कारपोरेट कल्चर है। वैसा ही माल भी बांटा जा रहा है। 20 साल पहले वाले पत्रकारों से पूछिए कितनी तनख्वाह मिलती थी। तो भइया अगर आपने उस कल्चर को अंगीकार किया है तो उसकी व्यवस्थाएं तो आपको सहनी ही होंगी। खिसिया कर सहिये या हंसकर।
n bharadwaj
June 8, 2011 at 4:15 pm
sthaniye ka kya matlab.tum jab jabalpur ya bhopal jaoge to tumhe gowaliar ka hone ke karan bahri kyo na mana jaye.pata nahi sthaniye ka matlab kya hai.india ka hai na koi pakistani ho to bahri kahna
a membar of civil sosaity
June 9, 2011 at 4:36 am
जब जूते पढते हैं तो स्थानीय पत्रकार ही याद आते हैं …….पहले भी संपादक बाहर के रहते थे लेकिन वे अपने रिपोर्टर को लेकर आज के टटपुंजिया और मालिकों के कहे बगैर ही दम हिलाने वाले नहीं होते थे वे अपने रिपोर्टर से बेटे जैसा प्यार करते थे …अगर अखवार यहाँ तक पंहुचा है तो वह तुम जैसे नौकर पेशा कर्मचारियों की दम पर नहीं महेश श्रीवास्तव और गुलाब कोठारी जैसे पत्रकारों …संपादकों के दम पर ….तुम जैसे लोगों को तो तुम्हरे शहर के पाठक भी नहीं जानते जबकि देश भर के लोग जानते हैं कि प्रभाष जोशी संपादक थे .राजेन्द्र माथुर संपादक थे ….एस पी सिंह संपादक थे …आर तुम्हारे जैसे संपादकों ने तो सम्पादकीय लिखना तो दूर पढने की भी छूट नहीं …आप तो चिट्ठी -पटरी के संपादक हों जिसे समाज में जाकर यह कहने की भी आज़ादी नहीं है कि यह भी कह सको कि संपादक हों ……कसम खाकर बताओ तुम्हे कौन सी सम्पादकीय या रिपोर्ट के लिए याद किया जा सकता है .कार्पोरेट के नाम पर दम हिलाने की तो मालिक भी नहीं कहता ..लेकिन तुम्हें पता है कि यहाँ से गए तो इतने पैसे नहीं मिलेंगे …अगर पैसों के लिए ही दुम हिलानी थी तो और कोई धंधा चुन लेते कम से कम लोकतंत्र का चौथा स्तंभ तो छोड़ देते