मुंबई में राज ठाकरे की गुंडई जारी है. गरीब रिक्शवाले राज के गुंडों के शिकार बन रहे हैं. ये देश का दुर्भाग्य है कि मीडिया में खबरें भी दिखाई जा रही हैं लेकिन राज्य और देश की सरकार नपुंसक बनी हुई है. किसी को भी गरीबों से क्या मतलब. जिस तरह से परप्रांतीयों के नाम पर पेट के लिए मेहनतकश लोगों को पीटा जा रहा है, उस पर देश के प्रधानमंत्री क्यों कुछ नहीं बोल रहे हैं.
क्या ये तस्वीरें देश के किसी पिछड़े हिस्से की हैं. ये तस्वीरें देश की आर्थिक राजधानी कहे जानी वाली मुंबई और उसके सटे जिले ठाणे की हैं जहां राज अपनी गंदी राजनीति की खातिर मजबूरों की जान लेने पर उतारु हैं. मुझे तब और दुख होता है जब इस मारपीट और उपद्रव को मीडिया के ही कुछ लोग प्रायोजित भी कर रहे हैं. कुछ कहते हैं तुम मारो पीटो, हम कैमरे लेकर आते हैं. शायद ऐसे लोग राज से मिले होते हैं. हमारा ये अनुरोध है कि अब वक्त आ गया है कि पूरा देश इस तरह के अत्याचार का विरोध करे. यही नहीं, मीडिया भी ऐसे गुंडों को जेल पहुंचाने के लिए कमर कसे. और हां, महाराष्ट्र के जिस अन्ना हजारे को पूरे देश ने सिर आंखों पर बिठाया, वो अन्ना भी कुछ बोलें ताकि उपद्रवियों का हौसला पस्त किया जा सके.
राज ठाकरे के गुंडों और मीडिया वालों की मिलीभगत से संबंधित वीडियो देखने के लिए क्लिक करें- थाणे में आटोवालों पर अटैक और मीडिया की मौजूदगी
महाराष्ट्र के पत्रकार अश्विनी शर्मा की रिपोर्ट












VEERU
October 5, 2011 at 7:06 pm
वो बुढढा अन्ना क्या बोलेगा. वो तो पहले ही इस कुत्ते राज ठाकरे का समर्थन कर चुका है. अब बहुत हो गया . अब समय आ गया है कि उत्तर भारत मे रहने वाले मराठियो के पिछवाड़ो मे लाते जमाकर उनको इस कुत्ते राज के पास भेजा जाये.
रजनीश राज
October 6, 2011 at 6:47 am
मुंबई आकर देखिए, ये ऑटो वाले किस तरह से आम यात्रियों पर जुल्म करते हैं, आपकी आंखों के सामने आपकी जेब से पैसे निकालते हैं, जब कभी ऑटो वालों का मन हुआ तो आप उनकी बदतमीजी का भी शिकार हो सकते हैं…अपनी मर्जी से रास्ता तय करते हैं, तब ऑटो वाले ये नहीं देखते हैं कि उनका शिकार महिला बन रही है, बच्चे बन रहे हैं, परप्रांतीय बन रहे हैं या कोई और बन रहे हैं…दिल्ली, लखनऊ, पटना में बैठकर ऑटो वालों की बदतमीजी और ज्यादती का अंदाजा नहीं लगा सकते …महाराष्ट्र के पत्रकार महोदय भी संतुलन बनाकर नहीं लिखा है..एकपक्षीय हो गए हैं…….
Veenu
October 6, 2011 at 8:01 am
सही कहा sir jee आज नहीं तो कभी नहीं…वोट के लिए राजनीति करने वालों पर लगाम लगनी चाहिये…लेकिन सवाल तो ये उठता है कि लगाम लगायेगा कौन?…राजनीति में सब मौसरे भाई होते है…किसी चुनाव से पहले यहीं देखने को मिलता है…कुर्सी तक पहुंचने का आसान रास्ता..
shamit sinha
October 6, 2011 at 11:12 am
अगर कोई रिक्शावाला मीटर टेंपरिंग करता है, तो रिक्शावालों को पीटने वाले कानून टेंपर कर रहे हैं…अगर कोई एक रिक्शावाला किसी को ले जाने से मना करता है…तो ये बदले में दर्जनों रिक्शावालों की इतनी पिटाई करते हैं कि उसे कहीं जाने लाएक ही नहीं छोड़ते…रिक्शावाले बेईमानी कर रहे हैं पेट के लिए…ये उपद्रवी वोट के लिए…और इन सबके आगे सरकार मौन…बताओ असली गुनहगार कौन…
uday bhagat
October 6, 2011 at 2:48 pm
मनसे यानी की भारतीय विद्याथी सेना के पूर्व अध्यक्ष राज ठाकरे की पार्टी. मुझे याद है जब मैं कल्याण में हिंदी दैनिक नवभारत का प्रतिनिधि था तब अरविन्द मोरे ( शहर अध्यक्ष ) ने मुझे फ़ोन किया और कहा की अगर आप आज रात कल्याण स्टेशन पर आयेंगे तो बहुत अच्छी न्यूज़ मिलेगी . मैं गया तो वहाँ काफी चैनल वाले थे. पटना ( मेरे शहर ) से ट्रेन आई थी . शिवसैनिको ने बिहार और लालू के खिलाफ नारेबाजी की .. मेरे एक परम मित्र जो बिहार से ही है और एक चैनल के रिपोर्टर हैं ने मोरे से कहा अगर विद्यार्थियों को पिता जाये तो बहुत अच्छी न्यूज़ मिलेगी … मोरे को जोश आया और वो और उनके चमचे टूट पड़े बिहारी छात्रो पर .. अगले दिन सारे अखबारों में न्यूज़ थी कल्याण में बिहारी छात्रो की पिटाई … शिवसैनिको की दादागिरी …
uday bhagat
October 6, 2011 at 2:49 pm
I Am agree with Rajnish ji
Suneel Mahakhariya
October 6, 2011 at 3:06 pm
सर, मैं आपकी भावनाओ की कद्र करता हूँ, लेकिन आपने राज ठाकरे की गुंडई की बात तो लिख दी… लेकिन रिक्शा चालको की गुंडागर्दी के बारे में नहीं लिखा… मैं आपका इस बात में पूरा समर्थन करता हूँ कि मीडिया को कम से कम उस राज ठाकरे को नहीं दिखाना चाहिए जो उनको पहले बुलाता है और फिर उनकी खिल्ली उडाता है… स्टोरी और भी है… मेरे पत्रकार बंधुओ से मेरा अनुरोध है इस तरह की ओछी पत्रकारिता ना करें…बाकी ताली एक हाथ से नहीं बजती… धन्यवाद
Suneel Mahakhariya
October 6, 2011 at 3:09 pm
सर, मैं आपकी भावनाओ की कद्र करता हूँ, लेकिन आपने राज ठाकरे की गुंडई की बात तो लिख दी… लेकिन रिक्शा चालको की गुंडागर्दी के बारे में नहीं लिखा… मैं आपका इस बात में पूरा समर्थन करता हूँ कि मीडिया को कम से कम उस राज ठाकरे को नहीं दिखाना चाहिए जो उनको पहले बुलाता है और फिर उनकी खिल्ली उडाता है… स्टोरी और भी है… मेरे पत्रकार बंधुओ से मेरा अनुरोध है इस तरह की ओछी पत्रकारिता ना करें…बाकी ताली एक हाथ से नहीं बजती… धन्यवाद
HARI
October 7, 2011 at 10:17 am
अश्विनी शर्मा का लेख उम्दा है। जहां तक रिक्शावाले बेशक मनमानी का सवाल हैं लेकिन ये मनमानी हर जगह होती है। दिल्ली में भी रिक्शावाले कम मनमानी नहीं करते हैं। रिक्शेवालों का मनमानी करना, कहीं जाने से इनकार करना या मीटर को टेंपर करना संगीन अपराध है, ये रुकना चाहिए। हालांकि इसके लिए पुलिस प्रशासन असली दोषी है जो रिक्शेवालों से हफ़्ता लेकर उन्हें मनमानी सवारी ढोने या कहीं जाने ना जाने की आज़ादी देता है। सवाल ये हैं कि राज ठाकरे या उनके लोग कौन होते हैं रिक्शेवालों को पीटने वाले। अगर रिक्शेवाले ग़लत कर रहे हैं तो उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई करने के लिए पुलिस है। लेकिन क़ानून को हाथ में लेने वालों के ख़िलाफ़ सख़्त कार्रवाई होनी चाहिए।
Vishal Singh
October 8, 2011 at 10:07 am
सर में आपके दिल में हो रहे दर्द की कद्र करता हु…. लेकिन मै आपसे एक सवाल पूछना चाहता हु… की जब आप अँधेरी स्टेशन से ऍमआईडीसी ऑफिस आते है तो क्या आपको हर रिक्शा वाला एक बार में साथ चलने को तैयार रहता है … वो किस तरह से बात करते है … हमे वह पर कम से कम १० से १५ रिक्शावालो की ना नुपुर सुनने के बाद ही कोई रिक्शावाला साथ चलने को राजी होता है …. मै इस बात का समर्थन नहीं करता हु की राज ठाकरे सही कर रहे है लेकिन ये रिक्शावाले अपना काम ठीक से करेंगे तो इस तरह की पिटाई का सवाल ही नहीं उठाता …..और यहाँ पर अभी ये बात तय होनी है की इन रिक्शावालो की पिटाई कौन कर रहा है??? शिवसेना या मनसे
MANOJ SHARAFF
October 8, 2011 at 11:08 am
thik kaha apne ashwini ji, logo ko raj thackrey ki rajniti se prerit hokar garib rikshawalo ko nahi pitna chahiye. raj ko to maharashtra ki rajniti me apni aur jagah banani hai, isliye wo marathi yuvko ki bhavnao ko istemal kar raha hai, lekin doosra pahlu bhi dekhna hoga, jahan ye rikshawalu pahale se pareshan aam admi ko lootate hai, unhe office ya station chhodne ke liye mana karate hai, jabali mumbai me logo ka wakt bahut kimti hai. isliye rikshawalo ko pahle imandar hona padega, fir to raj kya shivsena bhi unki aad me rajniti nahi kar payegi.
manish khandelwal
October 8, 2011 at 12:35 pm
dear writer sabne likha sabne rikshewalo ka dos bataya , magar main in sabse ek baat ye puchna chahta huin ki inmein se kaun sa dudh ka dhula hoga jo galat kaam nahi karta ya galat kaam karne ki nahi soach ta, shayad main bhi sabjiwala, dudhwala , rasahan wala kaun beemani nahi karta apne pet ki sab soachtein hain , apne parivar ki bhi, baat yahain bal thakre ki hai jo ek gali ka kutta hai or raj thakre or uddav thakre jo inke pille hai baat inko sabk sikhane ki hai jis par media , goverment or hum khamos rahtein hai
Amrendra Gupta
October 9, 2011 at 12:49 pm
अश्विनी जी….
मैं आपके विचारों से पूरी तरह से सहमत हूं…मैं कई सालों तक मुंबई में रहा..मुंबई की राजनीति को समझा…पैनी नजरों के साथ राजनीति को परखा…लेकिन मैं आपके विचारों के साथ कुछ बातें और कहना चाहता हूं…उम्मीद है आप भी मेरी इन दलीलों से सहमत होंगे…
महाराष्ट्र में मराठी कार्ड की राजनीति काफी पुरानी हो चुकी है…शिवसेना से लेकर एमएनएस तक यही कार्ड खेलती रही है…और अब महाराष्ट्र की पृथ्वीराज चव्हाण सरकार ने भी मराठी दांव ही खेला है..और इसी सिलसिले में मराठियों के लिए अड़तालीस हजार ऑटो परमिट देने का भी ऐलान कर दिया गया है…. राज की गुंडागर्दी के खिलाफ कार्रवाई तो हुई नहीं….अलबत्ता सूबे की सरकार वोट के उसी खेल में खुद भी शामिल जरुर हो गई…..इस बात को दरकिनार करते हुए कि लचर क़ानून-व्यवस्था और एमएनएस की धमकियों ने उन हज़ारों मेहनतकशों की नींद उड़ा रखी है जो हज़ारों मील दूर से इस महानगर में दो वक्त की रोटी का जुगाड़ करने आए हैं….
आपका अनुज…
अमरेन्द्र गुप्ता
प्रोड्यूसर, न्यूज़ एक्प्रेस
नोएडा
मो. 09873516666
ashwini sharma
October 10, 2011 at 3:10 pm
मेरे कहने के मायने को समझने की कोशिश करें,मुझे भी मालूम है कि मुंबई क्या कहीं के भी कुछ रिक्शावाले सवारियों को परेशान करते हैं,और अपराध में भी शरीक होते हैं…लेकिन हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि ये किसी भी इंसान की आदत में शुमार हो सकता है,इंसान भगवान नहीं हो सकता लेकिन कुछ गलत करे उसके लिए सब रिक्शेवालों को पीटा जाए तो कहां तक सही है,आखिर वो भी हमारी तरह किसी के बेटे हैं,किसी के पिता,और किसी पति,यानि कई रिश्तों को निर्वाह कर रहे होते हैं,उनके घर पर भी बच्चे आस से इंताज़ार कर रहे होते हैं,ऐसे में कुछ के करनी की सज़ा सभी को देना कहां तक उचित होगा,वैसे भी आपसे भी कुछ अच्छे रिक्शेवाले मिले ही होंगे वो पल भी याद रखना चाहिए,यही नहीं देश का कोई भी हिस्सा हो पुलिस और ट्रैफिक वाले भी कुछ ना कुछ खामिया खोजकर उनके पीछे पड़ जाते हैं,आज देश अन्ना की जयजयकार कर रहा है लोगों में आस जगी है,लेकिन कुछ लोग सिर्फ प्रांत की लड़ाई में मशगूल हैं वो भी उपद्रव मचाकर लोगों को पीटकर..क्या अब मारपीट ही एक उपाय है..ऐसे तो वैमनस्यता बढ़ती ही जाएगी,हमने बचपन से सीखा है कि हर धर्म हर इंसान का सम्मान करो..हमारे बुजुर्गों ने भी कहा कि इंसान के अवगुणों से नफरत करो इंसान से नहीं…चाहे वो किसी भी धर्म और जाति का हो..मैंने भी अपने छोटे जीवन में यही महसूस किया है कि सब लोग सुख से जीए..चाहे देश के किसी भी हिस्से का इंसान हो…कानून हाथ में लेना कहीं से ठीक नहीं है…हिंसा से कोई समाधान नहीं हुआ है…बल्की समस्या और बढ़ी है…रिक्शेवाले हो या कोई और सज़ा कानून देगा लेकिन राजनीति करने वाले कानून अपने हाथ में लेकर क्या संदेश देना चाहते हैं..और मीडिया के कुछ लोग चटकारे लगाकर मजबूरों को पीटने वाली खबरों में ब्रैकिंग न्यूज क्यों खोजते हैं. वैसे भी देश में कई सारे मुद्दे हैं जिसका पूरे देश को मिलकर समाधान निकालना होगा…अगर महज अपनी राजनीति चमकाने के लिए हिंसा की जाए और मीडिया के कुछ नासमझ महज अपने स्वार्थ के लिए हिंसा से पहले लोकेशन पर पहुंचने लगे तो किसी का भी भला न होगा…
आपका
अश्विनी शर्मा,मुंबई