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पत्रकारों को चाहिए तीसरा प्रेस आयोग!

पत्रकारों को तीसरा प्रेस आयोग क्यों चाहिए? पहले के दो प्रेस आयोगों की तरह क्या ये आयोग भी सरकारी रंग रौगन से सजा होगा या फिर उसे जन आयोग की शक्ल दी जानी चाहिए? या तीसरे प्रेस आयोग का गठन किसी पत्रकार के नेतृत्व में हो और उसमें सरकारी और पत्रकार बिरादरी की भागीदारी एक बराबर हो? ऐसे ही तमाम मुद्दों पर चर्चा प्रभाष परंपरा न्यास की एक संगोष्ठी में हुई।

पत्रकारों को तीसरा प्रेस आयोग क्यों चाहिए? पहले के दो प्रेस आयोगों की तरह क्या ये आयोग भी सरकारी रंग रौगन से सजा होगा या फिर उसे जन आयोग की शक्ल दी जानी चाहिए? या तीसरे प्रेस आयोग का गठन किसी पत्रकार के नेतृत्व में हो और उसमें सरकारी और पत्रकार बिरादरी की भागीदारी एक बराबर हो? ऐसे ही तमाम मुद्दों पर चर्चा प्रभाष परंपरा न्यास की एक संगोष्ठी में हुई।

तीसरे प्रेस आयोग के प्रारूप पर चर्चा का ये दूसरा दौर था। संगोष्ठी में आए सुझावों के आधार पर दस्तावेज तैयार करने का प्रस्ताव भी पारित हुआ। दस्तावेज बनाने की जिम्मेदारी जनसत्ता समाचार सेवा के पूर्व संपादक रामबहादुर राय की देखरेख में बनी समिति को सौंपी जाएगी। इस दस्तावेज को अगले माह इंदौर में होने वाले भषाई पत्रकार सम्मेलन में देश भर के पत्रकारों के सामने रखा जाएगा।

दिल्ली सचिवालय के पीछे शिव मंदिर परिसर में हुई इस संगोष्ठी के उदेश्यों को राम बहादुर राय ने सबके सामने रखा। रामशरण जोशी ने अपने शोध पत्र ‘क्यों चाहिए तीसरा प्रेस आयोग’  के जरिए चर्चा का प्रारूप पेश किया। साधना न्यूज चैनल के ग्रुप एडिटर एनके सिंह ने प्रेस आयोग में प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक और न्यू मीडिया के लिए अलग से प्रावधानों की आवश्यकता पर विस्तार से प्रकाश डाला।

नया प्रेस आयोग बनाने में सरकार की भूमिका पर भी पत्रकारों ने सकारात्मक बहस की और सुझाव दिए। ऐसे ही एक सुझाव के जरिए सरकारी आयोग की जगह पत्रकारों के लिए जन आयोग बनाने का प्रस्ताव भी आया। कारपोरेट घरानों की गोद में राडिया रास का सुख ले रहे मीडिया संसथानों की चर्चा भी गोष्ठी में खूब गरम रही। कुछ वक्ताओं ने पत्रकारों की सुरक्षा के मुद्दों को भी जोर-शोर से उठाया।

आयोजन

गोष्ठी में शामिल पत्रकार, साहित्यकार और बुद्धिजीवियों ने मुंबई मिड डे अखबार के क्राइम जर्नलिस्ट ज्योतिर्मय डे की हत्या की तीव्र शब्दों में भर्त्सना की। प्रख्यात पत्रकार-साहित्यकार नामवर सिंह ने सुझाव दिया कि प्रेस आयोग को अलग-अलग हिस्सों में बांटने के बजाए सबको एक साथ-एक जैसी सुविधाओं के प्रावधान रखा। उन्होंने अपने संक्षिंप्त संबोधन के दौरान एक मुहावरा-‘आधी छोड़ पूरी को धावे, पूरी मिले ना आधी पावे’ भी संगोष्‍ठी में सुनाया।

संगोष्ठी में उमेश चतुर्वेदी, देवदत्त, प्रबाल मैत्र, जवाहर लाल कौल एनडी टीवी के प्रियदर्शन, एसवन चैनल से राजीव शर्मा, जनसत्ता से मनोज मिश्र, आज तक से वात्सल्य के अलावा विश्वनाथ त्रिपाठी, नित्यानंद तिवारी, कुमार संजय सिंह, विजया लक्ष्मी, एनएन ओझा, संजय वर्मा, अमरेंद्र, मनोज झा, एचएन शर्मा समेत सौ से ज्यादा पत्रकार-साहित्यकार और बुद्धिजीवियों ने हिस्सा लिया। संगोष्ठी के समापन से पहले सभी ने गाजीपुर (उ.प्र.) के सच्चिदानंद राय की बाटी-चोखा, दही और दाल-भात, बालूसाई का स्वाद चखा। इंदौर में अगले महीने की 15-16 जुलाई को फिर से मिलने के संकल्प के साथ आगंतुकों के प्रति आभार राकेश सिंह ने  व्यक्त किया।

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0 Comments

  1. राजकुमार साहू, जांजगीर छत्तीसगढ़

    June 13, 2011 at 5:14 pm

    देखिए महोदय, पत्रकारों के हितों में बृद्धजीवियों के विचार तो ठीक है, मगर उन्होंने उस दौरान क्या खाया, इस बात की जानकारी देना क्या वाजिब लगता है ? क्या ये व्यंजन देश व दुनिया में चर्चित है ?
    मैं भी चाहता हूं कि पत्रकारों के दिन बहुरे और आयोग के माध्यम से बेहतर कार्य हो, मगर ऐसे विज्ञप्तियों को छपवाकर मुझे तो नहीं लगता कि ऐसा कुछ हो सकता है।

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